Tuesday, 14 September 2021

असम्भव है इन्क्लूसिव एजुकेशन :

 असम्भव है इन्क्लूसिव एजुकेशन :

शिक्षक हूं साहब।परिस्थितियों को समझना ,उनका विश्लेषण करना ,स्वतंत्र चिंतन करना मेरे शिक्षक होने का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है।
मैं हमेशा लिखता रहता हूं कि शिक्षण कोई व्यवसाय नहीं है,ये जुनून है, तप है और मानवता की सबसे महत्वपूर्ण सेवा है।इसलिए शिक्षण वायवस्था को पूरी तरह शिक्षा विदों के हवाले किया जाना चाहिए । शिक्षण व्यवस्था को बेहद अन प्रोफेशनल लोग चला रहे हैं जिनको जमीनी स्तर की कोई जानकारी नहीं है।
2008 में हाई कोर्ट के चाबुक से शिक्षा विभाग ने आनन फानन में पीपल विध डिसएबिलिटी एक्ट 1995 को लागू करने हेतु शिक्षकों को स्पेशल चिल्ड्रन को पढ़ाने हेतु सेंसेताइज़ करने के लिए एक हफ़्ते की विशेष कक्षाएं एस सी ई आर टी सोलन और जिला डाइट में आयोजित की । मैं इस कार्यक्रम का राष्ट्रीय स्त्रोत व्यक्ति था।मुझे इसके लिए सोलन और देहरादून में प्रशिक्षित किया गया था।दो साल चले इस कार्यक्रम में मैंने लगभग 36 हज़ार शिक्षकों को प्रशिक्षित किया।मैंने खुद इसके लिए प्रभाव शाली पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन बनाई और इंटरनेट से बेहद दिलचस्प डाटा और ज्ञान इक्कठ्ठा किया।
आप में से बहुत शिक्षक जो इस प्रशिक्षण का हिस्सा रहें है वो गवाही से सकते की वो कक्षाएं प्रभावी थी।
परन्तु इस प्रशिक्षण के 10 साल बाद मुझे आपको ये बताते हुए तनिक भी संकोच नहीं हो रहा कि जो कुछ मैं उस प्रशिक्षण में आपको बता रहा था,जो कुछ मुझे राष्ट्रीय कार्यशाला में समझाया गया था,जिन तरीकों से मुझे टेकनाईज किया गया था वो सब पूर्णतः बकवास और गैर सतही था।
आजकल धरमशाला बाल विद्यालय में कार्यरत हूं।मेरे स्कूल में स्पेशल चिल्ड्रन हेतु आई डी विंग का विद्यालय भी समाहित है।आजकल स्पेशल चिल्ड्रन हेतु विशेष प्रशिक्षण शिविर विद्यालय में चल रहा है। एस एस ए के माध्यम से चल रहे इस शिविर के इंचार्ज मेरे घनिष्ठ मित्र बी आर सी संजय निरूला जी हैं।उनके आमंत्रण पर मैं शिविर में विशेष बच्चों से मिलने गया। बच्चों के साथ बैठा।उनके जीवन के संघर्ष को बेहद नजदीक से देखने का मौका मिला।उनकी सीखने की कूवत,छोटी छोटी चीजों को सीख उसे कर दिखाने का उल्लास मेरी पलकों को गीला कर गया।उनकी विकलांगता मुझे अंदर तक हिला देने के लिए काफी थी।कुछ बच्चे बोलने में अक्षम थे,कुछ देखने में,कइयों के हाथ पांव टेढ़े तो कई सलो लेर्नर।कोई मेंटली रेतार्डेड बच्चा तो कोई किसी व्याधि से ग्रस्त।
मैं निसंदेह नास्तिक हूं परन्तु किसी भी मानव को इस कदर बेसहारा और दयनीय स्थिति में देख भावुकता में मैं आसमान कि तरफ देख कर एक दो गाली जरूर दे देता हूं।ऐसा इस बार भी हुआ।मैंने बच्चों कि कुछ तस्वीरें ली,जो इस पोस्ट के साथ शेयर कर रहा हूं,उनको शाबाशी दी।मेरा स्नेह पाकर वो विभोर भी हुए।
परंतु मानवीय स्तर पर दयावश आप इन बच्चों को भाग्य के सहारे नहीं छोड़ सकते।मैंने महसूस किया कि आज से दस साल पहले मैंने जो कुछ प्रशिक्षण के दौरान सीखा था और हज़ारों शिक्षकों को सीखाया था वो एक दम बेईमानी था।आप इन बच्चों को आम बच्चों के साथ रख बेहद अमानवीय कार्य कर रहे हैं।एक्सक्लूसिव एजुकेशन की अवधारणा सही थी।विशेष बच्चों हेतु विशेष विद्यालय ही सही है।आम बच्चों के साथ बैठ वो ना तो उस रफ्तार से कुछ सीख सकते ना ही आम अध्यापक विशेष बच्चों को कुछ सीखा सकता है।
ये असम्भव है।
एक सप्ताह के प्रशिक्षण के बाद आम अध्यापक से आशा करना की को विशेष बच्चों को पढ़ाने लायक हो गया बिल्कुल वैसा है जैसे धरमशाला से अण्डमान निकोबार पैदल जाना।
इन्क्लूसिव एजुकेशन का मूल कारक डिसेबल चिल्ड्रन को आम बच्चों के साथ बीठा उनमें आत्मीयता पैदा करना था।आप हैरान होंगे कि मेरे विद्यालय की कक्षा सात में सभी बच्चे स्पेशल हैं।कोई भी आम बच्चा इस कक्षा में है ही नहीं।सामान्य बच्चों के अभिभावकों ने अपने बच्चे विद्यालय से हटा लिए।तो आत्मीयता पैदा हुई के नहीं इस पर शोधार्थियों को शोध कर सरकार और न्याय पालिका तक पहुंचाना चाहिए,परंतु एक पूरी कक्षा से सामान्य बच्चे गायब हो गए ये मैं बता देता हूं।सामान्य बच्चों के अभिभावक गलत नहीं है।सामान्य बच्चों के लिए प्रतियोगिता निर्बाध गति से दिन पर दिन कठिन होती जा रही।वो अपने बच्चों को विशेष बच्चों के साथ बिठा जोखिम नहीं ले सकते।शिक्षक भी कतई खुश नहीं हैं।अलबत्ता तो वो विशेष बच्चों को सीखाने के योग्य है नहीं है दूसरा उनको अपना सिलेबस पूरा करना है और रिजल्ट के चाबुक से भी पार पाना है।ये दोनों काम आपकी कक्षा में स्पेशल चिल्ड्रन होते हुए संभव नहीं है।
इसलिए जरूरी है कि इन्क्लूसिव एजुकेशन पर नए सिरे से बहस हो।प्रकृति पहले ही इन मानव पुत्रों पर जुल्म ढा चुकी है,हम इन पर इतनी बेरहमी नहीं दिखा सकते।
कोई भी जो शिक्षण व्यवस्था के निर्णय लेने वाली संस्थाओं से जुड़ा हो इस लेख पर गौर फरमाए।कोई भी वकील मित्र कोर्ट में इस बारे पी आई एल दायर करे।मेरी नजर में ये मानवता की महान सेवा होगी। मैं विश्व विद्यालयों को भी इन्क्लूसिव एजुकेशन के विपरीत प्रभावों पर गहन शोध करने हेतु आमंत्रित करता हूं। पीपल विद्घ डिसएबिलिटी एक्ट 1995 के वास्तविक ध्येय और हासिल के अध्ययन हेतु में मानव संसाधन मंत्रालय और यू जी सी को भी आमंत्रित करता हूं।
मैंने स्पेशल एजुकेटर्स से भी बात की।उनमें से एक भी इन्क्लूसिव एजुकेशन के पक्ष में नहीं था।उनमें से हर किसी का मानना था कि सामान्य बच्चों के साथ स्पेशल चिल्ड्रन का उठना बैठना ,खेलना और खाना तक हो सकता,लेकिन सीखना नहीं।उनको एक ही कक्षा में बैठाना सनक है, अमानवीय है।स्पेशल स्कूल्स में शायद ही उनको पता चले कि प्रकृति ने उनके साथ कठोर अन्याय किया है ,सामान्य स्कूल में तो हर सेकंड उनको महसूस होता की वो विकलांग है।उनकी हीन भावना घटती नहीं बल्कि कई गुना मल्टीप्लायी हो रही है।
स्पेशल बच्चों के साथ काम करना बेहद कठिन और जटिल है।आप दो मिनट में ही विचलित और फ्रस्टेट हो सकते।सोचिए स्पेशल एजुकेटर्स जो पूरा दिन इन बच्चों के साथ गुजारते हैं।वो उन बच्चों को सीखा रहे जिनके सीखने की अलबत्ता क्षमता है ही नहीं और अगर है भी तो बेहद धीमी।
मुझे लगा इतना सिर खपायू और विचलित करने वाला काम करने वाले शिक्षकों को बेहद सम्मानजनक और आम शिक्षक से कोई 50 गुना ज्यादा वेतन मिलता होगा।
कोतुहल वश मैंने पूछ भी लिया।सामने बैठी स्पेशल एजुकेटर्स विकलांग बच्चों को सिखाते वक्त,एक ही चीज को बीस बीस बार रिपीट कर इतनी असेहज नहीं थी जितनी इस सवाल को सुन कर हुई।आंखों में नमी लिए एक महिला साथी स्पेशल एजुकेटर ने जवाब दिया," पीछले बीस सालों से सेवा ही के रहे सचिन सर।।9000 ₹ से शुरू किया था।ना रेगूलर हुए ना वेतन में वृद्धि हुई।अब भी नौ हज़ार रुपए ही देती है सरकार..... "
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल से।
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Monday, 30 August 2021

@75

 @75 

तालिबान की वापसी पूरी मानवता की बेहतरी के लिए है।।
इंटरनेट,मोबाइल वीडियो और सोशल मीडिया के दौर में जो विभत्स दृश्य अब पूरी मानव जाति देखने वाली है उसी से धर्म विहीन और मानवता से भरी दुनिया की नीव पड़ेगी।
बरहलाल ,मानवीय संवेदनाओं का बेहद दुखद और जघन्य दौर अब शुरू होने वाला है।पत्थर मार के हत्या, गले रेत कर खून के फवारों पर अल्लाहु अकबर का अट्टहास करते अंध धार्मिक दैत्य ,महिला के बुर्के से बाहर नाखून तक दिख जाने पर सामूहिक ब्लातकार और नाखून उंगली से उखाड़ कर ,बंदूक को लहरा नाचते तालिबानियों के वीडियो अब आपके मोबाइल पर सुभा शाम दस्तक दिया करेंगे।
महिलाओं की किसी भी धर्म आधारित व्यवस्था में जो गत होती है और अब होगी वो मर्म के आखिरी बिंदु को भी को हिला के रख देगी।जहां कहीं महिलाओं की तस्वीरे लगी हैं उन पर सफेदी पुतवाने का काम आज ही शुरू हो गया है।शिक्षा का अधिकार,बुर्के के बाहर रहने की आजादी,शरीयत कानून की तीन तलाक की मनहुसियत,श्रृंगार रस की आजादी दो हफ्ते में ही समाप्त हो जायेगी।तीन तलाक के बाद पुनः विवाह करने के लिए किसी दूसरे मर्द के साथ रात गुजारने की अमानवीय जलालत अब हर हालत में सहनी ही होगी ।16 साल की कमर गुल का शिक्षा लेने का संघर्ष भी अब सिर में गोली मार के शांत कर दिया जाएगा।
हे महान भारत के नागरिकों,
अपने संविधान पर गर्व करो जिसने तुम्हे धर्म निरपेक्ष राज्य में आजादी की सांस लेने का अधिकार दिया है।हर किसी के लिए अनिवार्य शिक्षा,सुगम स्वास्थ्य सेवाओं ,बेहतरीन आधार भूत ढांचा ,विज्ञान और शोध के विश्व विद्यालय और वेधशालयों के लिए अपनी सरकारों पर दवाब बनाए रखिए।देश को प्रगतिशील ,वैज्ञानिक सोच और मानव अधिकारों की रक्षा करने वाले राष्ट्र में बदलने के अपने संघर्ष को जारी रखो।
देश को स्वतंत्रता प्राप्ति की सालगिरह की क्रांतिकारी शुभकामनाएं।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र
राजकीय बाल विद्यालय धर्मशाला की फेसबुक पोस्ट


गाड़ी का फंडा।

 गाड़ी का फंडा।

दिलचस्प है।।ध्यान से पढ़िएगा।
आपने गाड़ी ली।।कीमत 15 लाख रुपए।
सरकार की नई स्क्रैप पॉलिसी में आप इस गाड़ी को सिर्फ 15 साल चला पाएंगे। फिर उसे कबाड़ समझा जायेगा और निर्माता कम्पनी को वापिस कर दिया जायेगा।मतलब आपने गाड़ी किराए पर ली है 15 साल के लिए, वार्षिक किराया 1 लाख रुपया।
अब गाड़ी पर 6 % की दर से आपने पंजीकरण फीस दी और इंश्योरेंस लिया कुल 1.50 लाख रुपया।अगले 15 वर्षों तक आप कुल 3.50 लाख रुपया इंश्योरेंस का देंगे ।दोनो मिला के 5 लाख रुपया।यानी 34 हजार रुपया प्रतिवर्ष ।
तो अभी आपने गाड़ी चलाई ही नहीं और उसका एक साल का औसतन खर्चा हो गया एक लाख 33 हजार रुपए।
चलो अब चलाना शुरू करते हैं।औसतन आपकी गाड़ी एक साल में 30 हजार किलोमीटर चलती है।तो सिर्फ पेट्रोल और डीजल का खर्चा हुआ 1.80 लाख रुपए।गाड़ी की सर्विस, टोल टैक्स,कंपोनेंट रिप्लेसमेंट, टायर बदलवाने और धुलवाने का औसतन खर्चा 70 हजार सालाना के आस पास बैठता है।
मतलब गाड़ी चलाने का कुल खर्चा कोई 3 लाख रुपए सालाना के आस पास ।
मैं ये मानकर चल रहा हूं की आप बैंक से लोन नहीं ले रहे।अगर ले रहे हैं तो उसका ब्याज भी जोड़ लीजिए।15 लाख लोन अगर आप पांच साल के लिए लेते हो तो उसका ब्याज 3 लाख 90 हजार रुपए बनता है।
तो कुल मिला के 15 लाख रुपए की गाड़ी,15 साल के लिए हर साल आपका 4.5 लाख रुपए डकार जाती है।
आपको जानकर हैरानी होगी परंतु इस 4.5 लाख रुपए में से पेट्रोल पर 60₹ प्रति लीटर टैक्स और गाड़ी की कीमत , इंश्योरेंस ,सर्विसिंग पर 18% जी एस टी, टोल टैक्स,रजिस्ट्रेशन फीस सीधा सरकार को जाता है।मतलब 4.5 लाख रुपए में से लगभग 3 लाख रुपए सीधा सरकार की तिजोरी में।
और आप हैं की 240 रुपए के कोविड वैक्सीन को भी फ्री मानकर खुश हो जाते हैं।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र 
राजकीय बाल विद्यालय धर्मशाला की फेसबुक वाल

Sunday, 20 June 2021

पुरुष:02 सेक्सटोर्शन

 पुरुष:02

सेक्सटोर्शन 
सावधान लेख में प्रयुक्त शब्द आपको विचलित कर सकते हैं।अगर आप पुरुष वर्ग के साथ घटित हो रही घटनाएं जो उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को समाप्त कर रही हैं,परिवार को तोड़ रही हैं और एक्सटोर्शन से भारी आर्थिक और मानसिक हानि के बारे और उनकी बेहद कमजोर होती न्यायिक स्थिति के बारे में दिलचस्पी नहीं रखते तो ये लेख आपके लिए नहीं है।
घटनाएं सत्य हैं परंतु उनकी पहचान छुपाने को मैने नाम और स्थान बदल दिए हैं।
समीर टिंडर डेटिंग एप्लीकेशन पर स्वीटी नाम की किसी लड़की के संपर्क में आया।ब्लाइंड डेटिंग एप्लीकेशन का घाटा ये है की यहां सब फ्रॉड है।अधिकांश प्रोफाइल,डाली गई पिक्स और उनके विवरण फ्रॉड हैं।
लड़की ने समीर में दिलचस्पी दिखाई।कुछ दिन चैट करने के बाद फेसबुक लिंक शेयर किए।फेसबुक पर मित्रता के बाद अब समीर को पता चला कि टिंडर पर स्वीटी नाम से काम चला रही लड़की का नाम रूही शर्मा है।दो तीन प्रोफाइल पिक्स के अलावा रूही ने अधिकांश धार्मिक वीडियो शेयर किए हुए हैं।
समीर की रूही के साथ मैसेंजर पर चैट होना शुरू हुई।
पुरुष प्राकृतिक तौर पर सेक्सुअली एक्टिव है।एक बार हाइपोथेलेमस ग्रंथि शरीर में टेस्टाट्रॉन हार्मोन का स्राव कर दे फिर पुरुष कामोत्तेजक हो जाता है ।दिमाग को डोपामाइन हार्मोन अपने कब्जे में ले लेता है और फिर सोचने समझने की ,अच्छा बुरा में फर्क करने की शक्ति को पूरी तरह समाप्त कर देता है।
धीरे धीरे समीर और रूही की चैट अश्लील होती गई।रूही ने अपनी नेकेड पिक्स जिनमे उसका चेहरा नहीं दिख रहा था समीर के साथ शेयर की।
समीर ने रूही से मिलने की इच्छा प्रकट की।आरंभिक निमंत्रणों को रूही ने ठुकरा दिया।परिवार का, पिता जी के बेहद अनुशासित होने का तर्क दिया।समीर रूही को ले कर आश्वस्त होता गया।
फिर फोन नंबर एक्सचेंज हुए और व्हाट्सएप पर रात को लंबी चैट्स का दौर शुरू हुआ।चैट्स अश्लीलता की हद से परे थी।
समीर ने वीडियो कॉल की कोशिश भी की परंतु रूही ने इंकार किया।रूही का तर्क था की इंटरनेट सेफ नहीं है।वीडियो कॉल के लिए तो बिलकुल नहीं।
समीर ने ऑडियो काल से ही काम चलाया।एक दो हफ्ते की चैट और ऑडियो काल के बाद रूही समीर से मिलने को तैयार हो गई।समीर चंडीगढ़ में रह रहा था।रूही ने बताया कि उसकी कोई सहेली वहां  जॉब कर रही है तो वो सहेली के पास रुकेगी।सहेली कंपनी के रेस्ट हाउस का कमरा बुक करवा लेगी और हम वहां रहेंगे। मैं वहां की लोकेशन व्हाट्सएप पर सेंड के दूंगी तुम आ जाना।
अब ये लोकेशन भेजने और उसको फोलो करने के ट्रेंड में कोई ये पूछ के राजी नहीं की जगह क्या है?रेस्ट हाउस किस कंपनी का है।
नीयत समय पर समीर रूही की भेजी लोकेशन पर पहुंच गया और फिर दोनो ने रात वहां गुजारी।
अगले दिन समीर ऑफिस आ गया और रूही अपनी सहेली के पास वापिस चली गई।
उसके बाद रूही का फोन बंद हो गया।समीर ने बहुत बार कोशिश की ,परंतु दो दिन तक रूही से बात नहीं हो पाई।
तीसरे दिन समीर सो के उठा,आदतन फोन के व्हाट्सएप मैसेज चेक करे।किसी अनजान नंबर से कोई मैसेज आया था।समीर ने कतुहल वश देखा तो मैसेज लिखा था वीडियो का आनंद लें।समीर ने वीडियो डाउनलोड किया।उसकी आंखे फटी की फटी रह गई जब उसने वीडियो में अपनी और रूही के अतरंग दृश्यों को देखा।वीडियो में समीर का चेहरा साफ था परंतु एडिट ऐसे किया गया था की रूही की शक्ल न दिख पाए।
समीर कांप गया।
थोड़ी देर बाद दूसरा मैसेज आया" अगर आप चाहते हैं की ये वीडियो आपके घर वालो के पास,आपके फेसबुक फ्रेंड्स के पास न पहुंचे तो एक लाख रुपया इस अकाउंट में फौरन डालें"
समीर ने मैसेज भेजने वाले से मिन्नतें की ।रोया।पैसा डालने की बात मानी पर वीडियो किसी को न भेजने की याचना की।इक लाख रुपया मैसेज वाले के अकाउंट में डाल दिया।
एक्सटोरशन वाले वहीं नहीं रुके।तीन चार दिन बाद फिर वहीं मैसेज।समीर ने फिर से पैसे दिए।ये क्रम चलता गया।कोई पांच लाख लेने के बाद जब फिर पैसे की मांग हुई तो समीर ने किसी दोस्त से पैसे उधार ले कर ब्लैकमेलर को पैसे दिए और बताया कि अब उसके पास पैसे नहीं हैं।
अगली बार जब ब्लैकमेलर का फोन आया तो समीर सामाजिक प्रतिष्ठा खोने की सोच से इतना डर गया की उसने आत्महत्या कर ली।
एक दो हफ्ते बाद समीर की बहन को रूही का फोन आया की समीर फोन नहीं उठा रहा।समीर की बहन ने रूही को समीर की आत्महत्या के बारे में बताया।
फिर किसी और ने वोही वीडियो समीर की बहन को भेजे और वायरल करने की धमकी दे पैसे की मांग की।
समीर की बहन समझदार थी।सीधी पुलिस के पास पहुंची।पुलिस ने जब जांच शुरू की तो सारे फोन जिनसे कॉल और मैसेज आ रहे थे वो बंद हो गए।पुलिस इंक्वायरी अभी चल रही है।
मेरे एक मित्र जो बड़े अमीर व्यापारी हैं उनको हर दिन अपने फोटो फेसबुक पे डालने का शौक है।वो अलग अलग कोनो से अपने फोटू खिंचवा फेसबुक पे डालते रहते हैं।एक दिन उनको भी व्हाट्सएप पर किसी अनजान नंबर से मैसेज आया ।वीडियो था।वीडियो में वो किसी अनजान महिला के साथ अतरंग थे।व्यापारी मित्र हैरान परेशान।किसी ने उनके फोटू फेसबुक से चुरा के किसी एप्लीकेशन का इस्तेमाल कर वीडियो के पुरुष के साथ उनका चेहरा बदल दिया था।
मैसेज भेजने वाले ने पैसे की डिमांड रखी।व्यापारी मित्र ने  देने से मना के दिया ।क्यों दे।जब उन्होंने कुछ किया ही नहीं।मैसेज भेजने वाले ने फिर धमकाया की आपके मित्र जिनको वीडियो भेजा जाएगा उनको थोड़े पता की आप है की नहीं।।दिख तो आप ही रहे।सोचो जब ये वीडियो आपकी बीवी और बच्चों के पास जायेगी।
व्यापारी मित्र डर गया।एक दो बार पैसे दे कर अपने किसी पुलिस वाले मित्र को बताया।पुलिस ने केस रजिस्टर कर सी आई डी को केस सौंपा।इंक्वायरी में पता चला कि गिरोह किसी दूसरे राज्य का है।गिरफ्तारी के बाद गिरोह ने बताया कि वो ऐसे हजारों फिरौतिओ को अंजाम दे चुके हैं।
एक्सटोर्सन अपराध है। आपकी सेक्सुअल भावनाओं को भड़का आपसे पैसे ऐंठना सेक्सटोरसन कहलाता है और आजकल ये बहुत बुरी तरह फैला हुआ है।
अभी हाल ही में चार पांच वीडियो मैंने भी देखे जिन्हें पैसे लेने के बावजूद ब्लैकमेलर ने संबंधित पुरुष के फेसबुक फ्रेंड्स को भेज दिया।इनमे दो तीन मेरे शिक्षक मित्र भी हैं और कुछ मेरे अच्छे जानकारभी।
सभी वीडियो एक जैसे हैं।एक महिला निवस्त्र हो के वीडियो चैट पर मैथून करती हुई नजर आती है और पुरुष को नग्न हो मैथुन करने का निमंत्रण देती है।पुरुष को चूंकि सेक्सुअली ट्रैप करना बेहद आसान है तो वो भी वीडियो चैट पर नग्न अवस्था में शुरू हो जाते।
इन सभी वीडियो जो मैने देखे उनमें महिला एक ही है ।इसका अर्थ हुआ की वीडियो चैट पर महिला का अश्लील वीडियो रिले किया जा रहा वहां कोई असल महिला थी नहीं ,वास्तव में एक गिरोह वीडियो आपका बना रहा था।
अब वीडियो लीक करने की धमकी और फिर पैसा वसूली।
ये सेक्सटोर्शन है।मेरी नजर में मानवता की सबसे नीच स्तर की धोखधड़ी।
मुझे नहीं पता की कितने समीर अब तक आत्महत्या कर बैठे हैं और कितने अब तक सामाजिक प्रतिष्ठा समाप्त होने के डर से,परिवार टूटने के डर से,अनोखे अपराध बोध से ग्रसित होने के डर से लूटे जा रहे हैं।बताएंगे नहीं पर मेरा यकीन मानिए हर सौ में से एक पुरुष इसका शिकार है।कोई नहीं बचा है ना नेता ,ना अभिनेता,ना पुलिस अधिकारी ,न कोई और।
बस इस अनोखे डर से मानसिक तनाव में हैं और आर्थिक तनाव में भी।किसी को बताए भी तो क्या?दोषी तो आप ही हैं।
फेसबुक ,टिंडर,व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम आपका वक्त और मानसिक शांति दोनो निगल रहे।
गंदा बेशक है,पर नए दौर का  डिजिटल धंधा है ये।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल।

ओल्ड पेंशन स्कीम :

 ओल्ड पेंशन स्कीम :

 मुझे नहीं पता कि आपको पता है या नहीं परन्तु ये विचित्र सत्य है कि कोई अगर विधानसभा,लोकसभा या राज्यसभा का चुनाव जीत जाए और केवल शपथ ग्रहण कर ले तो वो आजीवन 70,000₹ पेंशन का हकदार हो जाता है ।यहां तक की यदि शपथ के फौरन बाद उसकी मृत्यु हो जाए तो ये पेंशन उसके आश्रित परिवार पर तुरन्त प्रभाव से लागू हो जाएगी।
इससे भी हैरानी जनक तथ्य ये है कि आप जितनी बार चुने गए आपको उतनी ही पेंशन लगेगी। मान लीजिए कि आप पांच बार विधान सभा के लिए चुने गए तो आपको चार पेंशन और एक तनख्वाह मिलेगी।मतलब आपकी महीने की औसत कमाई 4,3०,00० ₹ है।
पंजाब में ली गई एक आर टी आई में ये खुलासा हुआ कि 129 ऐसे वर्तमान या पूर्व विधायक हैं जो सात - सात पेंशन लेे रहे मतलब औसतन कोई पांच लाख रुपया महीना।।
भई वाह।इसमें कोई बुराई नहीं।
परंतु कैमरे का फोकस दूसरी ओर करिए।एक सरकारी कर्मचारी पर।30-35 साल लगातार काम करने के बाद कोई पेंशन नहीं।न्यू पेंशन स्कीम का झुनझुना जो किसी निजी कम्पनी के रेहमोकरम पर है और शेयर मार्केट के रुख पर भी।निजी कम्पनी कब भाग जाए इसकी कोई गारंटी नहीं।बैंक दिवालिया घोषित हो जाए तो आपको आपकी जमा पूंजी का कुल 10% ही आपको बैंक वापिस करने को बाध्य है,ऐसा आपके बैंक खाता खोलते समय शर्तों के कॉन्ट्रैक्ट पर लिखा है जो आपने कभी पढ़ा ही नहीं।
तो सवाल ये है कि पेंशन आखिर देता कौन है?क्या सरकार? क्या वो इस लायक है?क्या वो पैसा छापती है और फिर आपको उसको खर्च करने को देती है ?या फिर सरकार चला रहे कुछ चुने हुए नुमाइंदे अपनी जेब से पेंशन दे रहे?
नहीं।
आप अर्थ शास्त्र के बनावटी सिद्धांतो ,खास कर पूंजीवादी अर्थ शास्त्र के खोखले सिद्धांतो के मक्कड़ जाल में मत उलझिए।
सीधी सी बात ये है कि किसी भी देश की कुल आय उसके मानव संसाधन द्वारा किए गए पुरुषार्थ पर निर्भर करती है।ये वास्तव में आपका ही पुरुषार्थ है जो देश की संपूर्ण आय का निर्माण करता है।आपके द्वारा सम्पूर्ण समाज हित में किए गए उद्यम का हिस्सा है जो टैक्स अथवा अन्य मदों से सरकार तक पहुंचता है।
तो फिर जब आप पुरुषार्थ करने योग्य नहीं रहेंगे,आपकी धमनियों में रक्त प्रवाह शिथिल हो जाएगा तो आपको वही समाज भूखे मरने ,लाचारी से किसी दूसरे का मुंह ताकने,बीमारी में मंहगे हस्पताल के बाहर ठंड से मरने को छोड़ देगा।
जिस पुरुषार्थ के बल आप खुद्दारी से अब तक जीते आए उसके शिथिल होते ही आपको निरीह सब्जी समझ छोड़ दिया जाएगा।
कदापि नहीं।
खुद संपूर्ण समाज को ही इस बेइज्जती,जलालत,घोर अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होना होगा।
इसलिए ताकि आप ,हम और हम से हर कोई अपनी जिंदगी को शान से समाप्त कर सके ।जलालत की मौत किसी को भी नसीब ना हो।
पेंशन बुनियादी अधिकार बने।कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन स्कीम हर हाल में पुनः लागू हो।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता: भौतिक शास्त्र
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल

Saturday, 29 May 2021

क्या हुतियापा चल रहा।

 क्या हुतियापा चल रहा।

बच्चे की ऑनलाइन डांस क्लास।। बच्चा कमरा बन्द कर के डांस कर रहा।वहां मैडम जी अकेले म्यूजिक लगा के , कमरे में ठुमके लाइव कर के क्लास लगा रही।
मम्मा का मोबाइल तो आजकल बच्चे का मोबाइल बना हुए।स्कूल से ज्ञान लाइव हो रहा।लाइव ज्ञान में मम्मा बच्चे के साथ बैठी हुई।पानी,खाना,बिस्किट,मैगी,अंगूर हर पांच मिनट में बच्चे के मुंह में ठूंस रही।अब मोबाइल बच्चे के पास है तो वॉट्सएप और फेसबुक तो सौतेलेपन से रो रहे।
बाप बेचारा टी वी लगाए तो बच्चा चीख पड़ता ," पापा साउंड म्यूट करो,क्लास चल री,,,समझ नी आता आपको।"
बाप बेचारा करे तो क्या करे,मोदी जी भी मन की बात लिख कर नहीं करते की पढ़ ही लेते।
अध्यापक परेशान।हर तरफ से।कुछ इसलिए की ऑनलाइन मटेरियल बनाएं क्या तो कुछ इसलिए की जो बनाया उसे पहुंचाएं कैसे।।इतना डाटा तो है ही नहीं अपलोड करने को।कुछ ज़ूम और गूगल की सहायता से वर्चुअल क्लास रूम की कोशिश में थे पर घर पर किसके पास बोर्ड और हाईलाइटर।कुछ वीडियो बना के यू ट्यूब पर अपलोड कर रहे और परेशान हो रहे की उनके व्यू की संख्या 100 से ऊपर नहीं जा रही।विभाग ने विडियोज तैयार करवाए वो इतने बोरिंग की दो मिनट में उबासी ,पांच मिनट में आंख बन्द और दस मिनट में खर्राटे।
आई डी धीमान जी शिक्षा मंत्री थे।मेरे पिछले एक स्कूल में एनुअल डे पर मुख्य अतिथि थे।अपने शिक्षण के दिनों में इसी स्कूल में उन्होंने कोई दस साल सेवाएं दी थी।अपने अभिभाषण में बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल पर बेहद सख्त दिखे।मैंने पूछ लिया,इतनी सखती काहे को, लाने दो बच्चों को मोबाइल स्कूल ।बोले तुमको नहीं पता ,ये स्कूल मोबाइल ला के पूरा दिन उस पर गाने सुनते रहते।मैंने भी चुटकी ली ,"तो साहब गाने गाए ही सुनने के लिए जाते।" वो मुस्कुरा के टाल गए पर अगले दिन बड़े कठोर आदेश मोबाइल के इस्तेमाल पर शिक्षा विभाग ने निकाले।अब वो ही मोबाइल सुभा से शाम बच्चों के गले की घंटी बने हुए हैं।
आंखे फुट जाएंगी।ब्लू लाइट आंखो के विट्रियस ह्यूमर को ना ठीक होने वाली हानि पहुंचा रही। सूजी,लाल और खारीश करती आंखो को बोरिक एसिड से धुलवाना मम्मा के काम में एक नया जुड़ाव है।
मम्मियां दुखी।सुभा ऑनलाइन क्लास ,शाम को ऑनलाइन टेस्ट।ना जिम,ना वॉक।दो महीने में ही शरीर सुराही हो लिया।बीच के टायर नए इंसानी शरीर का प्रारूप बता रहे। दरजी परेशान ऐसा लिबास कैसे बनाएं जो ऊपर नीचे से टाईट और बीच से झोला हो।
बाप थक गया सब्जियां ढो ढों के।शाम को ऑफिस में शहनाइयां बजा के ,सब्जी,चावल , आटा दाल का बोरा घसीट के घर पहुंचे तो बच्चे की ऑनलाइन क्लास के चक्कर में मम्मा बीजी हैं।कोई पानी का गिलास पूछ के राजी नहीं। चूसे हुए आम की तरह का थोब् डा उठा खुद ही फ्रिज से पानी पीता तब कहीं खरबूज में थोड़ा बहुत पानी पड़ता।
क्या है यार।क्या हुटियापा है।
फीस के चक्कर में बेचारी बसंती अकेले कमरे में नाच कर बच्चों को ऑनलाइन नचवा रही।वीरू की बाहें बंधी हुई जंजीरों के साथ।
गब्बर एयर कंडीशन कमरे में बैठ सांबा और कालिया से फीडबैक ले रहा और डायलॉग झाड़ रहा," कितने आदमी थे....ऑनलाइन"
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वॉल

सामाजिक दूरी ,कब तक :

 सामाजिक दूरी ,कब तक :

अब तो अरबों दिमागों में ये सवाल प्रति तीस सेकंड की दर से कोंध रहा होगा।आखिर ये समाजिक दूरी कितने समय और चलेगी।।क्या लॉक डॉउन शिघ्र ख़तम हो जाएगा।हमें कब तक घरो में रहने के लिए कहा जाएगा।
जवाब है।
अभी बहुत लंबी चलेगी ये सामाजिक दूरी।शोध लगातार जारी है।खूब सारे शोध और उनके परिणामों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि ये क्रम बहुत लंबा चलने वाला है।
सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए बहुत सारे बिंदु ध्यान में रखने पड़ेंगे।
इन बिंदुओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है झुंड प्रतिरक्षा(herd immunity) ।झुंड प्रतिरक्षा आम जन का प्रतिशत है कि पूरी जनसंख्या का कितना हिस्सा वायरस के लिए अपने शरीर में प्रतिरक्षा उत्पन्न के चुका है।अगर जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा वायरस से प्रतिरक्षा उत्पन्न कर चुका है तो फिर बीमार लोगों द्वारा स्वस्थ लोगों को इनफैक्ट करने का बहुत कम मौका है।वायरस के पास ट्रांसमिट होने का कोई मौका नहीं होगा।इससे महामारी रुक जाएगी और मृत्यु दर पर काबू पाया जा सकेगा।
झुंड प्रतिरक्षा हासिल करने के दो तरीके हैं।पहला की कम से कम तीन चौथाई जनसंख्या को वायरस से संक्रमित किया जाए।सामाजिक दूरी निसंदेह इंफेक्शन कम करने और मृत्यु दर पर काबू पाने का सबसे सरल तरीका है।परंतु सामाजिक दूरी झुंड प्रतिरक्षा उत्पन्न करने में सबसे बड़ी बाधा भी है।
दूसरा तरीका सार्स कोव-2 के लिए वैक्सीन त्यार करने और उसे लगने का है।परंतु सच्चाई ये है कि इस वायरस का टीका त्यार करने में हमें अभी कम से कम 18 महीने लगेंगे।
तीसरा तरीका जिससे समाजिक दूरी को शीघ्र समाप्त किया जा सकता है वो है कम्युनिटी टेस्टिंग।हमें बड़े स्तर पर वायरस टेस्ट करने होंगे।ये टेस्ट नए मरीजों कि जल्द पहचान करेंगे और स्वस्थ्य सेवाओं में लगे पेशेवरों को उनको आइसोलेट करने में देरी नहीं लगेगी।अधिकांश लोग जो वायरस लिए घूम रहे हैं उनमें इंफेक्शन के कोई लक्षण नहीं दिखते।70% लोग जो इंफेक्शन ग्रस्त होते हैं वो बिल्कुल भी बीमार नहीं पड़ते परंतु वायरस लगातार ट्रांसमिट करते रहते हैं।इसलिए टेस्ट की संख्या को बढ़ाना बेहद आवश्यक है।ताकि हर वायरस कैरियर को आइसोलेट किया जा सके और सोशल डिस्टैंस को घटाया जा सके,लॉक डॉउन को समाप्त किया का सके।
विज्ञानिको के पास ऐसे कोई सबूत नहीं है कि तापमान में वृध्दि के साथ वायरस के फैलाव में कमी आएगी।हालांकि अगर ऐसा हुआ तो लॉक डॉउन में आंशिक कमी की जाए।
कोई नहीं जानता के ये महामारी एक साल लेगी या इस से अधिक समय।इसलिए सरकारों को सामाजिक दूरी और सीमित लॉक डॉउन की नीतियां बनानी पड़ेंगी।इंफेक्शन का स्तर तय करेगा कि कितने वर्षों तक सामाजिक दूरी और घूमने पर पाबन्दी रहेगी।सामाजिक दूरी महामारी से युद्ध में मददगार है परन्तु शोधकर्ताओं को डर है कि लॉक डॉउन और सामाजिक दूरी कि शर्ते हटाने के बाद महामारी के और भी घातक स्वरूप में फैलने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।
सामाजिक दूरी का सरल सा अर्थ है कि अपने आप को दूसरे मनुष्य से कम से कम सात फीट की दूरी पर रखिए।महीनों तक घर से काम कीजिए और स्कूल ,कॉलेज को कई महीनों तक भूल जाइए।परिवार या मित्रों के साथ किसी के घर अथवा किसी अन्य जगह कतई मत जाइए।दुकान, मॉल या सब्जी लेते समय भी दूसरे व्यक्ति से कम से कम सात फुट की दूरी रखिए।चूंकि वायरस के फैलने का मुख्य कारण हवा में उपलब्ध वायरस युक्त तरल बूंदे हैं जो संक्रमित व्यक्ति के छींकने और खांसने से निकलती हैं।सात फुट की दूरी इस बात को सुनिश्चित करेगी कि ये बूंदे आपके नाक ,मुंह और आंखो से आपके शरीर में नहीं घुसी।
ताजा शोधों से ये भी पूर्णतः साबित हो गया है कि ये वायरस लेबोरेटरी में नहीं बना है बल्कि प्रकृति जनित है।विश्व भर के शोधों से एक ही परिणाम सामने आया है कि चीन के बूहान की गैर कानूनी मांस बाजार में ये वायरस मनुष्यों के शरीर पर आक्रमण कर गया।चूंकि वुहान और इटली का जबरदस्त व्यपारिक जुड़ाव है,लगभग एक लाख लोग प्रति सप्ताह वुहान और इटली के बीच सफर करते हैं ,इस कारण ये इटली में बुरी तरह फैला।फिर संक्रमण वैश्विक होता गया।
इटली की समस्या उसकी 30% जनसंख्या है जिसकी उम्र 60 साल से ऊपर है और वो दुनिया कि दूसरी सबसे बुढ़ी जनसंख्या का घर है।शायद इसीलिए वहां मृत्यु दर अधिक है।हालांकि इस शोध को जापान पर लागू नहीं किया ज सकता जहां की 35% जनसंख्या 60 के पार है परंतु अभी तक वायरस इंफेक्शन से एक भी मृत्यु नहीं है।
तो कुल मिला कर अभी सामाजिक दूरी और लॉक डॉउन का सिलसिला बहुत लंबा चलने वाला है।सरकारें बहुत प्रयत्न कर रही हैं। सारा प्रशासनिक ,पुलिस और स्वास्थ्य अमला अपने आपको झोंका हुआ है सिर्फ आपकी जान को बचाने के लिए।
एक आप हो की कभी तबलीगी जमात के वाहियात , अविज्ञानीक और गैर जिम्मेदाराना भाषणों को सुन ने मुंह उठा के चल देते।कभी अयोध्या चल देते,गीता पाठ सुनने चल पड़ते तो कभी गुरद्वारों में इकठ्ठे हो जाते।
अब तो सुना आपने अपनी जान जोखिम में डाल कर आपको बचाने निकले डॉक्टर्स को पत्थर मारना शुरू कर दिया,उनके मुंह पर थूकने शुरू कर दिया।
आइने के सामने खड़े हो के अपने आप को देखिएगा।आइने में आपको एक बेहद घटिया,धर्मांध,गैर जिम्मेदार,नीच नजर आएगा।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता: भौतिक विज्ञान,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल से
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Thursday, 20 May 2021

 कपड़े।।।

वट्स एप्प पर मैने शिक्षक नामक ग्रुप बनाया है ।इस ग्रुप में मेरे बेहतरीन प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय के शिक्षक और जानकार प्रिंट ,वेब और टी वी पत्रकार मित्र शामिल हैं ।ग्रुप में आम तौर पर किसी न किसी ज्वलन्त विषय को लेकर सटीक विश्लेषण ,उम्दा बहस और कभी कभार भयंकर युद्ध जैसे हालात उतपन्न हो जाते हैं।
आज किसी शिक्षक मित्र ने शिक्षा विभाग द्वारा जारी शिक्षकों को साधारण कपड़ो में स्कूल आने की सलाह वाला पत्र इस ग्रुप में पोस्ट करा।मजेदार बात ये थी की जब मैंने इस पत्र को पढा उसी समय मैं अमेजॉन किंडल पर चम्पारण सत्याग्रह को पढ़ रहा था ।
चम्पारण सत्याग्रह निसन्देह मोहन दास कर्म चंद गांधी को राष्ट्र पिता महात्मा गांधी में परिवर्तित करने वाला पहला कदम था ।इस आंदोलन की खास बात बापू के कपड़े थे।इससे पहले वो अंग्रेजी पेंट और कमीज पहनते थे।इसी आंदोलन में उन्होंने अंग्रेजी कपड़े छोड़े और धोती ,कुर्ता और सर पर गमछा धारण कर गांव गांव जा जनता को जगाना शुरू करा।साधारण जन समूह में गांधी की छवि घर कर गई।अंग्रेजी सरकार की नीवं में दरार उतपन्न हुई।उनकी समस्या बमुश्किल 45 किलो,ठिगने और पतले शरीर वाले गांधी नहीं बल्कि उनकी महामानव बनने वाली छवि बन गई।मशहूर अखबार " पायनियर " के साथ मिल कर अंग्रेजी हुकूमत ने गांधी की छवि को बिगाड़ने का काम शुरू किया।हर दिन पायोनियर अखबार गांधी के विरुद्ध कोई न कोई लेख लिखता और हर लेख में गांधी के कपड़ो को निशाना बनाया जाता।बहुत वक्त तक गांधी ने इन लेखों पर चुप्पी साधे रखी परन्तु पानी सिर से ऊपर बह जाने के बाद गांधी ने पायोनियर अखबार को अपनी वेशभुसा के बारे में एक पत्र लिखा ।उसके आखिरी वाक्य ये थे "...... कपड़े आपकी सहूलियत के अनुसार होने चाहिए।धोती कुर्ता मुझे बेहद सहूलियत और आराम देते हैं, गमछा इसलिए सिर पर धारण करता हूँ क्योंकि ये भीषण गर्मी से बचाता है।कपड़ों को किसी धर्म ,सम्प्रदाय ,जाती या पूर्वी अथवा पश्चिमी सभ्यता में बांधना सबसे बड़ी मूर्खता होगी...... "
ये पत्र जब पायोनियर अखबार के मालिक और प्रधान संपादक के पास पहुंचा तो वो खुद गांधी से मिलने आये।उनसे माफी मांगी और ये पूरा पत्र अगले दिन के अखबार में माफी सहित छापा।
मुझे बिल्कुल नहीं पता कि मेरे विभाग के अधिकारियों का साधारण कपड़ो से अभिप्राय क्या है।कपड़ों का शिक्षा की गुणवत्ता से क्या लेना देना है, ये भी मुझे नहीं पता।अगर ये पत्र महिला अध्यापको के लिए है तो फिर पत्र जारी करने वाले अधिकारियों को तुरंत प्रभाव से अपना पद तय्याग देना चाहिए क्योंकि सामन्त वादी सोच के लोगों के लिए शिक्षण व्यवस्था में कोई जगह है ही नहीं।इस पत्र का क्या संदेश है ,इसके लिए तुरन्त एक वर्कशॉप विभाग को आयोजित करनी चाहिए जिसमें शिक्षक, न्याय विद ,फैशन डिज़ाइनर ,जनता के चुने हुए प्रतिनिधि और सबसे जरूरी " स्वतन्त्र और गणतांत्रिक देश " की असली परिभाषा समझने वाले बुद्धिमान व्यक्ति भी बुलाये जाने चाहिए।
याद रखिये " गन्दगी कपड़ो में नहीं होती , देखने वाले कि नजरों में होती है .... "
मैं फिर बापू के ऐतिहासिक पत्र की पंक्ति दोहरा दूं.... " कपड़े आपकी सहूलियत के अनुसार होने चाहिएं....... "
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र ,
राजकीय आदर्श विद्यालय सरकाघाट की फेसबुक वाल

खौफ का अध्यापक :

खौफ का अध्यापक :

कभी कभार कड़वाहट अच्छी होती है ।आज कुछ कड़वा हो जाए।
मुझे नहीं पता , आप कितनी एकेडमिक चर्चाओं में हिस्सा लेते है , बेहसो में सर खपाते है या फिर घटनाओं पर मंथन करते हैं।लेखनी से आपके मतलब की चीज निकले आप वाह वाह करते हैं ,कुछ विरूद्ध निकले हाय हाय मच जाती है।
अच्छा है।लेख वहीं सार्थक जो झनजोड के रख दे।
आज बात खौफ की।शिक्षक के खौफ की।
एक पूरा साल अपनी आंखो के आगे ले आओ।।पूरा शैक्षणिक वर्ष ।आप शिक्षक है या नहीं अपने हिसाब से ,अपनी चेतना अनुसार एक साल गढ़ लीजिए।
जनवरी फरवरी निकल लिया।शिक्षक नए ट्रांसफर एक्ट के खौफ में   था।अच्छा होगा या बुरा होगा , भविष्य के गर्भ में है,, पर शिक्षक खौफ में है। कैसी जोन मिलेगी, कैसी छोड़नी पड़ेगी ,खौफ की चर्चाएं गरम हैं।अख़बार शिक्षक को नपाने पे तुले है।खौफ में घी का काम कर रहे हैं।
अब मार्च में नया खौफ तैयार होगा।किस सेन्टर में कैमरे लगे हैं ,रिजल्ट कम होने का खौफ पसरेगा, इंक्रीमेंट जाने का खौफ पासरेगा।किस की सेन्टर सुपरिटेंडेंट की ड्यूटी लगी है, नकल होने देगा या नहीं ,ये खौफ प्सरेगा। फ्लाईंग वाले कितने घंटे बैठेंगे ,खौफ   पैदा करेगा।फिर किस सेन्टर में नकलची पकड़े गए, किस किस सेन्टर सुपरिटेंडेंट को बर्खास्त किया गया ,ये खौफ होगा।
अप्रैल माह में किस शिक्षक ने किस पेपर को गलत चेक करा, अपने दिन के कोटे के पूरे पेपर चेक करे के नहीं ये खौफ पसरेगा ।
मई ,जून में कहां रिजल्ट कम आया, किसकी इंक्रीमेंट रुकी, कहां स्थानीय जनता ने रिजल्ट कम आने पर शिक्षकों के विरूद्ध नारे लगाए, स्कूल पे ताला जड़ा ,शिक्षकों से बदतमीजी करी, विभाग ने नोटिस लिया जैसे खौफ पसरेंगे।
जुलाई अगस्त तो अपने आप में ही खौफ नाक हैं।कहीं कोई बच्चा बेह तो नहीं गया, बच्चे को सांप ने काट लिया, भारी भूस्खलन से शिक्षक स्कूल नहीं पहुंचे, पंचायत प्रधान ने जड़ा स्कूल पर ताला ,जैसे खौफ हर साल खबरों में छाए रहते हैं।
बचे बाकी चार महीने , तो उसमे एम डी एम् में नमक का खौफ, पानी की टंकी साफ करने का खौफ, सिलेबस टाइम पर पूरा करने का खौफ, टीचर डायरी बनानें का खौफ ,इंस्पेक्शन कैडर के स्कूल में आ मामूली गलती को मीडिया में उड़ेलने का खौफ, एनुअल डे में  इलाके के राजनीतिज्ञ को बुलाने अथवा ना बुलाने का खौफ,ऑनलाइन स्कॉलरशिप , बोर्ड फॉर्म  टाइम  पर भरने का खौफ, सेनिटेशन कैंपेन,डिजास्टर मैनेजमेंट और सेंकड़ों अन्य दिवस मनाने का खौफ।
शिक्षक खौफ में है साहब।
हर तरह के खौफ में।कक्षा में शब्दों के प्रयोग का खौफ,सजा ना देने का खौफ,रिजल्ट किसी भी सूरत में पैदा करने का खौफ। बच्चे को प्यार से पुचकारने का खौफ, बच्चे को डांटने का खौफ,एक आधी चपत पर पुलिस केस का खौफ, व्हाट्स ऐप या फेसबुक पर बच्चे से संपर्क साधने का खौफ । उससे कहीं भयंकर , नई पीढ़ी के बच्चों के सामने अपने चरित्र को बनाए रखने का खौफ।
मुझे नहीं पता, आप इस खौफ को देख पा रहे हैं कि नहीं पर महसूस जरूर करते होंगे।
मैंने आपके अप्रस्तुट चेतना के खौफ को शब्द दिए हैं।मेरा यकीन मानिए, शिक्षक जबरदस्त खौफ में हैं।
वैसे कोई मुझे खड़ा हो के समझा दे की ये सैनिटेशन कैंपेन आई पी एच और स्वास्थ्य विभाग वाले क्यूं नहीं चलाते।नाम तो जन स्वास्थ्य    विभाग है।विद्यालयों में पानी की टंकियों को साफ करने का काम भी ये विभाग क्यूं नहीं करता।अच्छा ये भी कोई समझाओ मुझको की हर बुधवार को बच्चों को आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां हस्पताल वाले क्यूं नहीं खिलाते। ये एम डी एम् को टूरिज्म विभाग वाले क्यूं नहीं पकवाते।
जिस किसी को ज्ञान देना हो उसको ये सरकारी विद्यालय ही क्यूं दिखते।एक साल में तीन तीन बार वोटर जगरुक्ता दिवस , डिजास्टर मैनेजमेंट के गुण,पर्यावरण बचाने के नुस्खे, योग के फायदे झाड़ने को सिर्फ सरकारी विद्यालय ही क्यूं।सारा खौफ शिक्षक पर ही क्यूं?
कुछ ज्यादा कड़वा तो नहीं हो गया ?पेट में ख्यालात की गैस थी,डकार मार ली।
कल का अख़बार कहीं ऐसा ना लिखे .. " फेसबुक पर कड़वे बोल लिखने के लिए नपेगा सचिन ... " ;)
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता :भौतिक शास्त्र 
राजकीय आदर्श विद्यालय सरकाघाट की फेसबुक वाल

Saturday, 8 May 2021

मास्क और 5 G :

 विज्ञान लेख 11:

मास्क और 5 G :
बचपन में हम सभी ने किसी ना किसी कक्षा में एक सुपरहिट निबन्ध पढ़ा अथवा लिखा जरूर है," विज्ञान अभिशाप अथवा वरदान "।
मजेदार बात ये है कि इस निबन्ध का आजतक कोई फलसफा निकल ही नहीं पाया।अपनी " विज्ञान लेख" की श्रृंखला के ग्यारहवें लेख में कोशिश करता हूं कि इस द्वंद का पटाक्षेप कर ही दूं।हालांकि आप बहस को लंबा खिंचने के लिए स्वतंत्र हैं।
तो वर्तमान में पूरी दुनिया कोविद महामारी से जूझ रही है।जब में ये लेख लिख रहा हूं उस समय लगभग 10 लाख लोग इस महामारी से मारे जा चुके हैं ।आंकड़ा दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।
हालांकि मृत्यु का आंकड़ा खौफ पैदा करता है परन्तु आजू बाजू करोना संक्रमित लोगों को साधारण ज्वर या खांसी के लक्षणों के अलावा किसी अन्य तकलीफ में ना देख और बिना किसी इलाज के खुद ही ठीक होते देख हैरानी भी होती है और संशय भी होता है कि कोई अदृश्य ताकत नेपथ्य में बैठ इस बीमारी कि स्क्रिप्ट तो नहीं लिख रही है।
मुझे ओबामा का भाषण याद है जब अमेरिकी राष्ट्रीय टेलीविजन पर उन्होंने एच वन एन वन वायरस से 20 लाख लोगों की मृत्यु होने का दावा किया था और सभी अमेरिका वासियों को इसका टीका लेने को कहा था।अमेरिका के लोगों ने टीका लेने को मना कर दिया और मजेदार बात ये कि 20 लाख तो दूर बीस हज़ार लोग भी इस वायरस के संक्रमण से नहीं मरे।फार्मा कम्पनियों को अरबों रुपए का मुनाफा कमाने का मौका हाथ से फिसल गया।
अब करोना संक्रमण के समय भी वैक्सीन युद्ध छिड़ चुका है।कुदरती रूप से स्वस्थ होते लोगों को देख एक नया प्रचार जन मानस के दिमाग पर छोड़ा जा रहा है कि संक्रमण की पहली वेव से बच भी गए तो दूसरी वेव में नहीं बच पाओगे इसलिए वैक्सीन लेना अति आवश्यक है।
अब देखिए,प्रचार एक तरफा हैं।
मास्क को कितना प्रचारित किया गया।
निसंदेह आपका मास्क पहन कर भीड़ भाड़ वाले इलाके में जाना आवश्यक है।परंतु आपको ये कोई नहीं बताता कि घर पर,अपनी गाड़ी में,अपने ऑफिस में जहां आप अकेले हो वहां मास्क हरगिज मत लगाइए अन्यथा ये मास्क आपको करोना से भी कहीं ज्यादा बीमार कर देगा।
समझिए,आपका मास्क आपको कम मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध करवाता है।आपके द्वारा सांस में बाहर निकाली गई कार्बन डाइऑक्साइड गैस आपके मास्क से टकराकर फिर वापिस आपकी सांस से होती हुई आपके फेफड़ों में पहुंच रही है।इसके साथ आप का मास्क जिन तंतुओं से निर्मित हुआ है उसके माइक्रो पार्टिकल भी सांस के साथ आपके फेफड़ों तक पहुंच रहे हैं।उदाहरण तः हलकी मात्रा में उपयोग हुए पलास्टिक के माइक्रो प्लास्टिक कण आपके फेफड़ों में जा रहे जो अनेकों प्रकार के कैंसर आपके शरीर में पैदा करते हैं।ऑक्सीजन की अप्रचुर मात्रा आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को वैसे ही कम कर रही है।
डर ,अवसाद,क्षीण होती आपकी आर्थिक स्थिति,नौकरी जाने का खौफ,सामाजिक अस्त व्यस्तता वैसे ही आपको दिमागी तौर पर कमजोर बना रही जो आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी निश्चित तौर पर असर डालेगी।
अब ऐसी स्थिति में करोना कि दूसरी वेव निसंदेह काफी घातक होगी।
दूसरी विकराल समस्या जो इसी समय उपलब्ध है वो है मोबाइल टकनोलजी में पांचवीं पीढ़ी( 5 जी) की।ये तकनॉलाजी 30 गीगा हरट्स से के कर 300 गीगा हर्ट्स की फ्रीक्वेंसी की रेडिएशन का इस्तेमाल करेंगी।लंबे समय के शोध हमे बताते हैं कि मात्र 1.8 गीगा हर्ट्स की रेडिएशन ही दिल का कैंसर,दिमाग का कैंसर जैसे खौफनाक रोगों को जन्म देती है जिसे अब तक मेडिकल साइंस में गिना ही नहीं जाता। 5 जी का रेडिएशन स्पेक्ट्रम आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को और भी नुकसान पहुंचाएगा।हमारे वर्तमान में इस्तेमाल किए जाने वाले फोन बमुश्किल 500 से 1500 मेगा हर्ट्स की फ्रीक्वेंसी की रेडिएशन इस्तेमाल करते हैं ।
अब जब भारी संख्या में लोग मृत्यु को प्राप्त होंगे तो वेक्सिन लेना आवश्यक हो ही जायेगा और फार्मा कम्पनियां खरबों डॉलर कमाएंगी।
अब ध्यान से सोचिए।
विज्ञान ने मोबाइल का आविष्कार लंबी दूरी तक वार्तालाप करने के लिए बिना तारों का प्रयोग करने को किया था।इंटरनेट पर एडवरटाइजमेंट करने, आभासी दुनिया की आदत लगा,डाटा को द्रुत गामी रफ्तार से पहुंचाने और उससे पैसा कमाने कि मंशा तो विज्ञान कि कतई नहीं थी।ठीक इसी तरह विज्ञान ने भयंकर वायरस से लडने के कई उपाय मानव जाति को सुलभ करवाए है,उसकी आड़ में अरबों खरबों का व्यपार विज्ञान ने बिल्कुल नहीं सिखाया।
ये कुछ बड़े पूंजीपतियों की बेपनाह दौलत समेटने की हवस है जिसने विज्ञान को थोड़ी ही देर के लिए ही सही,परंतु जीवन का ही विरोधी बना दिया है।बन्दर के हाथ में उस्तरा पकड़ा दिया है।
तो फिर बताइए ," विज्ञान वरदान या अभिशाप "?
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल

Saturday, 24 April 2021

करोना के बाद -3 राजनैतिक सफाई:

 ताइवान एक बेहद छोटा सा देश है।

ना ही तो वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गनाइजेशन का सदस्य ना ही यूनाइटेड नेशन ऑर्गनाइजेशन का।
चाइना अभी तक इस देश को अपना नाराज राज्य मानता है और इसे स्वतंत्र देश का दर्जा भी नहीं देता।जापान ,चाइना जैसे बड़े देशों से घिरा हुआ कुछ द्वीपों का समूह।
करोना महामारी से सारी दुनिया कोहराम ग्रस्त है।परंतु ताइवान ने इस महामारी का सामना बड़े ही वैज्ञानिक और तकनीक के इस्तेमाल से किया है। ताइवान वो देश है जहां कॉविड -19 के मामले दुनिया के शुरुआती समय में आना शुरू हुए थे।परंतु पांच महीने गुजर जाने के बाद दुनिया का आंकड़ा जहां 16 लाख पर पहुंच गया ताइवान में अब तक बमुश्किल 500 एक्टिव केस हैं और सिर्फ 7 लोग मृत्यु के शिकार हुए हैं।
ताइवान का करोना से लडने का तरीका बड़ा सीधा था ।इसे हम टी. टी .टी. कहते है।ट्रेस,टेस्ट एंड ट्रीटमेंट।अर्थात पहले खोजो,फिर उसका टेस्ट करो और पॉजिटिव पाए जाने पर उसका इलाज करो।आप हैरान होंगे कि कुल 500 एक्टिव केस होने के बावजूद ताइवान के कठिन और कठोर फैसलों ने 90 हज़ार से ज्यादा लोगों को आइसोलेशन में रखा है।
आप पूछेंगे नहीं की ताइवान ऐसा कैसे कर पाया।
चलिए ।ताइवान की राजनेतिक व्यवस्था को समझते हैं।
ताइवान की राष्ट्रपति डॉक्टर साई इंग वेन लोकप्रिय नेत्री हैं। लदंन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पी एच डी धारी।
ताइवान के शिक्षा मंत्री डॉक्टर पान वेन चुंग ।ताइवान के राष्ट्रीय विश्व विद्यालय से एजुकेशन में पी एच डी धारी।
ताइवान के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर चेन शिह चूंग। ताइपे मेडिकल कॉलेज सरीखे विश्व प्रसिद्ध मदिकल कॉलेज से पास डॉक्टर और जाने माने महामारी विशेषज्ञ।
बस इतना ही काफी है समझने को।परिचयों में ही लेख खप्प जाएगा।
अब अपनी सरकारों पर नजर डाल लीजिए।
हमने कभी ऐसे पढ़े लिखे लोग चुन के भेजे लोक सभा,राज्य सभा या राज्य विधानसभाओं में?
कितने लोग ऐसे हैं हमारी सरकारों में जो ताइवान के सरकारी अमले के सम कक्ष भी ठहरते हों।
भेजेंगे कैसे?
 अभी तो हम वोट ही जाति के हिसाब से देते।धर्म के नाम पर देते।अपने दिल पर हाथ रख के ,अपनी आत्मा को साक्षी मान के सोचिए की जिंदगी में एक आध बार भी किसी कैंडिडेट को उसकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर वोट दिए हो।
काश एक आध हाथ खड़ा होता हां की मुद्रा में।
अधिकांश लोग किसी ना किसी राजनेतिक दल के भक्त हैं।उन्हें उसी पार्टी के उम्मीदवार को वोट देना है चाहे वो जो कोई हो।
अब राजनेतिक पार्टी का उम्मीदवार उसकी हाई कमान तय करेगी।तो सरसरी नजर मारी जाए तो पूरे देश में बमुश्किल 70 से 100 लोग हैं जो पूरे देश के लिए राजनेतिक टिकट तय करते अलग अलग पार्टियों के।आपका तो उसमे कोई रोल है ही नहीं।
फिर काहे का लोकतंत्र।ये तो बड़े बड़े राजनेतिक खानदानों के चौखट पर पड़ी जूती जैसा नहीं है जिसे पांव का इंतजार रहता।
अब सोचिए किसी कॉलेज केडर के असिस्टेंट प्रोफेसर को कैसा महसूस होगा कि उसका प्रिंसिपल मेट्रिक पास बना दिया जाए।
अरे हमे बूरा लगता भाई।स्कूल में जब यूनिवर्सिटी से घिस के निकले हुए कमीशंड लोगों के ऊपर कोई एक्स सर्विस मैन जो बमुश्किल तीन चार साल की नौकरी के बाद ही प्रिंसिपल बना के बिठा दिया जाता तो वो किस कदर नफरत और चिद से भरे होते आप से छिपा नहीं है।1996 में कमीशंड प्रवक्ता के सिर पर जब किसी प्राइवेट स्कूल से निकले सीधे हेडमास्टर भरती से बने प्रधानाचार्य बिठा दिए जाते तो वो अंदर ही अंदर किस क्रोध और हैरानी से भरे होते ये तो मैंने खुद महसूस किया है।
अब सोचिए ,क्या हाल होता होगा उन बड़े बड़े शिक्षाविदों का,बड़े बड़े विश्व विद्यालयों के कुलपतियों का जिनका शिक्षा मंत्री बमुश्किल दस जमात पास हो।
क्या समझाएंगे वो बड़े बड़े वैज्ञानिक उस विज्ञान मंत्री को जिसने कभी विज्ञान ही नहीं पढ़ा हो।
कैसा महसूस करते होंगे वो बड़े बड़े चिकित्सक ,सुपर स्पेशलिस्ट जिन्हे उस स्वस्थ्य मंत्री को जाकर सलाम ठोकनी है जिसे स्टेठोस्कोप डॉक्टरों की फैशन कि वस्तु जान पड़ती है।क्या समझा पाएंगे वो की वेंटिलेटर क्यूं जरूरी हैं।
आप बहस कर सकते की राजनीति से दूर ही रहना चाहिए।ये अच्छे लोगों का काम नहीं है।आप ये भी आडम्बर कर सकते की आप राजनेतिक नहीं है।
परंतु ये बिल्ली के आगे कबूतर जैसे आंख बन्द करने जैसा कृत्य है।आपके पैदा होने के बाद आप जैसे ही पंचायत रजिस्टर में अपने जन्म प्रमाण पत्र के साथ रजिस्टर होते हो,आप राजनीति में शामिल हो जाते हो।
आपको पहले टीके लगना,आपके स्वस्थ्य पर सरकारी नजर,आपका आंगनवाड़ी में फलाहार,आपका प्राइमरी स्कूल,आपकी उच्च शिक्षा सब कुछ राजनीति के उज्ज्वल पक्ष के फलस्वरूप है।
हस्पताल,घर घर पानी,बिजली,यातायात,सड़क,ट्रेन,जहाज सब कुछ राजनीति के ही उज्ज्वल पक्ष हैं।बड़े बड़े डेम,आई आई टी,आयुर्विज्ञान संस्थान,आइं आई एम् , ऐम्स सब कुछ तो उज्ज्वल राजनीति के ही परिणाम हैं।
परंतु साथ ही भ्रष्टाचार,दंगे,कतल,बलात्कार, डाके ,लूट,भाई भतीजावाद ये भी राजनीति के ही सयाह चेहरे हैं।बढ़ती बेरोजगारी,बढ़ते अपराध,बढ़ती बेचैनी ,बढ़ता अत्याचार,बढ़ता पूंजीवाद,बढ़ती अमानवीय मजदूर शर्ते सब राजनीति की ढलान है।
याद रखिए,आपका ,पैदा होने को छोड़ कर ,बाकी सब कुछ राजनीति ही तय करती।यहां तक कि मरने के बाद दफनाना या जलाना तक।
तो फिर आप क्यूं नहीं तय करते की आपकी राजनीति क्या है।बन्द कीजिए ये जाती के नाम पर,धरम के नाम पर और यहां तक कि किसी राजनेतिक दल के नाम पर वोट करना।अलबत्ता तो खुद राजनेतिक रुख करिए या फिर पढ़े लिखे,समझदार लोगों को लोकसभा और विधानसभा में भेजिए।आप जिन लोगों के घर अपनी बेटी को भेजना सुरक्षित नहीं समझते ,उनके हवाले देश को कैसे कर सकते हो?
चाणक्य ने कहा है ," .. जो लोग ये कह कर राजनीति से किनारा कर लेते हैं की ये भ्रष्ट लोगों का काम है,वो ही लोग उन भ्रष्ट लोगों के हाथों सर्वाधिक शोषित होते हैं।आपका राजनीति में हिस्सा ना लेना उन लोगों को आप पर शासन करने का मौका दे देता है जिनकी शक्ल तक आप देखना पसंद नहीं करते... "
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल

Tuesday, 20 April 2021

करोना के बाद :2 शिक्षा और इम्यून सिस्टम:


तूफान को शांत करने की कोशिश बेवकूफी है।तूफान में खुद को शांत करना होता है।तूफान खुद ब खुद गुजर जाता है। कोबिड 19 का ये तूफान भी गुजर जाएगा।
इसके बाद आप नए तरीके से जीना सीखोगे।
इस महामारी से जो सबसे बढ़िया फलसफा पूरी मनुष्य जाती ने सीखा वो बेहतरीन रोग प्रतिरोधक क्षमता के विकास का है।
शोध बता रहे हैं कि बेहतरीन रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को नोवेल करोना वायरस कुछ ज्यादा क्षति नहीं पहुंचा पाया। लाखों मृत्यु का ग्रास बने वायरस इंफेक्टेड लोगों में से अधिकांश लोग या तो ब्जूर्ग थे जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता वैसे ही कम होती या फिर वो थे जो किसी और बीमारी से ग्रसित थे।मात्र करोना इंफेक्शन से इक्का दुक्का जाने ही गई होंगी।
आज चर्चा इम्यून सिस्टम की और शिक्षा की।
पेरेंटिंग कोई आसान काम नहीं है।बड़े बड़े योद्धा इस मोर्चे पर धराशाई होते हैं।
फैशन हो,मज़बूरी हो अथवा अपने बच्चे को सबसे आगे देखने कि ठरक ,हम में से अधिकांश तीन साल की उम्र में अपने बच्चे को स्कूल भेजना शुरू कर ही देते हैं।
निजी स्कूल इस मौके को जबरदस्त तरीके से भुनाते हैं।
के . जी . ।
अब तो यू के जी और एल के जी भी हो लिए हैं।
क्या आपके बच्चे को के. जी .की वाकई जरूरत है ?????
मुझे इस बात को बताने में कोई शर्म महसूस नहीं होती की अपने अध्यापक साथियों से जब भी मैंने पूछा  पूछा की के. जी .का मतलब क्या है तो 80 % लोगो ने इनकार किया ,10 % लोगों ने फुल फॉर्म बताई की ये" किंडर गार्डन" है;बाकी 10 % उसकी सही फूल फॉर्म " किंडर गार्टन" बता गए परन्तु ये है क्या इस बारे उनको कोई जानकारी नहीं थी।।।
आप भी पता लगा लीजिये।।।।90 % स्कूल जो के. जी. के नाम पर ओसतन 3000 ₹ प्रति माह की दर से आपका पैसा लूटते है उनको खुद नहीं पता की ये है क्या।।।।95 % लोग जो इन क्लासेज को पढ़ाते हैं उनको के. जी. कि मूल भूत अवधारणा का कोई ज्ञान है ही नहीं।
आओ समझे कि के. जी. है क्या।
1840 इ में फ्रेडरिक फ्रोब्ल नामक के सज्जन ने बेड ब्लेंक्न बर्ग कस्बे में उन नवजात बच्चो जिनके माता पिता फैक्टरी में काम करते थे उनके लिए ,  दिन में चलने वाले स्कूल की स्थापना की।।। बच्चे  वहां दिन में खेलते ।।उसी दौरान नेचुरो चिकित्सा पद्धति का ये सिधांत प्रतिपादित हुआ की मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास 3 वर्ष की आयु से होना शुरू होता है। इस आयु से 6 वर्ष की आयु की तक के बच्चो को जितना एक्सपोजर हो  उतनी ही बेहतरीन उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता होगी।।। इसलिए आवश्यक है की बच्चे मिटटी में खेलें; घास में दौड़े ; कुओ का पानी पियें; खेतो खलिहानों में सैर करें; भारी मात्रा में कच्ची सब्जियां और फल खाएं।।। 
पहले जर्मनी और फिर फ्रांसिसी क्रांति ने शहरी कर्ण को बड़े पैमाने पर स्थापित किया।।।। शहर बसे जरूर पर घरो का जमावड़ा इतना गहरा था की बच्चों के लिए खेलने की जगह ही नहीं बची।।। इसीलिए किंडर  गार्टन महत्व पूर्ण हो गये।।। बच्चों को शहर से बाहर खेतों और खलिहानों में खेलने के लिए भेजा जाता जहाँ वो सामूहिक रूप से खेलते; गाने गाते और सब्जियां और फल खाते।।। इसी से वो समाजिक बनावट भी सीखते और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी होता।।।।
अपने बच्चों के के. जी .को देखिये।।। ए फॉर एपल ; बी फॉर बैट से ज्यादा कुछ नहीं।। जिन दीवारों से मुक्ति के लिए के.जी. बनाया था, बच्चा उन्हीं में कैद है।
फीस 2000 से 4000 ₹ ।।।
न पढ़ने वालो को कुछ पता न पढ़ाने वालो को ।
 माता पिता से पूछो तो जवाब एक ..."बच्चे का बेस स्ट्रोंग होना चाहिए...."
अगर आपका बच्चा मिटटी में खेलता है; घास पर घूमता है ; कुएं का पानी पीता है ,बाकी बच्चों के साथ खेलता है और दबा के सब्जी और फल खाता है तो बताइए सच में उसे के .जी .की आवश्यकता है क्या???
अब तो निजी शिक्षा की दुक्कानो ने लोवर के. जी .और अप्पर के .जी .भी शुरू कर दी हैं।।। इनका बस चले तो ये पेट में ही बच्चे को सिखाना शुरू कर दें।।।। आखिर बच्चे का बेस जो स्ट्रोंग करना है।।अगर अभिमन्यु सुभद्रा के पेट में चक्रव्यूह समझ सकता है,तो आपका  बच्चा क्यूं नहीं।
याद रखिए किंडर गारटन का शाब्दिक अर्थ "बच्चों का बगीचा" जरूर है परन्तु इसका मूल अर्थ "बच्चा बगीचे में" है।
मैं कितने परिवारों को देखता हूं जो गांव छोड़ शहर में मकान किराए पर ले अपने बच्चों को किसी निजी स्कूल में डाल कर अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं।बच्चे का "बेस "स्ट्रॉन्ग करना है।पर लड़ाई किस बेस की है ये समझ ही नहीं। 
ओ भाई शैक्षिक "बेस" का छोटा सा मतलब होता है कि दसवीं तक आपके बच्चे को दो विषय अच्छे से आने चाहिए।एक अंग्रेजी और दूसरा गणित।पर असली बेस है उसका इम्यून सिस्टम जो सारी जिंदगी उसे स्वस्थ रखेगा,रोगों से बचाएगा,करोना सरीखे इंफेक्शन से सुरक्षित रखेगा।
इसलिए अपने बच्चे पर रहम कीजिए।उसे खेतो में जाने दो।मिट्टी में खेलने दो।तितलियों के पीछे भागने दो।मामूली सर्दी जुकाम के लिए भारी एंटीबायोटिक ना दीजिए ,खुद ब खुद ठीक होने दीजिए।
कुरकुरे,मुरमुरे  की जगह उसे फल,कच्ची सब्जियां दीजिए।पिज्जा बर्गर की जगह मक्की की स्टफ्ड रोटी खिलाएं मक्खन के साथ ।कोल्ड ड्रिंक की जगह लस्सी का बड़ा गिलास हो जाए, नींबू पानी,ब्रह्मी का जूस हो जाए। चॉकलेट ,टॉफी से कहीं ज्यादा टेस्टी आंबला कैंडी होती है।
मैं आशान्वित हूं,की,इस महामारी के बाद चीजें बदलेंगी,सोच बदलेगी।प्रकृति ने गेंद उठा के हमारे पाले में फेंक दी है।अब बारी हमारी है।।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल।

Sunday, 18 April 2021

करोना के बाद :1

 

नमस्ते।
भारतीय संस्कृति की ये सम्मान और आदर की शारीरिक भंगिमा सर्वत्र अपना ली जाएगी।
दोनों हाथ जोड़, हलका सा सिर झुका और आंखें मूंद प्रणाम,सादर प्रणाम, प्रनिपात अथवा नमस्ते कहने की प्रथा कब शुरू हुई, इतिहास में दर्ज नहीं है।
फिर भी रिग वेद की सूक्तियां(रिक) जिसमें इन्द्र ,अग्नि, सूर्य,मित्र और वरुण की पूजा का उल्लेख है शारीरिक भंगिमा की तरफ कोई इशारा नहीं करती।
रिग वेद में ही " रुद्र" नाम के वैदिक भगवान का उल्लेख है जिसे वर्तमान में भगवान शिव के साथ जोड़ा जाता है।परंतु ये गलत है।
"रूद्र" भयंकर तबाही करने वाला कोई वैदिक भगवान है जिसका भगवान शिव के साथ कोई लेना देना ही नहीं है।लाल रंग के शरीर वाला ,भयंकर मौसम लेने वाला,आग बरसाने वाले इस वैदिक भगवान को शिव कब मान लिया गया इस बारे में स्कॉलर एक मत नहीं है।परंतु फिर भी रिग वेद में जब भी पांच वर्णित देवता " रुद्र" को शांत करने हेतु उनके समक्ष जाते हैं तो वो दोनों हाथ जोड़ प्रणाम करते हैं।
इसलिए चलिए मान लेते हैं कि प्रणाम करने की शारीरिक भंगिमा का भारतीय संस्कृति में कोई 6 हज़ार वर्ष पूर्व आरम्भ हुआ होगा।
"शेक हैंड" अर्थात हाथ मिलाना दुनिया में सर्वत्र सम्मान के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शारीरिक कलाप है।संक्रमण काल गुजर जाने के बाद जब विश्व नए विधान की तरफ देख रहा होगा तो शायद ही कोई शेक हैंड करे।
"शेक हैंड " की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है।
अर्चेओल्जी और पुरातत्व विभाग के के दस्तावेज बताते हैं कि हैंड शेक वास्तव में पुरानी ग्रीक सभ्यता में आरम्भ हुआ।
ये कोई सम्मान की भंगिमा नहीं है।ग्रीक सभ्यता में इसे " देक्षियसिस" कहा जाता है ।ये भंगिमा वास्तव में युद्ध में अपनाई जाती थी जिसका अर्थ होता था कि शत्रु के हाथ में कोई शस्त्र नहीं है। हारे हुए अथवा आत्मसमर्पण करने वाले शत्रु के साथ शेक हैंड करने का कारण सिर्फ ये जानना होता था कि शत्रु पूर्णतः शस्त्र हीन है।
तो युद्ध, घृणा और हिंसा में प्रयुक्त होने वाली ये शारीरिक मुद्रा सम्मान कि मुद्रा कैसे बनी इस पर शोध किया जा सकता है।
ग्रीक पुरातत्व की खोजों में कुछ राजाओं की बेवफ़ा पत्नियों द्वारा अपने पतियों की हत्या कि साजिशों के बेनकाब होने के बाद उनके हैंड शेक का भी उल्लेख है।
वर्तमान समय में हैंड शेक दुनिया में वायरल इंफेक्शन का दूसरा सबसे बड़ा कारण है।सार्स महामारी से ले करोना महामारी हैंड शेक हर जगह वायरस फैलाव का बड़ा कारक है।
उम्मीद है ,इस वक़्त से ले के तब तक ,जब तक,आप जिंदा हैं,तब तक आप सम्मान,प्रेम ,अपना पन दर्शाने हेतु केवल और केवल दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम ही करेंगे।
ये वैज्ञानिक है,कम से कम आप अपने हाथों से ना तो रोगाणु और विषाणु फैलाएंगे ना किसी और से ग्रहण करेंगे।
सचिन ठाकुर
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल

Saturday, 17 April 2021

पॉजिटिव पोस्ट:

 पॉजिटिव पोस्ट:

साल 2020 के आखिरी तीन माह में पूरे विश्व में जो कुल मृत्यु हुई उनमें से:
1. कोविड़ 19 से 3,14,687
2. मलेरिया से 3,40,584
3. आत्म हत्या से 3,53,696
4. सड़क दुर्घटना से 3,93,479
5. एड्स से 2,40,950
6. अल्कोहल से 5,58,471
7. धूम्रपान से 8,16,498
8. कैंसर से 11,67, 714
तो आपको क्या लगता है करोना वाकई इतना खतरनाक है ...
या फिर ऐसा लग रहा आपको की सारा मीडिया कैंपेन अमेरिका और चीन के बीच जारी व्यवसायिक हितों के युद्ध को संभालने के लिए है..
या फिर फाइनेंस मार्केट में नेपथ्य में चल रही मर्जर और अमानवीय खरीद फरोख्त पर पर्दा डालने की कोशिश हो रही है...
या फिर अमेरिका अपने बॉन्ड्स बेचने की फिराक में है की वित्तीय घाटा कम किया जा सके..
या फिर सारा तमाशा बड़ी फरमा कंपनियों द्वारा प्रायोजित है ताकि वो सेनिटाइजर,मास्क, पीपीई किट और वैक्सीन को ऊंचे दाम पर बेच कर अरबों खरबों डॉलर कमा सकें।
कुछ भी हो सकता है।
मजेदार बात ये है कि सारस  की मारक दर 10% है,स्वाइन फ्लू की 28% और कोवीड 19 की सिर्फ 2%।
एक बड़ा दिलचस्प डाटा एक वेबसाइट पे मिला।
वेबसाइट लिख रही है की आज के दिन पूरे विश्व में कोविड 19 ने  6406 जाने ली।
आज ही के दिन 26,283 लोग कैंसर से मरे,24,641 लोग दिल की बीमारी से,4300लोग शुगर से, 2704 लोग मच्छरों के काटने से मारे गए और 137 लोग सांपो के काटने से मारे गए।और भी दिलचस्प पहलू ये है की 1300 लोगों को उनके साथी मनुष्यों द्वारा कत्ल कर दिया गया, मतलब उनकी हत्या हो गई।
तो अब क्या कहेंगे आप।
विज्ञान की राय दूं...
1.हमे करोना वायरस के साथ अभी कई वर्षों तक रहना है।इसलिए घबराएं नहीं,ना ही डरे।वास्तविकता के साथ जीना सीखिए।
२.एक बार करोना वायरस आपकी कोशिका की भित्ति के अंदर दाखिल हो गया फिर गर्म पानी और काढ़ा गैलन के हिसाब से पी लो वो वायरस को नहीं मार सकते। हां,तुम्हे बाथरूम के बार बार दर्शन जरूर करवा  देंगे।
3.अपने हाथ बार बार धोना और छह फीट की शारीरिक दूरी बनाए रखना ही सबसे कामगार हथियार है।
4.अगर आपके घर में कोई करोना मरीज नहीं है तो घर को बार बार डिस इंफेक्टेंट करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
5. ग्रॉसरी बैग्स,प्लास्टिक बैग्स, ए टी एम या गैस स्टेशन इन्फेक्शन नहीं करते।बस अपने हाथ साफ रखिए और चेहरा ढक कर रखिए।
6. कोविड़ खाने से फैलने वाला इन्फेक्शन नहीं है।ये तभी फैलता है जब हवा में किसी के द्वारा खांसने या छींकने से तरल बूंदे उड़ें और आपके नाक या मुंह से शरीर में प्रवेश कर जाएं।अभी तक ऐसा कोई मामला नहीं आया की ऑर्डर किए गए पिज्जा से संक्रमण फैला हो। हां,खाना ऑर्डर किया हो तो माइक्रोवेव में उसे गर्म जरूर कर लें।
7.आपकी सूंघने और स्वाद की शक्ति बहुत ज्यादा एंटी एलर्जी दवा के इस्तेमाल से भी जा सकती है और बहुत सारे अन्य वायरल संक्रमण से भी।
8.घर में घुसते ही कपड़े बदलने या शावर लेने की खास आवश्यकता नहीं है।याद रखिए साफ रहना "गुण" है,पागलपन नहीं।
9. करोना वायरस हवा में नहीं तैरता।ये छींक या खांसी से संक्रमित व्यक्ति के मुंह से निकली बूंदों के लेन देने से होता है जिसके लिए बेहद कम शारीरिक दूरी चाहिए होती है।
10. हवा साफ है तो बागों में ,बगीचों में घूमिए।बस शारीरिक दूरी बनाए रखें।
11.हाथ धोने के लिए आम साबुन का इस्तेमाल करें।महंगे एंटी बैक्टिरियल सोप पर पैसा खर्च करने की आवश्यकता नहीं।एंटी बैक्टिरियल सोप वायरस का कुछ नहीं उखाड़ सकते।
12.जूतों से वायरस घर में आता हो इसकी संभावना 10,000 में एक से ज्यादा नहीं है।
13. विनेगर,गन्ने का रस या अदरक के रस से वायरस नहीं मरते।ये प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ा सकते हैं, दवा का काम नहीं कर सकते।
14. मास्क केवल भीड़ भाड़ वाले इलाके में पहने ।घर में , अपनी कार में या अपने निजी ऑफिस में कतई नहीं।वर्ना ये आपके शरीर के ऑक्सीजन लेवल में कमी करेंगे और आप किसी अन्य बीमारी की चपेट में आ जाएंगे।
15. ग्लव पहनना और भी बुरा आइडिया है। दस्टानो पर वायरस आसानी से जम जाते हैं।हाथों को बार बार बीस सेकंड के लिए धोना कहीं ज्यादा असरकारक आइडिया है।
16. घंटे बजाने से वायरस नहीं मरते, ना ही किसी पशु के मूत्र से,ना ही दिए के प्रकाश न ही किसी सामग्री के स्वाह होते धुएं से।
17. सबसे खास बात।अपने आप को स्टरलाइट परिवेश में कैद रखने से आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता ध्वस्त होती है।बेशक आप रोग प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करने के लिए दवा या सप्लीमेंट ले रहे हों।अपने घर में बैठने से लाख गुना बेहतर है की आप बगीचों,खेतों, नदी के तटों ,समंदर के तटों पर टहलने के लिए जाएं।आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता उतनी ही विकसित होगी जितना रोगाणु आपके शरीर पर आक्रमण करेंगे।
उम्मीद है लेख पढ़ कर आपको अच्छा महसूस हो रहा होगा।
मैं खुद होम आइसोलेशन में हूं।मेरे एक भले शरीफ पड़ोसी परसों शाम को घर आए थे ।चाय पीने के बाद बोले की मेरे इंस्टीट्यूशन के डायरेक्टर करोना पॉजिटिव हैं और मैं उनका प्राइमरी कॉन्टैक्ट हूं।पिछले कल वो खुद भी करोना पॉजिटिव हो गए।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र ,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल।