Saturday, 24 April 2021

करोना के बाद -3 राजनैतिक सफाई:

 ताइवान एक बेहद छोटा सा देश है।

ना ही तो वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गनाइजेशन का सदस्य ना ही यूनाइटेड नेशन ऑर्गनाइजेशन का।
चाइना अभी तक इस देश को अपना नाराज राज्य मानता है और इसे स्वतंत्र देश का दर्जा भी नहीं देता।जापान ,चाइना जैसे बड़े देशों से घिरा हुआ कुछ द्वीपों का समूह।
करोना महामारी से सारी दुनिया कोहराम ग्रस्त है।परंतु ताइवान ने इस महामारी का सामना बड़े ही वैज्ञानिक और तकनीक के इस्तेमाल से किया है। ताइवान वो देश है जहां कॉविड -19 के मामले दुनिया के शुरुआती समय में आना शुरू हुए थे।परंतु पांच महीने गुजर जाने के बाद दुनिया का आंकड़ा जहां 16 लाख पर पहुंच गया ताइवान में अब तक बमुश्किल 500 एक्टिव केस हैं और सिर्फ 7 लोग मृत्यु के शिकार हुए हैं।
ताइवान का करोना से लडने का तरीका बड़ा सीधा था ।इसे हम टी. टी .टी. कहते है।ट्रेस,टेस्ट एंड ट्रीटमेंट।अर्थात पहले खोजो,फिर उसका टेस्ट करो और पॉजिटिव पाए जाने पर उसका इलाज करो।आप हैरान होंगे कि कुल 500 एक्टिव केस होने के बावजूद ताइवान के कठिन और कठोर फैसलों ने 90 हज़ार से ज्यादा लोगों को आइसोलेशन में रखा है।
आप पूछेंगे नहीं की ताइवान ऐसा कैसे कर पाया।
चलिए ।ताइवान की राजनेतिक व्यवस्था को समझते हैं।
ताइवान की राष्ट्रपति डॉक्टर साई इंग वेन लोकप्रिय नेत्री हैं। लदंन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पी एच डी धारी।
ताइवान के शिक्षा मंत्री डॉक्टर पान वेन चुंग ।ताइवान के राष्ट्रीय विश्व विद्यालय से एजुकेशन में पी एच डी धारी।
ताइवान के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर चेन शिह चूंग। ताइपे मेडिकल कॉलेज सरीखे विश्व प्रसिद्ध मदिकल कॉलेज से पास डॉक्टर और जाने माने महामारी विशेषज्ञ।
बस इतना ही काफी है समझने को।परिचयों में ही लेख खप्प जाएगा।
अब अपनी सरकारों पर नजर डाल लीजिए।
हमने कभी ऐसे पढ़े लिखे लोग चुन के भेजे लोक सभा,राज्य सभा या राज्य विधानसभाओं में?
कितने लोग ऐसे हैं हमारी सरकारों में जो ताइवान के सरकारी अमले के सम कक्ष भी ठहरते हों।
भेजेंगे कैसे?
 अभी तो हम वोट ही जाति के हिसाब से देते।धर्म के नाम पर देते।अपने दिल पर हाथ रख के ,अपनी आत्मा को साक्षी मान के सोचिए की जिंदगी में एक आध बार भी किसी कैंडिडेट को उसकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर वोट दिए हो।
काश एक आध हाथ खड़ा होता हां की मुद्रा में।
अधिकांश लोग किसी ना किसी राजनेतिक दल के भक्त हैं।उन्हें उसी पार्टी के उम्मीदवार को वोट देना है चाहे वो जो कोई हो।
अब राजनेतिक पार्टी का उम्मीदवार उसकी हाई कमान तय करेगी।तो सरसरी नजर मारी जाए तो पूरे देश में बमुश्किल 70 से 100 लोग हैं जो पूरे देश के लिए राजनेतिक टिकट तय करते अलग अलग पार्टियों के।आपका तो उसमे कोई रोल है ही नहीं।
फिर काहे का लोकतंत्र।ये तो बड़े बड़े राजनेतिक खानदानों के चौखट पर पड़ी जूती जैसा नहीं है जिसे पांव का इंतजार रहता।
अब सोचिए किसी कॉलेज केडर के असिस्टेंट प्रोफेसर को कैसा महसूस होगा कि उसका प्रिंसिपल मेट्रिक पास बना दिया जाए।
अरे हमे बूरा लगता भाई।स्कूल में जब यूनिवर्सिटी से घिस के निकले हुए कमीशंड लोगों के ऊपर कोई एक्स सर्विस मैन जो बमुश्किल तीन चार साल की नौकरी के बाद ही प्रिंसिपल बना के बिठा दिया जाता तो वो किस कदर नफरत और चिद से भरे होते आप से छिपा नहीं है।1996 में कमीशंड प्रवक्ता के सिर पर जब किसी प्राइवेट स्कूल से निकले सीधे हेडमास्टर भरती से बने प्रधानाचार्य बिठा दिए जाते तो वो अंदर ही अंदर किस क्रोध और हैरानी से भरे होते ये तो मैंने खुद महसूस किया है।
अब सोचिए ,क्या हाल होता होगा उन बड़े बड़े शिक्षाविदों का,बड़े बड़े विश्व विद्यालयों के कुलपतियों का जिनका शिक्षा मंत्री बमुश्किल दस जमात पास हो।
क्या समझाएंगे वो बड़े बड़े वैज्ञानिक उस विज्ञान मंत्री को जिसने कभी विज्ञान ही नहीं पढ़ा हो।
कैसा महसूस करते होंगे वो बड़े बड़े चिकित्सक ,सुपर स्पेशलिस्ट जिन्हे उस स्वस्थ्य मंत्री को जाकर सलाम ठोकनी है जिसे स्टेठोस्कोप डॉक्टरों की फैशन कि वस्तु जान पड़ती है।क्या समझा पाएंगे वो की वेंटिलेटर क्यूं जरूरी हैं।
आप बहस कर सकते की राजनीति से दूर ही रहना चाहिए।ये अच्छे लोगों का काम नहीं है।आप ये भी आडम्बर कर सकते की आप राजनेतिक नहीं है।
परंतु ये बिल्ली के आगे कबूतर जैसे आंख बन्द करने जैसा कृत्य है।आपके पैदा होने के बाद आप जैसे ही पंचायत रजिस्टर में अपने जन्म प्रमाण पत्र के साथ रजिस्टर होते हो,आप राजनीति में शामिल हो जाते हो।
आपको पहले टीके लगना,आपके स्वस्थ्य पर सरकारी नजर,आपका आंगनवाड़ी में फलाहार,आपका प्राइमरी स्कूल,आपकी उच्च शिक्षा सब कुछ राजनीति के उज्ज्वल पक्ष के फलस्वरूप है।
हस्पताल,घर घर पानी,बिजली,यातायात,सड़क,ट्रेन,जहाज सब कुछ राजनीति के ही उज्ज्वल पक्ष हैं।बड़े बड़े डेम,आई आई टी,आयुर्विज्ञान संस्थान,आइं आई एम् , ऐम्स सब कुछ तो उज्ज्वल राजनीति के ही परिणाम हैं।
परंतु साथ ही भ्रष्टाचार,दंगे,कतल,बलात्कार, डाके ,लूट,भाई भतीजावाद ये भी राजनीति के ही सयाह चेहरे हैं।बढ़ती बेरोजगारी,बढ़ते अपराध,बढ़ती बेचैनी ,बढ़ता अत्याचार,बढ़ता पूंजीवाद,बढ़ती अमानवीय मजदूर शर्ते सब राजनीति की ढलान है।
याद रखिए,आपका ,पैदा होने को छोड़ कर ,बाकी सब कुछ राजनीति ही तय करती।यहां तक कि मरने के बाद दफनाना या जलाना तक।
तो फिर आप क्यूं नहीं तय करते की आपकी राजनीति क्या है।बन्द कीजिए ये जाती के नाम पर,धरम के नाम पर और यहां तक कि किसी राजनेतिक दल के नाम पर वोट करना।अलबत्ता तो खुद राजनेतिक रुख करिए या फिर पढ़े लिखे,समझदार लोगों को लोकसभा और विधानसभा में भेजिए।आप जिन लोगों के घर अपनी बेटी को भेजना सुरक्षित नहीं समझते ,उनके हवाले देश को कैसे कर सकते हो?
चाणक्य ने कहा है ," .. जो लोग ये कह कर राजनीति से किनारा कर लेते हैं की ये भ्रष्ट लोगों का काम है,वो ही लोग उन भ्रष्ट लोगों के हाथों सर्वाधिक शोषित होते हैं।आपका राजनीति में हिस्सा ना लेना उन लोगों को आप पर शासन करने का मौका दे देता है जिनकी शक्ल तक आप देखना पसंद नहीं करते... "
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल

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