Thursday, 15 April 2021

भूत: 1

 विज्ञान प्रसार में लगे  ज्ञान विज्ञान समिति,तर्कशील सोसाइटी और अंधविश्वास मुक्त भारत जैसे बहुत सारे  संगठनों से मैं परोक्ष और अपरोक्ष रूप से जुड़ा हुआ हूं।ऐसे ही एक संगठन की राज्य स्तरीय कार्यशाला में भूतों पर एक सेशन था।

सेशन में मेरा अभिभाषण ऑप्टिकल इलुजन पर था।
पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन पर मैंने ऐसी बहुत सारी क्लिप्स इस्तेमाल की जो आंखो को धोखा देने के लिए काफी है। यहां तक कि अभिभाषण के दौरान मैंने डिप्रेस्ड आई इम्प्रैशन इस्तेमाल कर श्रोताओं को हॉल की दीवारों पर भूत भी दिखा डाले।
ये लेक्चर मैं अपनी नियमित विद्यालय कक्षाओं में भी इस्तेमाल करता हूं जिसे मुझसे पढ़े अधिकांश छात्रों ने ग्रहण किया है और कक्षा में ही भूत देखे हैं।
खैर ,वर्कशॉप की शाम को डिनर के बाद मैं अपने दो पुराने मित्रों के साथ डाइनिंग टेबल पर ही गप शप में व्यस्त था।दोनों मित्र शिक्षा विभाग में ही प्रवक्ता है एक मंडी जिला के दूर दराज क्षेत्र और दूसरे सिरमौर के शिलाई क्षेत्र में सेवारत है।
दोनों मित्रों ने दिन के व्याख्यान हेतु मुझे साधुवाद दिया और व्याख्यान को अद्वितीय बताया।
चर्चा में दोनों मित्रों ने आग्रह किया कि कोई स्व घटित भूतो वाली घटना सुनाओ और उसके पीछे का विज्ञान भी समझाओ।
मेरे पास सुनाने को कुछ खास था नहीं।उन दोनों के पास बेहद डरावनी कहानियां जिन्हे में अगले लेखों में सुनाऊंगा।खैर शुरू मैंने ही की।
" बात बचपन की है।मेरा गांव दिघो,सरकाघाट के चोर थला क्षेत्र में है।गांव पहाड़ी पर स्थित है ,जिसमे ढलान के साथ रास्ता नीचे खड की तरफ जाता है।रास्ते के दाएं बाएं ही सारे मकान बने है ।गांव ऊपर से नीचे तक कोई आधे किलोमीटर में फैला हुआ है और बिल्कुल तराई पर खड्ड है।खड्ड के ऊपर हमारे खेत है।खड्ड के साथ श्मशान घाट।श्मशान घाट के साथ खड्ड में पानी की बोगियां बनाई गई है जिसमें हम बहुत सारे लकड़ियों के डंडे पानी के अंदर डाल देते हैं और ऊपर से बड़े बड़े पत्थर से दबा देते हैं।दो तीन महीने बाद लकड़ियों का रेशा और अंदर की कठोर लकड़ी अलग हो जाती है।रेशे से हम लोग रस्सियां बनाते थे और लकड़ी,जिसे आम भाषा में भलेठी कहते हैं, जलाने में इस्तेमाल होती थी।इस से थोड़ी दूरी पर खड्ड बेहद डरावनी,अंधेरी और झाड़ियों से भरी हो जाती है ।आगे बच्चों के जाने पर प्रतिबन्ध था।
ऐसे ही एक बार लकड़ियों से रेशा निकलते वक्त दद्दू और मुझे प्यास लगी।दद्दू साहब ने बताया कि खड्ड में आगे जैसे पानी का एक चश्मा है जिसे नालू कहते हैं।दद्दू ने बताया कि पहले पानी नालु से ही पीने के लिए ले जाया जाता था।पानी की विकराल समस्या थी गरमियों में तो रात के वक्त भी हम पानी लाने यहां आते थे।खैर दद्दू साहब की बात सुन मैं उनके साथ नालू तक चल पड़ा।ऊपर से बेहद संकरी दिखने वाली खड्ड का नया रूप देख मैं चकित था।चट्टानों के नीचे खड्ड बेहद चौड़ी है।फुटबॉल स्टेडियम जितनी तो होगी। नालु का पानी सच में मीठा था,ठंडा भी।
पानी पी के आजू बाजू की जगह को निहारा।सामने एक बड़ी गुफा जिसका मुहाना बड़े बड़े पत्थरों से बन्द कर दिया गया था ,दिखी। मैं आश्चर्यचकित था।दद्दू साहब से पूछ लिया ये क्या है।दद्दू साहब ने होंठो पर उंगली रख चुप रहने का इशारा किया। पानी पी के चुपचाप उनके साथ वापिस आ गया।
खड्ड के दूसरे किनारे पर मोर्तन नाम का गांव है।उस गांव से मेरे विद्यालय चोरथला के पी टी आई साहब थे।जो उसी रास्ते से विद्यालय आया जाया करते थे।शाम को कई बार देर हो जाने पर वो हमारे घर से जलती हुई लकड़ियां ले जाते थे और उस खौफनाक रास्ते को पार कर अपने घर पहुंचते थे।टॉर्च उस जमाने में बड़ी कीमती चीज हुआ करती थी।चूंकि मेरे दद्दू के साथ उनकी अच्छी मित्रता थी तो वो घर बैठ भी लिया करते थे।बातों बातों में वो श्मशान घाट के आस पास जलते हुए सिर वाले भूतों के नाच ,श्मशान घाट पर भूतों की धाम और नाच वाले किस्से सुनाया करते थे।चूंकि वो ऐसा अक्सर देखते थे तो सुन कर मैं सहम जाता था।टॉयलेट जैसी चीजें गांव में नहीं होती थी ना ही कोई बल्ब बाहर लगे होते थे।रात को टॉयलेट जाना सबसे डरावना काम होता था क्यूंकि इस काम को अंजाम देने के लिए घर से बाहर निकल कर आंगन के आगे जाना होता था।और इसी वक्त पी टी आई साहब की कहानियां जीवंत रूप लेती थी।कितनी बार तो पजामा ही गीला हुआ ।
गुफा अभी भी मेरे दिमाग में थी।जैसे तैसे मैंने दद्दू साहब को गुफा के बारे में बताने के लिए मना लिया।
दद्दू ने बताया कि "कुछ समय पहले इस गुफा में चुड़ैल रहती थी।एक बार वो चुड़ैल सामने के गांव थाना के पुरुष " कालू रांझा" जो घर के बाहर सो रहा था को उठा के अपनी गुफा में ले गई।पहले बहुतेरे लोग घर से बाहर आंगन में ही सोया करते थे।
चुड़ैल देखने में बेहद खौफनाक थी।मैंने भी देखा है उसे।
सफेद कपड़े पहनती थी।उसके पांव पीछे की तरफ थे और वक्ष स्थल भी।वो चलती नहीं थी बस जमीन से अधा फुट ऊपर उड़ती थी।उसकी चमड़ी जली हुई थी और आंखे बिल्कुल लाल। दांत बड़े बड़े बाहर निकले हुए।अजीब सी आवाजें निकालती थी जैसे हामफ रही हो।
लेकिन गुफा के अंदर वो कोई भी रूप धर सकती थी।किसी बेहद सुंदर स्त्री का भी।" कालू रांझा" को उसने इसी रूप से भरमाया ।उसके साथ विवाह कर लिया।जब चुड़ैल शिकार करने गुफा से बाहर जाती तो वो कालू रांझा की आंखो मे कोई काजल डाल के जाती थी जिस से कालू रांझा को दिखना बन्द हो जाता था।
दिन गुजरते गए।चुड़ैल ने दो जुड़वा बच्चों को जन्म दिया।
इधर बाहर कालू रांझा की बीवी और बच्चों ने मान लिया था कि वो मर चुका है पर शव नहीं मिला।
एक दिन कालू रांझा ने चाल चली।उसने चुड़ैल को बोला कि जब तुम बाहर जाती हो,तो काजल मत लगाया करो।इतने सालो से तुम्हारे साथ हूं बाहर जा के भी क्या करूंगा। भाग के जायुंगा भी कहां।
चुड़ैल मान गई।कालू रांझा अब देख सकता था।चुड़ैल शिकार पर निकली यहां कालू रांझा ने चुड़ैल के बच्चों को छोड़ गुफा से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढा और गुफा से बाहर निकल आया।आके सीधा घर गया।परिवार हैरत मिश्रित खुशी से झूम उठा।सारे गांव और आस पास के गांव के लोग इकट्ठा कर आपबीती सुनाई।गांव वालो ने गांव का पहरा शुरू करा।बड़ी बड़ी आग की मशाल जला गांव का रात भर पहरा करते।
उधर चुड़ैल कालू रांझा को गुफा में ना पा आग बबूला हुई और उसे वापिस उठाने उसके गांव की तरफ लपकी परंतु गांव वालो को आग की मसलों के साथ देख जा नहीं पाई।
अब रोज रात को चुड़ैल श्मशान घाट के आजू बाजू की खड्ड में जोर जोर से चीखती और गाना गाती।गाना अभी भी याद है मुझे," कालुआ रांझा, कुथी तेरा मांजा, कूथी तेरे बच्चे, कुथि तेरी जनाना" (कलुआ रांझा,तेरी चारपाई कहां है,तेरे बच्चे कहां है और तेरी बीवी कहां है)
एक रात पहरे दार को सोता पा वो गांव में घुस गई और कालू रांझा को मार डाला।
सारे इलाके में सनसनी फ़ैल गई।इलाका वासियों ने इकठ्ठे हो बड़े बड़े पत्थरों से गुफा का मुंह बन्द कर दिया।तब से चुड़ैल और उसके बच्चे उस गुफा में बन्द है।बहुत से लोग जो आज भी गुफा के आस पास जाते हैं अंदर से अजीब आवाजें सुनाई देने की गवाही देते हैं।
दद्दू ने कहानी बन्द की।
मैंने भी विराम लिया।मेरे मित्र कुहनी को टेबल पर टिका और हथेली पर ठुद्दी रख बड़ी बड़ी आंखें कर एकटक मुझे देख रहे थे।
पूरा सन्नाटा।
पहले ने बीड़ी सुलगा पूछा," क्या ये गुफा अब भी है।"
"हां" मैंने जवाब दिया," पर बन्द है।उस तरफ जाने की हिम्मत कोई नहीं करता अब।"
बीड़ी का कश खींच,धुआं ऊपर की ओर उड़ा मित्र मुझे एक टक देख रहा था।बोला," अब बताओ,तुम्हारा विज्ञान क्या कहता"
मैंने अपनी थेओरी पेश की," दद्दू साहब कहते थे कि चुड़ैल सफेद कपड़े पहनती थी।किस दुकान से लेती होगी और कौन दर्जी होगा।अच्छा खाती क्या होगी।प्याज टमाटर तेल नमक कुछ तो खरीदती होगी।ले दे के चोरथला में तीन तो दुकानें थीं।अच्छा फिर चुड़ैल बच्चे कैसे पैदा कर सकती।
मेरा मानना है कि इस गुफा के साथ कुछ और भी जुड़ा है।मंडी राजा का अविजित किला कमलाह गढ़ यहां से ज्यादा दूर नहीं।कमलाह किले तक ले जाई जाने वाली रसद इसी रास्ते से जाती थी।गुफा का दूसरा किनारा कोई दो किलो मीटर दूर पहाड़ी के दूसरी तरफ बनाली गांव में है तो हो सकता है कि राजा की रसद इसी गुफा से आर पार की जाती हो।ये भी हो सकता है कि मंडी राजा खुद पहाड़ी की चढ़ाई से बचने के लिए इसी गुफा का इस्तेमाल आने जाने के लिए  करते हों।या है सकता वहां सैनिक छावनी हो।ये भी हो सकता कि कोई खजाना वहां छुपाया गया हो और फिर लोगों में डर फैलाने के लिए ये कहानी प्रचारित की गई हो।"
मेरे मित्र की आंखो की चौड़ी पुतलियां अब सिमट गई थी।
बोला," हां.. हो सकता है।आम तौर पर खजाने छुपाने के लिए ही ऐसी कहानियां फैलाई जाती है। डिस्कवरी चैनल वालों को बोलते हैं ,गुफा का राज जानने को।वहीं है जो इस रहस्य को सुलझा सकते।"
मैंने विजयी मुस्कान दागी।मेरी थेओरी काम कर गई थी।
अब दूसरे मित्र ने अपनी कहानी सुनाने के लिए अपनी कमीज़ के बाजू को ऊपर किया।
क्रमश:
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धर्मशाला की फेसबुक वाल।

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