तूफान को शांत करने की कोशिश बेवकूफी है।तूफान में खुद को शांत करना होता है।तूफान खुद ब खुद गुजर जाता है। कोबिड 19 का ये तूफान भी गुजर जाएगा।
इसके बाद आप नए तरीके से जीना सीखोगे।
इस महामारी से जो सबसे बढ़िया फलसफा पूरी मनुष्य जाती ने सीखा वो बेहतरीन रोग प्रतिरोधक क्षमता के विकास का है।
शोध बता रहे हैं कि बेहतरीन रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को नोवेल करोना वायरस कुछ ज्यादा क्षति नहीं पहुंचा पाया। लाखों मृत्यु का ग्रास बने वायरस इंफेक्टेड लोगों में से अधिकांश लोग या तो ब्जूर्ग थे जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता वैसे ही कम होती या फिर वो थे जो किसी और बीमारी से ग्रसित थे।मात्र करोना इंफेक्शन से इक्का दुक्का जाने ही गई होंगी।
आज चर्चा इम्यून सिस्टम की और शिक्षा की।
पेरेंटिंग कोई आसान काम नहीं है।बड़े बड़े योद्धा इस मोर्चे पर धराशाई होते हैं।
फैशन हो,मज़बूरी हो अथवा अपने बच्चे को सबसे आगे देखने कि ठरक ,हम में से अधिकांश तीन साल की उम्र में अपने बच्चे को स्कूल भेजना शुरू कर ही देते हैं।
निजी स्कूल इस मौके को जबरदस्त तरीके से भुनाते हैं।
के . जी . ।
अब तो यू के जी और एल के जी भी हो लिए हैं।
क्या आपके बच्चे को के. जी .की वाकई जरूरत है ?????
मुझे इस बात को बताने में कोई शर्म महसूस नहीं होती की अपने अध्यापक साथियों से जब भी मैंने पूछा पूछा की के. जी .का मतलब क्या है तो 80 % लोगो ने इनकार किया ,10 % लोगों ने फुल फॉर्म बताई की ये" किंडर गार्डन" है;बाकी 10 % उसकी सही फूल फॉर्म " किंडर गार्टन" बता गए परन्तु ये है क्या इस बारे उनको कोई जानकारी नहीं थी।।।
आप भी पता लगा लीजिये।।।।90 % स्कूल जो के. जी. के नाम पर ओसतन 3000 ₹ प्रति माह की दर से आपका पैसा लूटते है उनको खुद नहीं पता की ये है क्या।।।।95 % लोग जो इन क्लासेज को पढ़ाते हैं उनको के. जी. कि मूल भूत अवधारणा का कोई ज्ञान है ही नहीं।
आओ समझे कि के. जी. है क्या।
1840 इ में फ्रेडरिक फ्रोब्ल नामक के सज्जन ने बेड ब्लेंक्न बर्ग कस्बे में उन नवजात बच्चो जिनके माता पिता फैक्टरी में काम करते थे उनके लिए , दिन में चलने वाले स्कूल की स्थापना की।।। बच्चे वहां दिन में खेलते ।।उसी दौरान नेचुरो चिकित्सा पद्धति का ये सिधांत प्रतिपादित हुआ की मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास 3 वर्ष की आयु से होना शुरू होता है। इस आयु से 6 वर्ष की आयु की तक के बच्चो को जितना एक्सपोजर हो उतनी ही बेहतरीन उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता होगी।।। इसलिए आवश्यक है की बच्चे मिटटी में खेलें; घास में दौड़े ; कुओ का पानी पियें; खेतो खलिहानों में सैर करें; भारी मात्रा में कच्ची सब्जियां और फल खाएं।।।
पहले जर्मनी और फिर फ्रांसिसी क्रांति ने शहरी कर्ण को बड़े पैमाने पर स्थापित किया।।।। शहर बसे जरूर पर घरो का जमावड़ा इतना गहरा था की बच्चों के लिए खेलने की जगह ही नहीं बची।।। इसीलिए किंडर गार्टन महत्व पूर्ण हो गये।।। बच्चों को शहर से बाहर खेतों और खलिहानों में खेलने के लिए भेजा जाता जहाँ वो सामूहिक रूप से खेलते; गाने गाते और सब्जियां और फल खाते।।। इसी से वो समाजिक बनावट भी सीखते और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी होता।।।।
अपने बच्चों के के. जी .को देखिये।।। ए फॉर एपल ; बी फॉर बैट से ज्यादा कुछ नहीं।। जिन दीवारों से मुक्ति के लिए के.जी. बनाया था, बच्चा उन्हीं में कैद है।
फीस 2000 से 4000 ₹ ।।।
न पढ़ने वालो को कुछ पता न पढ़ाने वालो को ।
माता पिता से पूछो तो जवाब एक ..."बच्चे का बेस स्ट्रोंग होना चाहिए...."
अगर आपका बच्चा मिटटी में खेलता है; घास पर घूमता है ; कुएं का पानी पीता है ,बाकी बच्चों के साथ खेलता है और दबा के सब्जी और फल खाता है तो बताइए सच में उसे के .जी .की आवश्यकता है क्या???
अब तो निजी शिक्षा की दुक्कानो ने लोवर के. जी .और अप्पर के .जी .भी शुरू कर दी हैं।।। इनका बस चले तो ये पेट में ही बच्चे को सिखाना शुरू कर दें।।।। आखिर बच्चे का बेस जो स्ट्रोंग करना है।।अगर अभिमन्यु सुभद्रा के पेट में चक्रव्यूह समझ सकता है,तो आपका बच्चा क्यूं नहीं।
याद रखिए किंडर गारटन का शाब्दिक अर्थ "बच्चों का बगीचा" जरूर है परन्तु इसका मूल अर्थ "बच्चा बगीचे में" है।
मैं कितने परिवारों को देखता हूं जो गांव छोड़ शहर में मकान किराए पर ले अपने बच्चों को किसी निजी स्कूल में डाल कर अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं।बच्चे का "बेस "स्ट्रॉन्ग करना है।पर लड़ाई किस बेस की है ये समझ ही नहीं।
ओ भाई शैक्षिक "बेस" का छोटा सा मतलब होता है कि दसवीं तक आपके बच्चे को दो विषय अच्छे से आने चाहिए।एक अंग्रेजी और दूसरा गणित।पर असली बेस है उसका इम्यून सिस्टम जो सारी जिंदगी उसे स्वस्थ रखेगा,रोगों से बचाएगा,करोना सरीखे इंफेक्शन से सुरक्षित रखेगा।
इसलिए अपने बच्चे पर रहम कीजिए।उसे खेतो में जाने दो।मिट्टी में खेलने दो।तितलियों के पीछे भागने दो।मामूली सर्दी जुकाम के लिए भारी एंटीबायोटिक ना दीजिए ,खुद ब खुद ठीक होने दीजिए।
कुरकुरे,मुरमुरे की जगह उसे फल,कच्ची सब्जियां दीजिए।पिज्जा बर्गर की जगह मक्की की स्टफ्ड रोटी खिलाएं मक्खन के साथ ।कोल्ड ड्रिंक की जगह लस्सी का बड़ा गिलास हो जाए, नींबू पानी,ब्रह्मी का जूस हो जाए। चॉकलेट ,टॉफी से कहीं ज्यादा टेस्टी आंबला कैंडी होती है।
मैं आशान्वित हूं,की,इस महामारी के बाद चीजें बदलेंगी,सोच बदलेगी।प्रकृति ने गेंद उठा के हमारे पाले में फेंक दी है।अब बारी हमारी है।।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल।
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Well said
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