Friday, 16 April 2021

भूत: 2

 मेरी कहानी खतम हो चुकी थी और मेरे विज्ञानिक तर्क से मेरे मित्र सहमत भी। हम तीनो अभी वहीं बैठे हुए थे।रात दूसरे पहर की तरफ बढ़ चली थी।

मेरे साथी मित्र ने अपनी कहानी सुनाने को कमीज की बाहें ऊपर खींच ली।जेब से बीड़ी निकाली और टेबल पर रखी माचिस से सुलगा दार्शनिक अंदाज में कश खींचा।
धुएं को ऊपर की तरफ धकेल,छत की तरफ नजरें गढ़ा मित्र ने कहानी शुरू की," सचिन भाई ,आप तो जानते हैं मेरी पहली अपॉइंटमेंट मंडी जिला के दूर दराज क्षेत्र में हुई।चार पांच साल वहां नौकरी करने के बाद मुझे उन पहाड़ों से इश्क हो गया और मैने वहीं जमीन खरीद कर सेबों का बगीचा त्यार किया।अब वहां घर भी बना लिया है।बात तब की है जब मैने नया नया स्कूल ज्वाइन करा।स्कूल अभी नया नया अपग्रेड हुआ था और प्रिंसिपल कोई था नहीं।सीनियर मैं ही था तो डी डी ओ पावर भी मेरे पास आई।
अभी कुंवारा था।
बाकी प्राध्यापक साथियों की भी फ्रेश अपाइंटमेंट हुई थी बस कुछ टी जी टी साथी वहां के लोकल थे और बाकी हम ज्यादा तर मंडी ,सुंदरनगर या आपके सरकाघाट से।भूगोल प्रवक्ता मेरे मंडी कॉलेज के सहपाठी चमन थे।
हम चार पांच प्राध्यापक साथियों ने पास पास के घरों में क्वाटर ले लिया।चमन और मैं एक ही घर में साथ साथ वाले क्वाटर में थे।ब्रेक फास्ट मैं बना देता,डिनर चमन।लंच हम स्कूल में बनवा लेते थे।
मेरे क्वाटर के साथ वाले घर में ड्राइंग मास्टर साहब का क्वाटर भी था।वो जोगिंदर नगर के किसी गांव से थे।
स्कूल का काम अब संभालना शुरू किया और पढ़ाना भी।स्कूल की कुछ रिवायते थी जैसे हर अमावस्या को वहां प्रसाद बनता था और शास्त्री साहब मंत्रोचार करने के बाद सभी छात्रों और अध्यापकों को उसे बांटते।इसी काम में उस दिन का आधा हिस्सा खत्म हो जाता।मैने शास्त्री जी से इसका कारण पूछा।शास्त्री जी ने बताया कि ये स्कूल की पुरानी प्रथा है।जिस जगह पर ये स्कूल बना है वहां पहले किसी लोकल देवता का स्थान था।देवता का स्थान स्कूल बनाने के लिए बदला गया परंतु इस शर्त पर की हर अमावस्या को प्रसाद बना के ,देवता को चढ़ा के सबको खिलाया जाए।"
ये कह कर मित्र ने विराम लिया।बीड़ी के तीन चार कश फटा फट खींचे और कैंटीन वाले को कड़क चाय के तीन गिलास बनाने को कहा।कैंटीन वाला छोटू नींद से ऊंघ रहा था ।बोला ," साहब,आखिरी कप।इसके बाद सो जायूंगा।" 
मित्र ने अंगूठा दिखा के अपनी स्वीकृति दी और कहानी का अगला पड़ाव शुरू किया," सचिन भाई,आपकी तरह मैं भी भगवान या देवताओं में कोई आस्था नहीं रखता।मैने शास्त्री साहब को हुक्म दिया की बंद करो ये अंधविश्वास यार। कब तक इन ढकोंसलो पर कायम रहेगी दुनिया।शास्त्री साहब मुस्कुराए।बोले मैं भी ऐसा ही चाहता हूं।पर रिवाएते हैं। लोकल टीचर्स को समझा दीजिएगा। 
अगली अमावस्या को प्रसाद नहीं बनाया।किसी ने ध्यान भी नहीं दिया।हालांकि टी जी टी कला अध्यापक शंभू जी,जो स्थानीय निवासी थे, मेरे पास आए और बोले की प्रसाद बनवा लेना था।पुरानी मान्यताएं हैं।जब मैं भी इस स्कूल में पढ़ता तब भी बनता था।अब तो मैं ही 50 का हो गया।तब ये प्राइमरी स्कूल ही था।मैने शंभूंजी को आश्वस्त किया कि दुनिया चांद पे पहुंच गई ,कुछ नहीं होता।पुरानी मान्यताएं बदलनी चाहिए।
अगले दिन सुभा प्रेयर के शुरू होते ही एक लड़की को चक्कर आ गया।पी टी आई साहब ने उसे उठा कर बरामदे में लेटाया और पानी पिलाया।शंभू जी मेरे पास ही खड़े थे ।प्रश्नवाचक नजरों से मेरी तरफ़ देख रहे थे।
मैंने खुद ही जवाब दिया," बच्चे सुभा खाना खा के नहीं आते।खड़े रहने से चक्कर आ जाता।बेटियों के साथ और भी समस्याएं होती। बासी खाना खा के अपच हो सकती ,गैस बन सकती पेट में उस से भी चक्कर आ सकते। मेंस्टुरेशन पीरियड्स भी हो सकते।कितना दम होता हमारी बच्चियों में।इसीलिए तो सरकार दोपहर का खाना देती।"
मैने अपनी बात खत्म की ही थी की पांच और बेटियां बेहोश हो के गिर पढ़ी। मैं चौंका।फिर दस पन्द्रह और।मेरी आंखे हैरानी से चौड़ी हो रही थी।इस से पहले की मैं सभी बच्चों को बैठने के लिए बोलता पंद्रह बीस बच्चियां और बेहोश हो गई।
विद्यालय में अफरा तफरी मच गई।
बच्चियों के बेहोश होने का का क्रम बढ़ता गया और इस से पहले की हम शिक्षक कुछ करते दो अध्यापिकाएं भी बेहोश हो के गिर पड़ी।
मैं किंकर्तवय मूड हो के बस देखता रह गया।"
इतने में कैंटीन वाला छोटू चाय ले के आ गया।" चाय साहब" छोटू ने आवाज दी।
मेरी और तीसरे मित्र की तंद्रा टूटी।दूसरे मित्र ने कहानी का जैसे समा बांधा था हमे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे हम ये सब सामने होते देख रहे हैं।
मित्र ने चाय की प्याली उठाई।चाय वाला छोटू भी साथ ही बैठ गया।
मैने और तीसरे मित्र ने चाय का प्याला उठाया।
दूसरे मित्र ने कहानी आगे शुरू की," विद्यालय में हाहाकार मच गया था।किसी को कुछ समझ में ना आए क्या करें।कोई पानी की बाल्टी उठा के लाए,कोई बच्चा अपनी बहन या रिश्तेदार बेटी को गोद में ले फूंक मारे ,कोई पानी पिलाएं।बहुत से छोटे बच्चों ने रोना ,चीखना चिल्लाना शुरू कर दिया।विद्यालय घनघोर चित्कार और भयानक डर की ध्वनियों से भर गया था।मुझे लगा मैं खुद भी बेहोश हो के गिर जायुंगा।ऐसा दृश्य मैने पहले कभी नहीं देखा था। हर तरफ बेहोश हुई बच्चियां।मैंने एक बच्ची को गौर से देखा।उसकी आंखे खुली हुई थी परंतु पुतलियां ऊपर की ओर चढ़ी हुई।दांत आपस में कट कटा रहे।मुंह से झाग निकल रही।मुंह बिल्कुल लाल और पसीने से भरा हुआ था।बेसुध वो जमीन पर पड़ी हुई और शरीर को ऊपर नीचे ऐंठ रही।हाथ पेट और कमर पर। ह्न ह्न ह्न की अजीब सी आवाज निकल रही थी उसके मुंह से।
उसकी हालत देख मेरे माथे पर ठंडे पसीने की बूंदे उभर आई।मैंने ऐसा दृश्य अपनी जिंदगी में पहले कभी नहीं देखा था। मैं उस बेटी को उठा के ,सिर हाथ में ले के पानी पिलाना चाह रहा था पर उसके मुंह से निकल रहे झाग,दांतो के किट किताने और डरावनी आवाज को सुन हिम्मत नहीं जुटा पाया।
आजू बाजू नजर दौड़ाई दो सौ से ज्यादा बेटियां इसी हालत में थी।
मुझे लगा मेरा सारा शरीर सुन्न हो रहा है।अब कोई आवाज मुझे सुनाई नहीं दे रही थी।स्कूल ,स्कूल से दूर कस्बे का बाजार,पहाड़ी,पहाड़ियों पर देवदार के पेड़ सब घूमते हुए नजर आना शुरू हुए।इस से पहले की मैं बेहोश हो के गिर पड़ता,किसी ने मुझे संभाल लिया और अपने आगोश में ले लिया।
अपनी पूरी इच्छा शक्ति को समेट मैंने आंखे खोली ,शंभू जी ने मेरा सर अपने कंधे पर ले रखा था और मेरे सिर पर पिता की तरह अपना हाथ फेर रहे थे।मेरी आंखे खुलती देख मुस्कुरा के बोले," ठीक हैं साहब,कैसा महसूस हो रहा अब। आप तो बेहोश हो गए थे।सिर पत्थर से टकरा जाता तो बड़ा हादसा हो जाता।"
मैं पूरी इच्छा शक्ति से कुछ कहना चाहता था पर मुंह से शब्द नहीं निकले।ऐसा लग रहा था जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने मेरा शरीर जकड़ रखा है और होंठ सिल दिए हैं। हां,मैने हाथ ऊपर कर ठीक होने का इशारा जरूर किया।
शंभू जी फिर बोले," हलवा बनवा दूं,प्रसाद बांट देते।क्या बोलते हो।"
मुझे नहीं पता मैने हां की या ना की। मैं वैसे ही शंभू जी के कंधे पर झूल रहा था।दिमाग शरीर को आदेश दे रहा था पर शरीर सुन नहीं रहा था।
फिर काफी देर बाद शास्त्री जी हलवा लाए।मुझे पहले पानी पिलाया और पूछा की कैसा महसूस कर रहे हो।मैने सिर झटका।अपनी पूरी इच्छा शक्ति से अपना शरीर हिलाया।ऐसा लग रहा था जैसे शरीर को हजारों गेलन शराब का नशा दे दिया गया हो।आंखे खोलने की कोशिश कर रहा था ,पर पलकें ऊपर होने को त्यार नहीं थी।शास्त्री जी ने पानी की बूंदे चेहरे पर मारी। चेहरे और आंखों को ठंडक महसूस हुई।पलकें खुल गई।मैने मुंह इधर उधर हिलाया।और सिर को शंभू जी के कंधे से उठाया ।
पानी पिया।थोड़ा अच्छा महसूस कर रहा था। दस मिनट के बाद खड़ा भी हो गया।पानीं का पूरा ग्लास गटका और हलवा भी खाया।
शंभू जी प्रिंसिपल ऑफिस तक ले आए और कुर्सी पर बिठा दिया।
मैने घड़ी की तरफ देखा ।आधे से ज्यादा दिन गुजर चुका था।शंभू जी ने बेहद दार्शनिक स्वर में कहा," इतना कर ही टाइम लगना था कल भी प्रसाद बनाने को।पुरानी रिवायतें हैं क्यों तोड़नी।चलने दो जैसा चल रहा।"
ये कह के वो बाहर चले गए।
आधा घंटा कुर्सी पर पसर कर मैं बाहर निकला।कक्षाएं चल रही थी।कहीं कोई चित्कार नहीं,कोई विचित्र आवाज नहीं।
स्कूल गेट की तरफ नजर दौड़ाई तो शास्त्री जी प्रसाद की प्लेटों को गढ़े में फिंकवा रहे थे और पियन को कड़ाही साफ करके स्टोर में रखने की हिदायत दे रहे थे।मुझे बाहर देख वो मेरी तरफ़ आए,कुछ बोले नहीं ,मुस्कुरा के अपनी कक्षा की तरफ चले गए।
मैने आज तक किसी से भी इस वाकए की चर्चा नहीं की।
सचिन भाई आप बताओ।क्या था ये सब।"
चाय वाला छोटू डर के मारे तीसरे मित्र के करीब खिसक आया था।
मैने भी चाय की चुस्की ली।अपने को थोड़ा संभाला और दिमाग पर जोर दिया।
"मास हिस्टीरिया " मेरे मुंह से निकला।"निसंदेह ये मास हिस्टीरिया का केस है।वो देखा आपने गांव में जब कोई अपने को खूंखार तांत्रिक कहने वाला देवता के सामने खेलना शुरू करता,अपने शरीर को जोर जोर से हिलाना शुरू करता तो कमजोर दिल और अविकसित दिमाग वाली महिलाएं ,कई बार पुरुष  भी तांत्रिक के साथ वैसा खेलना शुरू कर देते।उन्हें ये महसूस होता कि उनके शरीर में कोई और शक्ति घुस आई है।बिल्कुल ऐसा ही आपके स्कूल में हुआ होगा।बच्चों को अमावस्या वाले दिन हलवा न बन ने का तो पता था।घर जाकर बताया होगा तो घर वालो ने देवता के नाराज होने की बात उन्हें बताई होगी।ये चर्चा सभी बच्चों में हुई होगी और जब एक दो बच्चियां बेहोश हुई तो मास हिस्टीरिया से बाकी बच्चियां भी बेहोश होती गई।तुम भी मास हिस्टीरिया के शिकार हो गए और डर के मारे बेहोश हो गए। "कह कर मैने चाय का प्याला खत्म किया।" मास हिस्टीरिया में लोग सामूहिक विचित्र बर्ताव (कलेक्टिव ऑब्सेशनल बिहेवियर ) करना शुरू कर देते।" मैने आगे कहा," ये दो तरह का होता।एक को हम " मास एंग्जाइटी हिस्टीरिया कहते जिसमे सांस फूलने,चक्कर आना,शरीर ऐंठने की शिकायत होना, सर दर्द और वहां तक की दिल का दौरा भी पढ़ सकता।तुम्हारी छात्राओं के साथ ये हुआ।दूसरी तरह के मास हिस्टीरिया को हम " मास मोटर हिस्टीरिया " कहते।इसमें पार्शियल पैरालिसिस,तुम्हारा मोटर सिस्टम काम करना रोक सकता या फिर सेंट्रल नर्व सिस्टम काम करना बंद कर सकता।तुम्हारे साथ यही हुआ।महिलाएं और बच्चियां चूंकि भारतीय परिवेश में अधिक मानसिक प्रताड़ना वाले माहोल में जीती इसीलिए "मास इंगजायती हिस्टीरिया" की आसानी से शिकार बन जाती।
हिस्टेरिआ' का सरल अर्थ है बेलगाम भावनाओं की अनुभूति| जब यह सामूहिक स्तर पर ऐसी कोई अनुभूति है, तब इसे 'मास्स हिस्टीरिया' का नाम दिआ जाता है| 'हिस्टेरिआ' शब्द अब मनोविज्ञान मे उपयोग नहीं किआ जाता क्योंकि इसके पीछे की थ्योरी - फ्रोइडियन साइकोएनालिसिस - आधुनिक मनोविज्ञान में प्रचलित नहीं है| मनोवैज्ञानिकों को एहसास हुआ है कि मास्स हिस्टीरिया की घटनाओं में जो शारीरिक लक्षण पाए जाते है - जैसे सिरदर्द, बेहोशी, सास लेने में दिक्कत, इत्यादि - उनके पीछे भावनाएं तो होती ही है, लेकिन साथ ही संज्ञानात्मक और सांस्कृतिक कारण भी होते है| इसलिए 'मास्स हिस्टेरिआ' की बजाय अब 'मास्स पसाइकोजेनिक इलनेस' अर्थात ऐसी शारीरिक बीमारी जो सामूहिक स्तर पर मानसिक कारणों से उत्पन्न होती है. 1962 में तंजानिया का मास लाफिंग याद है ना।स्कूल में एक बच्ची ने हंसना शुरू किया तो सारे बच्चों में हंसने का हिस्टीरिया फैल गाय और स्कूल बंद करना पड़ा ।जल्दी ही आस पास के शहरों के लोगों ने भी हंसना शुरू कर दिया।1967 में सिंगापुर के पुरुषों को लगा कि किसी खास प्रजाति के सुअर का मांस खा के उनका लिंग का आकार छोटा हो गया है।लाखों पुरुषों ने जब ये शिकायत की तो सिंगापुर सरकार को  काउंसलिंग सेंटर खोलने पड़े।"
मेरे तीसरे मित्र को बात जंच गई।" हम्म ,मास हिस्टीरिया का ही केस था ये।अप्पर शिमला,मंडी इंटीरियर,सिरमौर में ऐसे हादसे कॉमन हैं।"
चाय वाला छोटू भी थोड़ा सामान्य हुआ।
मेरे दूसरे मित्र ने भी चाय खत्म की ।बीड़ी निकाली,माचिस से सुलगाई और बोला," हो सकता है,लेकिन इस के बाद एक और घटना घटी।इसे सुन कर आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे।"
मैं कुर्सी से उठा और वाशरूम जाने का इशारा किया ।
मित्र ने धुएं का कश छोड़ा और बीड़ी वाले हाथ से जाने का इशारा कर कहा," जा आओ,अब जो बताऊंगा उस से यहीं न हो जाए..... "
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल

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