Saturday, 24 April 2021

करोना के बाद -3 राजनैतिक सफाई:

 ताइवान एक बेहद छोटा सा देश है।

ना ही तो वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गनाइजेशन का सदस्य ना ही यूनाइटेड नेशन ऑर्गनाइजेशन का।
चाइना अभी तक इस देश को अपना नाराज राज्य मानता है और इसे स्वतंत्र देश का दर्जा भी नहीं देता।जापान ,चाइना जैसे बड़े देशों से घिरा हुआ कुछ द्वीपों का समूह।
करोना महामारी से सारी दुनिया कोहराम ग्रस्त है।परंतु ताइवान ने इस महामारी का सामना बड़े ही वैज्ञानिक और तकनीक के इस्तेमाल से किया है। ताइवान वो देश है जहां कॉविड -19 के मामले दुनिया के शुरुआती समय में आना शुरू हुए थे।परंतु पांच महीने गुजर जाने के बाद दुनिया का आंकड़ा जहां 16 लाख पर पहुंच गया ताइवान में अब तक बमुश्किल 500 एक्टिव केस हैं और सिर्फ 7 लोग मृत्यु के शिकार हुए हैं।
ताइवान का करोना से लडने का तरीका बड़ा सीधा था ।इसे हम टी. टी .टी. कहते है।ट्रेस,टेस्ट एंड ट्रीटमेंट।अर्थात पहले खोजो,फिर उसका टेस्ट करो और पॉजिटिव पाए जाने पर उसका इलाज करो।आप हैरान होंगे कि कुल 500 एक्टिव केस होने के बावजूद ताइवान के कठिन और कठोर फैसलों ने 90 हज़ार से ज्यादा लोगों को आइसोलेशन में रखा है।
आप पूछेंगे नहीं की ताइवान ऐसा कैसे कर पाया।
चलिए ।ताइवान की राजनेतिक व्यवस्था को समझते हैं।
ताइवान की राष्ट्रपति डॉक्टर साई इंग वेन लोकप्रिय नेत्री हैं। लदंन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पी एच डी धारी।
ताइवान के शिक्षा मंत्री डॉक्टर पान वेन चुंग ।ताइवान के राष्ट्रीय विश्व विद्यालय से एजुकेशन में पी एच डी धारी।
ताइवान के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर चेन शिह चूंग। ताइपे मेडिकल कॉलेज सरीखे विश्व प्रसिद्ध मदिकल कॉलेज से पास डॉक्टर और जाने माने महामारी विशेषज्ञ।
बस इतना ही काफी है समझने को।परिचयों में ही लेख खप्प जाएगा।
अब अपनी सरकारों पर नजर डाल लीजिए।
हमने कभी ऐसे पढ़े लिखे लोग चुन के भेजे लोक सभा,राज्य सभा या राज्य विधानसभाओं में?
कितने लोग ऐसे हैं हमारी सरकारों में जो ताइवान के सरकारी अमले के सम कक्ष भी ठहरते हों।
भेजेंगे कैसे?
 अभी तो हम वोट ही जाति के हिसाब से देते।धर्म के नाम पर देते।अपने दिल पर हाथ रख के ,अपनी आत्मा को साक्षी मान के सोचिए की जिंदगी में एक आध बार भी किसी कैंडिडेट को उसकी शैक्षणिक योग्यता के आधार पर वोट दिए हो।
काश एक आध हाथ खड़ा होता हां की मुद्रा में।
अधिकांश लोग किसी ना किसी राजनेतिक दल के भक्त हैं।उन्हें उसी पार्टी के उम्मीदवार को वोट देना है चाहे वो जो कोई हो।
अब राजनेतिक पार्टी का उम्मीदवार उसकी हाई कमान तय करेगी।तो सरसरी नजर मारी जाए तो पूरे देश में बमुश्किल 70 से 100 लोग हैं जो पूरे देश के लिए राजनेतिक टिकट तय करते अलग अलग पार्टियों के।आपका तो उसमे कोई रोल है ही नहीं।
फिर काहे का लोकतंत्र।ये तो बड़े बड़े राजनेतिक खानदानों के चौखट पर पड़ी जूती जैसा नहीं है जिसे पांव का इंतजार रहता।
अब सोचिए किसी कॉलेज केडर के असिस्टेंट प्रोफेसर को कैसा महसूस होगा कि उसका प्रिंसिपल मेट्रिक पास बना दिया जाए।
अरे हमे बूरा लगता भाई।स्कूल में जब यूनिवर्सिटी से घिस के निकले हुए कमीशंड लोगों के ऊपर कोई एक्स सर्विस मैन जो बमुश्किल तीन चार साल की नौकरी के बाद ही प्रिंसिपल बना के बिठा दिया जाता तो वो किस कदर नफरत और चिद से भरे होते आप से छिपा नहीं है।1996 में कमीशंड प्रवक्ता के सिर पर जब किसी प्राइवेट स्कूल से निकले सीधे हेडमास्टर भरती से बने प्रधानाचार्य बिठा दिए जाते तो वो अंदर ही अंदर किस क्रोध और हैरानी से भरे होते ये तो मैंने खुद महसूस किया है।
अब सोचिए ,क्या हाल होता होगा उन बड़े बड़े शिक्षाविदों का,बड़े बड़े विश्व विद्यालयों के कुलपतियों का जिनका शिक्षा मंत्री बमुश्किल दस जमात पास हो।
क्या समझाएंगे वो बड़े बड़े वैज्ञानिक उस विज्ञान मंत्री को जिसने कभी विज्ञान ही नहीं पढ़ा हो।
कैसा महसूस करते होंगे वो बड़े बड़े चिकित्सक ,सुपर स्पेशलिस्ट जिन्हे उस स्वस्थ्य मंत्री को जाकर सलाम ठोकनी है जिसे स्टेठोस्कोप डॉक्टरों की फैशन कि वस्तु जान पड़ती है।क्या समझा पाएंगे वो की वेंटिलेटर क्यूं जरूरी हैं।
आप बहस कर सकते की राजनीति से दूर ही रहना चाहिए।ये अच्छे लोगों का काम नहीं है।आप ये भी आडम्बर कर सकते की आप राजनेतिक नहीं है।
परंतु ये बिल्ली के आगे कबूतर जैसे आंख बन्द करने जैसा कृत्य है।आपके पैदा होने के बाद आप जैसे ही पंचायत रजिस्टर में अपने जन्म प्रमाण पत्र के साथ रजिस्टर होते हो,आप राजनीति में शामिल हो जाते हो।
आपको पहले टीके लगना,आपके स्वस्थ्य पर सरकारी नजर,आपका आंगनवाड़ी में फलाहार,आपका प्राइमरी स्कूल,आपकी उच्च शिक्षा सब कुछ राजनीति के उज्ज्वल पक्ष के फलस्वरूप है।
हस्पताल,घर घर पानी,बिजली,यातायात,सड़क,ट्रेन,जहाज सब कुछ राजनीति के ही उज्ज्वल पक्ष हैं।बड़े बड़े डेम,आई आई टी,आयुर्विज्ञान संस्थान,आइं आई एम् , ऐम्स सब कुछ तो उज्ज्वल राजनीति के ही परिणाम हैं।
परंतु साथ ही भ्रष्टाचार,दंगे,कतल,बलात्कार, डाके ,लूट,भाई भतीजावाद ये भी राजनीति के ही सयाह चेहरे हैं।बढ़ती बेरोजगारी,बढ़ते अपराध,बढ़ती बेचैनी ,बढ़ता अत्याचार,बढ़ता पूंजीवाद,बढ़ती अमानवीय मजदूर शर्ते सब राजनीति की ढलान है।
याद रखिए,आपका ,पैदा होने को छोड़ कर ,बाकी सब कुछ राजनीति ही तय करती।यहां तक कि मरने के बाद दफनाना या जलाना तक।
तो फिर आप क्यूं नहीं तय करते की आपकी राजनीति क्या है।बन्द कीजिए ये जाती के नाम पर,धरम के नाम पर और यहां तक कि किसी राजनेतिक दल के नाम पर वोट करना।अलबत्ता तो खुद राजनेतिक रुख करिए या फिर पढ़े लिखे,समझदार लोगों को लोकसभा और विधानसभा में भेजिए।आप जिन लोगों के घर अपनी बेटी को भेजना सुरक्षित नहीं समझते ,उनके हवाले देश को कैसे कर सकते हो?
चाणक्य ने कहा है ," .. जो लोग ये कह कर राजनीति से किनारा कर लेते हैं की ये भ्रष्ट लोगों का काम है,वो ही लोग उन भ्रष्ट लोगों के हाथों सर्वाधिक शोषित होते हैं।आपका राजनीति में हिस्सा ना लेना उन लोगों को आप पर शासन करने का मौका दे देता है जिनकी शक्ल तक आप देखना पसंद नहीं करते... "
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल

Tuesday, 20 April 2021

करोना के बाद :2 शिक्षा और इम्यून सिस्टम:


तूफान को शांत करने की कोशिश बेवकूफी है।तूफान में खुद को शांत करना होता है।तूफान खुद ब खुद गुजर जाता है। कोबिड 19 का ये तूफान भी गुजर जाएगा।
इसके बाद आप नए तरीके से जीना सीखोगे।
इस महामारी से जो सबसे बढ़िया फलसफा पूरी मनुष्य जाती ने सीखा वो बेहतरीन रोग प्रतिरोधक क्षमता के विकास का है।
शोध बता रहे हैं कि बेहतरीन रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को नोवेल करोना वायरस कुछ ज्यादा क्षति नहीं पहुंचा पाया। लाखों मृत्यु का ग्रास बने वायरस इंफेक्टेड लोगों में से अधिकांश लोग या तो ब्जूर्ग थे जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता वैसे ही कम होती या फिर वो थे जो किसी और बीमारी से ग्रसित थे।मात्र करोना इंफेक्शन से इक्का दुक्का जाने ही गई होंगी।
आज चर्चा इम्यून सिस्टम की और शिक्षा की।
पेरेंटिंग कोई आसान काम नहीं है।बड़े बड़े योद्धा इस मोर्चे पर धराशाई होते हैं।
फैशन हो,मज़बूरी हो अथवा अपने बच्चे को सबसे आगे देखने कि ठरक ,हम में से अधिकांश तीन साल की उम्र में अपने बच्चे को स्कूल भेजना शुरू कर ही देते हैं।
निजी स्कूल इस मौके को जबरदस्त तरीके से भुनाते हैं।
के . जी . ।
अब तो यू के जी और एल के जी भी हो लिए हैं।
क्या आपके बच्चे को के. जी .की वाकई जरूरत है ?????
मुझे इस बात को बताने में कोई शर्म महसूस नहीं होती की अपने अध्यापक साथियों से जब भी मैंने पूछा  पूछा की के. जी .का मतलब क्या है तो 80 % लोगो ने इनकार किया ,10 % लोगों ने फुल फॉर्म बताई की ये" किंडर गार्डन" है;बाकी 10 % उसकी सही फूल फॉर्म " किंडर गार्टन" बता गए परन्तु ये है क्या इस बारे उनको कोई जानकारी नहीं थी।।।
आप भी पता लगा लीजिये।।।।90 % स्कूल जो के. जी. के नाम पर ओसतन 3000 ₹ प्रति माह की दर से आपका पैसा लूटते है उनको खुद नहीं पता की ये है क्या।।।।95 % लोग जो इन क्लासेज को पढ़ाते हैं उनको के. जी. कि मूल भूत अवधारणा का कोई ज्ञान है ही नहीं।
आओ समझे कि के. जी. है क्या।
1840 इ में फ्रेडरिक फ्रोब्ल नामक के सज्जन ने बेड ब्लेंक्न बर्ग कस्बे में उन नवजात बच्चो जिनके माता पिता फैक्टरी में काम करते थे उनके लिए ,  दिन में चलने वाले स्कूल की स्थापना की।।। बच्चे  वहां दिन में खेलते ।।उसी दौरान नेचुरो चिकित्सा पद्धति का ये सिधांत प्रतिपादित हुआ की मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास 3 वर्ष की आयु से होना शुरू होता है। इस आयु से 6 वर्ष की आयु की तक के बच्चो को जितना एक्सपोजर हो  उतनी ही बेहतरीन उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता होगी।।। इसलिए आवश्यक है की बच्चे मिटटी में खेलें; घास में दौड़े ; कुओ का पानी पियें; खेतो खलिहानों में सैर करें; भारी मात्रा में कच्ची सब्जियां और फल खाएं।।। 
पहले जर्मनी और फिर फ्रांसिसी क्रांति ने शहरी कर्ण को बड़े पैमाने पर स्थापित किया।।।। शहर बसे जरूर पर घरो का जमावड़ा इतना गहरा था की बच्चों के लिए खेलने की जगह ही नहीं बची।।। इसीलिए किंडर  गार्टन महत्व पूर्ण हो गये।।। बच्चों को शहर से बाहर खेतों और खलिहानों में खेलने के लिए भेजा जाता जहाँ वो सामूहिक रूप से खेलते; गाने गाते और सब्जियां और फल खाते।।। इसी से वो समाजिक बनावट भी सीखते और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी होता।।।।
अपने बच्चों के के. जी .को देखिये।।। ए फॉर एपल ; बी फॉर बैट से ज्यादा कुछ नहीं।। जिन दीवारों से मुक्ति के लिए के.जी. बनाया था, बच्चा उन्हीं में कैद है।
फीस 2000 से 4000 ₹ ।।।
न पढ़ने वालो को कुछ पता न पढ़ाने वालो को ।
 माता पिता से पूछो तो जवाब एक ..."बच्चे का बेस स्ट्रोंग होना चाहिए...."
अगर आपका बच्चा मिटटी में खेलता है; घास पर घूमता है ; कुएं का पानी पीता है ,बाकी बच्चों के साथ खेलता है और दबा के सब्जी और फल खाता है तो बताइए सच में उसे के .जी .की आवश्यकता है क्या???
अब तो निजी शिक्षा की दुक्कानो ने लोवर के. जी .और अप्पर के .जी .भी शुरू कर दी हैं।।। इनका बस चले तो ये पेट में ही बच्चे को सिखाना शुरू कर दें।।।। आखिर बच्चे का बेस जो स्ट्रोंग करना है।।अगर अभिमन्यु सुभद्रा के पेट में चक्रव्यूह समझ सकता है,तो आपका  बच्चा क्यूं नहीं।
याद रखिए किंडर गारटन का शाब्दिक अर्थ "बच्चों का बगीचा" जरूर है परन्तु इसका मूल अर्थ "बच्चा बगीचे में" है।
मैं कितने परिवारों को देखता हूं जो गांव छोड़ शहर में मकान किराए पर ले अपने बच्चों को किसी निजी स्कूल में डाल कर अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं।बच्चे का "बेस "स्ट्रॉन्ग करना है।पर लड़ाई किस बेस की है ये समझ ही नहीं। 
ओ भाई शैक्षिक "बेस" का छोटा सा मतलब होता है कि दसवीं तक आपके बच्चे को दो विषय अच्छे से आने चाहिए।एक अंग्रेजी और दूसरा गणित।पर असली बेस है उसका इम्यून सिस्टम जो सारी जिंदगी उसे स्वस्थ रखेगा,रोगों से बचाएगा,करोना सरीखे इंफेक्शन से सुरक्षित रखेगा।
इसलिए अपने बच्चे पर रहम कीजिए।उसे खेतो में जाने दो।मिट्टी में खेलने दो।तितलियों के पीछे भागने दो।मामूली सर्दी जुकाम के लिए भारी एंटीबायोटिक ना दीजिए ,खुद ब खुद ठीक होने दीजिए।
कुरकुरे,मुरमुरे  की जगह उसे फल,कच्ची सब्जियां दीजिए।पिज्जा बर्गर की जगह मक्की की स्टफ्ड रोटी खिलाएं मक्खन के साथ ।कोल्ड ड्रिंक की जगह लस्सी का बड़ा गिलास हो जाए, नींबू पानी,ब्रह्मी का जूस हो जाए। चॉकलेट ,टॉफी से कहीं ज्यादा टेस्टी आंबला कैंडी होती है।
मैं आशान्वित हूं,की,इस महामारी के बाद चीजें बदलेंगी,सोच बदलेगी।प्रकृति ने गेंद उठा के हमारे पाले में फेंक दी है।अब बारी हमारी है।।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल।

Sunday, 18 April 2021

करोना के बाद :1

 

नमस्ते।
भारतीय संस्कृति की ये सम्मान और आदर की शारीरिक भंगिमा सर्वत्र अपना ली जाएगी।
दोनों हाथ जोड़, हलका सा सिर झुका और आंखें मूंद प्रणाम,सादर प्रणाम, प्रनिपात अथवा नमस्ते कहने की प्रथा कब शुरू हुई, इतिहास में दर्ज नहीं है।
फिर भी रिग वेद की सूक्तियां(रिक) जिसमें इन्द्र ,अग्नि, सूर्य,मित्र और वरुण की पूजा का उल्लेख है शारीरिक भंगिमा की तरफ कोई इशारा नहीं करती।
रिग वेद में ही " रुद्र" नाम के वैदिक भगवान का उल्लेख है जिसे वर्तमान में भगवान शिव के साथ जोड़ा जाता है।परंतु ये गलत है।
"रूद्र" भयंकर तबाही करने वाला कोई वैदिक भगवान है जिसका भगवान शिव के साथ कोई लेना देना ही नहीं है।लाल रंग के शरीर वाला ,भयंकर मौसम लेने वाला,आग बरसाने वाले इस वैदिक भगवान को शिव कब मान लिया गया इस बारे में स्कॉलर एक मत नहीं है।परंतु फिर भी रिग वेद में जब भी पांच वर्णित देवता " रुद्र" को शांत करने हेतु उनके समक्ष जाते हैं तो वो दोनों हाथ जोड़ प्रणाम करते हैं।
इसलिए चलिए मान लेते हैं कि प्रणाम करने की शारीरिक भंगिमा का भारतीय संस्कृति में कोई 6 हज़ार वर्ष पूर्व आरम्भ हुआ होगा।
"शेक हैंड" अर्थात हाथ मिलाना दुनिया में सर्वत्र सम्मान के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शारीरिक कलाप है।संक्रमण काल गुजर जाने के बाद जब विश्व नए विधान की तरफ देख रहा होगा तो शायद ही कोई शेक हैंड करे।
"शेक हैंड " की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है।
अर्चेओल्जी और पुरातत्व विभाग के के दस्तावेज बताते हैं कि हैंड शेक वास्तव में पुरानी ग्रीक सभ्यता में आरम्भ हुआ।
ये कोई सम्मान की भंगिमा नहीं है।ग्रीक सभ्यता में इसे " देक्षियसिस" कहा जाता है ।ये भंगिमा वास्तव में युद्ध में अपनाई जाती थी जिसका अर्थ होता था कि शत्रु के हाथ में कोई शस्त्र नहीं है। हारे हुए अथवा आत्मसमर्पण करने वाले शत्रु के साथ शेक हैंड करने का कारण सिर्फ ये जानना होता था कि शत्रु पूर्णतः शस्त्र हीन है।
तो युद्ध, घृणा और हिंसा में प्रयुक्त होने वाली ये शारीरिक मुद्रा सम्मान कि मुद्रा कैसे बनी इस पर शोध किया जा सकता है।
ग्रीक पुरातत्व की खोजों में कुछ राजाओं की बेवफ़ा पत्नियों द्वारा अपने पतियों की हत्या कि साजिशों के बेनकाब होने के बाद उनके हैंड शेक का भी उल्लेख है।
वर्तमान समय में हैंड शेक दुनिया में वायरल इंफेक्शन का दूसरा सबसे बड़ा कारण है।सार्स महामारी से ले करोना महामारी हैंड शेक हर जगह वायरस फैलाव का बड़ा कारक है।
उम्मीद है ,इस वक़्त से ले के तब तक ,जब तक,आप जिंदा हैं,तब तक आप सम्मान,प्रेम ,अपना पन दर्शाने हेतु केवल और केवल दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम ही करेंगे।
ये वैज्ञानिक है,कम से कम आप अपने हाथों से ना तो रोगाणु और विषाणु फैलाएंगे ना किसी और से ग्रहण करेंगे।
सचिन ठाकुर
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल

Saturday, 17 April 2021

पॉजिटिव पोस्ट:

 पॉजिटिव पोस्ट:

साल 2020 के आखिरी तीन माह में पूरे विश्व में जो कुल मृत्यु हुई उनमें से:
1. कोविड़ 19 से 3,14,687
2. मलेरिया से 3,40,584
3. आत्म हत्या से 3,53,696
4. सड़क दुर्घटना से 3,93,479
5. एड्स से 2,40,950
6. अल्कोहल से 5,58,471
7. धूम्रपान से 8,16,498
8. कैंसर से 11,67, 714
तो आपको क्या लगता है करोना वाकई इतना खतरनाक है ...
या फिर ऐसा लग रहा आपको की सारा मीडिया कैंपेन अमेरिका और चीन के बीच जारी व्यवसायिक हितों के युद्ध को संभालने के लिए है..
या फिर फाइनेंस मार्केट में नेपथ्य में चल रही मर्जर और अमानवीय खरीद फरोख्त पर पर्दा डालने की कोशिश हो रही है...
या फिर अमेरिका अपने बॉन्ड्स बेचने की फिराक में है की वित्तीय घाटा कम किया जा सके..
या फिर सारा तमाशा बड़ी फरमा कंपनियों द्वारा प्रायोजित है ताकि वो सेनिटाइजर,मास्क, पीपीई किट और वैक्सीन को ऊंचे दाम पर बेच कर अरबों खरबों डॉलर कमा सकें।
कुछ भी हो सकता है।
मजेदार बात ये है कि सारस  की मारक दर 10% है,स्वाइन फ्लू की 28% और कोवीड 19 की सिर्फ 2%।
एक बड़ा दिलचस्प डाटा एक वेबसाइट पे मिला।
वेबसाइट लिख रही है की आज के दिन पूरे विश्व में कोविड 19 ने  6406 जाने ली।
आज ही के दिन 26,283 लोग कैंसर से मरे,24,641 लोग दिल की बीमारी से,4300लोग शुगर से, 2704 लोग मच्छरों के काटने से मारे गए और 137 लोग सांपो के काटने से मारे गए।और भी दिलचस्प पहलू ये है की 1300 लोगों को उनके साथी मनुष्यों द्वारा कत्ल कर दिया गया, मतलब उनकी हत्या हो गई।
तो अब क्या कहेंगे आप।
विज्ञान की राय दूं...
1.हमे करोना वायरस के साथ अभी कई वर्षों तक रहना है।इसलिए घबराएं नहीं,ना ही डरे।वास्तविकता के साथ जीना सीखिए।
२.एक बार करोना वायरस आपकी कोशिका की भित्ति के अंदर दाखिल हो गया फिर गर्म पानी और काढ़ा गैलन के हिसाब से पी लो वो वायरस को नहीं मार सकते। हां,तुम्हे बाथरूम के बार बार दर्शन जरूर करवा  देंगे।
3.अपने हाथ बार बार धोना और छह फीट की शारीरिक दूरी बनाए रखना ही सबसे कामगार हथियार है।
4.अगर आपके घर में कोई करोना मरीज नहीं है तो घर को बार बार डिस इंफेक्टेंट करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
5. ग्रॉसरी बैग्स,प्लास्टिक बैग्स, ए टी एम या गैस स्टेशन इन्फेक्शन नहीं करते।बस अपने हाथ साफ रखिए और चेहरा ढक कर रखिए।
6. कोविड़ खाने से फैलने वाला इन्फेक्शन नहीं है।ये तभी फैलता है जब हवा में किसी के द्वारा खांसने या छींकने से तरल बूंदे उड़ें और आपके नाक या मुंह से शरीर में प्रवेश कर जाएं।अभी तक ऐसा कोई मामला नहीं आया की ऑर्डर किए गए पिज्जा से संक्रमण फैला हो। हां,खाना ऑर्डर किया हो तो माइक्रोवेव में उसे गर्म जरूर कर लें।
7.आपकी सूंघने और स्वाद की शक्ति बहुत ज्यादा एंटी एलर्जी दवा के इस्तेमाल से भी जा सकती है और बहुत सारे अन्य वायरल संक्रमण से भी।
8.घर में घुसते ही कपड़े बदलने या शावर लेने की खास आवश्यकता नहीं है।याद रखिए साफ रहना "गुण" है,पागलपन नहीं।
9. करोना वायरस हवा में नहीं तैरता।ये छींक या खांसी से संक्रमित व्यक्ति के मुंह से निकली बूंदों के लेन देने से होता है जिसके लिए बेहद कम शारीरिक दूरी चाहिए होती है।
10. हवा साफ है तो बागों में ,बगीचों में घूमिए।बस शारीरिक दूरी बनाए रखें।
11.हाथ धोने के लिए आम साबुन का इस्तेमाल करें।महंगे एंटी बैक्टिरियल सोप पर पैसा खर्च करने की आवश्यकता नहीं।एंटी बैक्टिरियल सोप वायरस का कुछ नहीं उखाड़ सकते।
12.जूतों से वायरस घर में आता हो इसकी संभावना 10,000 में एक से ज्यादा नहीं है।
13. विनेगर,गन्ने का रस या अदरक के रस से वायरस नहीं मरते।ये प्रतिरोधी क्षमता को बढ़ा सकते हैं, दवा का काम नहीं कर सकते।
14. मास्क केवल भीड़ भाड़ वाले इलाके में पहने ।घर में , अपनी कार में या अपने निजी ऑफिस में कतई नहीं।वर्ना ये आपके शरीर के ऑक्सीजन लेवल में कमी करेंगे और आप किसी अन्य बीमारी की चपेट में आ जाएंगे।
15. ग्लव पहनना और भी बुरा आइडिया है। दस्टानो पर वायरस आसानी से जम जाते हैं।हाथों को बार बार बीस सेकंड के लिए धोना कहीं ज्यादा असरकारक आइडिया है।
16. घंटे बजाने से वायरस नहीं मरते, ना ही किसी पशु के मूत्र से,ना ही दिए के प्रकाश न ही किसी सामग्री के स्वाह होते धुएं से।
17. सबसे खास बात।अपने आप को स्टरलाइट परिवेश में कैद रखने से आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता ध्वस्त होती है।बेशक आप रोग प्रतिरोधक क्षमता को विकसित करने के लिए दवा या सप्लीमेंट ले रहे हों।अपने घर में बैठने से लाख गुना बेहतर है की आप बगीचों,खेतों, नदी के तटों ,समंदर के तटों पर टहलने के लिए जाएं।आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता उतनी ही विकसित होगी जितना रोगाणु आपके शरीर पर आक्रमण करेंगे।
उम्मीद है लेख पढ़ कर आपको अच्छा महसूस हो रहा होगा।
मैं खुद होम आइसोलेशन में हूं।मेरे एक भले शरीफ पड़ोसी परसों शाम को घर आए थे ।चाय पीने के बाद बोले की मेरे इंस्टीट्यूशन के डायरेक्टर करोना पॉजिटिव हैं और मैं उनका प्राइमरी कॉन्टैक्ट हूं।पिछले कल वो खुद भी करोना पॉजिटिव हो गए।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र ,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल।

वॉट्सएप पर हुतिए

 वॉट्सएप पर हुतिए:

देखे हो।। नहीं देखे हो।।
दिखाता हूं।
1. जो जिंदगी में कभी क्लास मॉनिटर नहीं बने वो आजकल ग्रुप एडमिन बन गए हैं।अच्छा है।खुद ही दूसरों को अपने ग्रुप में एड करते हैं ।फिर हड़काते हैं।कभी कहते हैं कि इस ग्रुप में ऐसी पोस्ट नहीं डालनी।कभी कहते हैं कि ये ग्रुप इसलिए नहीं बना।कभी कहते हैं ये ऑफिसियल ग्रुप है इसपे सिर्फ ऑफिस रिलेटेड पोस्ट ही डालें।। 
हुतियो तुमको बोला किसने ग्रुप बनाने को।जब वॉट्सएप नहीं था तब क्या ऑफिस और दुनिया नहीं चल रही थी।
2. जिन बेचारों का धर्म से ,पवित्र पुस्तकों से दूर दूर का कोई नाता नहीं ,जिन्होंने वेद का नाम सुना है पर पढ़ना तो दूर उनकी शक्ल नहीं देखी वो धर्म कि शिक्षा देने निकल पढ़ते हैं वॉट्सएप पर।
हूतियो,तुमको पता ही नहीं सनातन कितना महान है,,कितनी महान शख्शियतों ने अपने जीवन की संपूर्ण तपस्या के रस से , उस समय की उत्कृष्ट वैज्ञानिक अवधारणाओं से और अपने बेहतरीन अनुभवों से सनातन को सींचा है।तुम्हारी इन्हीं हूतिया हरकतों से ,विज्ञान के सिद्धांतो का बेड़ा गरक कर के किसी पुराण की किसी पंक्ति के साथ सामंजस्य बैठाने की हूटिया हरकत के कारण ही दो टके के लोग इस महान धरम का मजाक बना के चले जाते हैं।
3. जो भी थोड़ा बहुत धार्मिक दिखे,भले ही बे सिर पैर का हो,कोई तर्क ना हो ,उसे शेयर जरूर करना है।
हूटियो, नासा ने कोई ऐसा सैटेलाइट अंतरिक्ष में नहीं भेजा जो अंतरिक्ष की ध्वनियों को सुन रहा।ध्वनि प्रक्षेपण के लिए कोई मीडियम चाहिए जैसे हवा या पानी।अंतरिक्ष शुन्य है।फिर ध्वनि कैसे सुनी जाएगी।इसलिए ये विश्वास करना की ओम की ध्वनि सूर्य से निकल रही या अंतरिक्ष में प्रस्फुटित हो रही बहुत बड़ा हुतियापा है।
4. आयुर्वेद के नाम पर,हर्बल बूटी के नाम पर कुछ भी भेज दो वो रामबाण।
हुतियों ,आयुर्वेद के किसी डॉक्टर को देखे हो कोई टोटका बताते।एलोपैथी की तरह आयुर्वेद भी विज्ञान है।कभी जा के आओ किसी आयुर्वेदिक डॉक्टर के पास।। एलोपैथी कि तरह फौरन इलाज नहीं होगा ना ही सभी असाध्य बीमारियों का इलाज,परंतु जो भी इलाज मिलेगा वो रोग को जड़ से उखाड़ फेंकेगा।
5. हिन्दू मुसलमान करने वाले हुटिए टीवी चैनल पर ही नहीं हैं, वटसएप तो इसका कारखाना है।ऐसी पोस्ट बनाएंगे जैसे अभी जा कर दूसरे धर्म वालो को काट देंगे।
हूतियों, कभी मक्खी मच्छर भी मारे हो।पहले इंसान बन लो।।हिन्दू मुसलमान बाद में बनना।
6. नेता तो जैसे सलाद है।कोई भक्ति रस का नींबू नुचेड रहा,कोई राग दरबारी का काला नमक छिड़क रहा तो कोई विरोध की काली मिर्च।मोदी साहब को कोई शेर दिखाता,कोई चौकीदार ,कोई चोर तो कोई अवतार।
हूटियों,लंबे अरसे बाद देश को पूरे समर्थन वाली सरकार मिली है और नी संदेह एक जबरदस्त नेता।काम करने दो।सवाल पूछो।जवाब मांगो।।
7. एग्जिट मारने वाले हुतिए: अलबत्ता तो हम विचार शून्यता के दौर में जी रहे।हमारी सूक्तियां और युक्तियां दोनों गूगल से आती।कोई बुद्धिमान अपने मूल विचार ग्रुप में व्यक्त करे तो विचार शून्य हुटियों के दिमाग में खारिश हो जाती।वो विचार प्रस्तुत करने वाले पर टूट पड़ते।ऐसी पोस्ट यहां नहीं चलेगी,किसी और ग्रुप में डालो,हमारी आस्था पर प्रश्न ना करो।विचार व्यक्त करने वाला बुद्धिमान जब अपने तर्क प्रस्तुत करता तो हुतिये या तो गाली गलौज पे उतर आते या ग्रुप से एग्जिट कर जाते।
हुतियो ,अगर चेतना समृद्ध नहीं हुई है तो ये शर्म की बात नहीं है।परंतु चेतना समृद्ध होने ही नहीं देनी तो फिर आपका कुछ हो ही नहीं सकता।अगर विचार अभिव्यक्ति में असेहज हो तो औरो के विचारों का आनंद लेना सीखो।
आप तो नहीं हो ना ऐसे हुटिये।
विज्ञान ने ये प्लेटफॉर्म इस लिए गढ़े थे ताकि आप सब कनेक्टेड रहें।बात ना भी कर पाओ तो कम से कम सलामती का एक मेसेज पहुंचा पाओ।सुभा कोई अच्छा सा गुड़ मार्निंग मेसेज भेज दो,सोने से पहले गुड नाइट का।कुछ अच्छे कॉमेडी वाले वीडियो शेयर कर लो,कुछ अच्छी ज्ञान विज्ञान के बातें भी।मेरी तरह संगीत के दीवाने हो तो कुछ अच्छी गजलें ,कुछ बेहतरीन मीठे गाने भी शेयर कर लो। कुकिंग के शौकीन हो तो रेसिपी,किताबों के शौकीन हो तो बेहतरीन किताबें।विज्ञान के टापिक्स डिस्कस कर लो।
अच्छा है ना।
आजकल तो फ्रस्ट्रेशन भी वॉट्सएप पे निकलती।मेरे पिछले किसी स्कूल में एक बेहतरीन और जाने माने  शिक्षक से उस स्कूल की आई टी शिक्षिका  भयंकर जलन रखती थी।अब जो शिक्षक महान बना अपने तप से बना उसका तुम क्या उखाड़ लोगी।मोहतरमा ने स्कूल का ग्रुप बनाया था,उसमे शिक्षक की किसी पोस्ट पर झिड़क दिया।शिक्षक बेहतरीन था ही साथ में भला इंसान भी।बिना तर्क वितरक के ग्रुप से एग्जिट ले लिया। आई टी शिक्षिका इसी में ही पुलकित हो उठी की देखो मैंने उस शिक्षक को ग्रुप से निकाल दिया।है ना हुटियागीरी।।
पता नहीं ,वक्त छोटा हो गया है या दिमाग ।पर डिजिटल दुनिया है कमाल की।
शेर अर्ज़ है।
" आजकल वो हमसे डिजिटल नफरत करते हैं,,,
हमे ऑनलाइन देख कर फौरन ऑफलाइन हो गुजरते हैं।।
😂😂😂
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र।
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल से।

Friday, 16 April 2021

भूत: 2

 मेरी कहानी खतम हो चुकी थी और मेरे विज्ञानिक तर्क से मेरे मित्र सहमत भी। हम तीनो अभी वहीं बैठे हुए थे।रात दूसरे पहर की तरफ बढ़ चली थी।

मेरे साथी मित्र ने अपनी कहानी सुनाने को कमीज की बाहें ऊपर खींच ली।जेब से बीड़ी निकाली और टेबल पर रखी माचिस से सुलगा दार्शनिक अंदाज में कश खींचा।
धुएं को ऊपर की तरफ धकेल,छत की तरफ नजरें गढ़ा मित्र ने कहानी शुरू की," सचिन भाई ,आप तो जानते हैं मेरी पहली अपॉइंटमेंट मंडी जिला के दूर दराज क्षेत्र में हुई।चार पांच साल वहां नौकरी करने के बाद मुझे उन पहाड़ों से इश्क हो गया और मैने वहीं जमीन खरीद कर सेबों का बगीचा त्यार किया।अब वहां घर भी बना लिया है।बात तब की है जब मैने नया नया स्कूल ज्वाइन करा।स्कूल अभी नया नया अपग्रेड हुआ था और प्रिंसिपल कोई था नहीं।सीनियर मैं ही था तो डी डी ओ पावर भी मेरे पास आई।
अभी कुंवारा था।
बाकी प्राध्यापक साथियों की भी फ्रेश अपाइंटमेंट हुई थी बस कुछ टी जी टी साथी वहां के लोकल थे और बाकी हम ज्यादा तर मंडी ,सुंदरनगर या आपके सरकाघाट से।भूगोल प्रवक्ता मेरे मंडी कॉलेज के सहपाठी चमन थे।
हम चार पांच प्राध्यापक साथियों ने पास पास के घरों में क्वाटर ले लिया।चमन और मैं एक ही घर में साथ साथ वाले क्वाटर में थे।ब्रेक फास्ट मैं बना देता,डिनर चमन।लंच हम स्कूल में बनवा लेते थे।
मेरे क्वाटर के साथ वाले घर में ड्राइंग मास्टर साहब का क्वाटर भी था।वो जोगिंदर नगर के किसी गांव से थे।
स्कूल का काम अब संभालना शुरू किया और पढ़ाना भी।स्कूल की कुछ रिवायते थी जैसे हर अमावस्या को वहां प्रसाद बनता था और शास्त्री साहब मंत्रोचार करने के बाद सभी छात्रों और अध्यापकों को उसे बांटते।इसी काम में उस दिन का आधा हिस्सा खत्म हो जाता।मैने शास्त्री जी से इसका कारण पूछा।शास्त्री जी ने बताया कि ये स्कूल की पुरानी प्रथा है।जिस जगह पर ये स्कूल बना है वहां पहले किसी लोकल देवता का स्थान था।देवता का स्थान स्कूल बनाने के लिए बदला गया परंतु इस शर्त पर की हर अमावस्या को प्रसाद बना के ,देवता को चढ़ा के सबको खिलाया जाए।"
ये कह कर मित्र ने विराम लिया।बीड़ी के तीन चार कश फटा फट खींचे और कैंटीन वाले को कड़क चाय के तीन गिलास बनाने को कहा।कैंटीन वाला छोटू नींद से ऊंघ रहा था ।बोला ," साहब,आखिरी कप।इसके बाद सो जायूंगा।" 
मित्र ने अंगूठा दिखा के अपनी स्वीकृति दी और कहानी का अगला पड़ाव शुरू किया," सचिन भाई,आपकी तरह मैं भी भगवान या देवताओं में कोई आस्था नहीं रखता।मैने शास्त्री साहब को हुक्म दिया की बंद करो ये अंधविश्वास यार। कब तक इन ढकोंसलो पर कायम रहेगी दुनिया।शास्त्री साहब मुस्कुराए।बोले मैं भी ऐसा ही चाहता हूं।पर रिवाएते हैं। लोकल टीचर्स को समझा दीजिएगा। 
अगली अमावस्या को प्रसाद नहीं बनाया।किसी ने ध्यान भी नहीं दिया।हालांकि टी जी टी कला अध्यापक शंभू जी,जो स्थानीय निवासी थे, मेरे पास आए और बोले की प्रसाद बनवा लेना था।पुरानी मान्यताएं हैं।जब मैं भी इस स्कूल में पढ़ता तब भी बनता था।अब तो मैं ही 50 का हो गया।तब ये प्राइमरी स्कूल ही था।मैने शंभूंजी को आश्वस्त किया कि दुनिया चांद पे पहुंच गई ,कुछ नहीं होता।पुरानी मान्यताएं बदलनी चाहिए।
अगले दिन सुभा प्रेयर के शुरू होते ही एक लड़की को चक्कर आ गया।पी टी आई साहब ने उसे उठा कर बरामदे में लेटाया और पानी पिलाया।शंभू जी मेरे पास ही खड़े थे ।प्रश्नवाचक नजरों से मेरी तरफ़ देख रहे थे।
मैंने खुद ही जवाब दिया," बच्चे सुभा खाना खा के नहीं आते।खड़े रहने से चक्कर आ जाता।बेटियों के साथ और भी समस्याएं होती। बासी खाना खा के अपच हो सकती ,गैस बन सकती पेट में उस से भी चक्कर आ सकते। मेंस्टुरेशन पीरियड्स भी हो सकते।कितना दम होता हमारी बच्चियों में।इसीलिए तो सरकार दोपहर का खाना देती।"
मैने अपनी बात खत्म की ही थी की पांच और बेटियां बेहोश हो के गिर पढ़ी। मैं चौंका।फिर दस पन्द्रह और।मेरी आंखे हैरानी से चौड़ी हो रही थी।इस से पहले की मैं सभी बच्चों को बैठने के लिए बोलता पंद्रह बीस बच्चियां और बेहोश हो गई।
विद्यालय में अफरा तफरी मच गई।
बच्चियों के बेहोश होने का का क्रम बढ़ता गया और इस से पहले की हम शिक्षक कुछ करते दो अध्यापिकाएं भी बेहोश हो के गिर पड़ी।
मैं किंकर्तवय मूड हो के बस देखता रह गया।"
इतने में कैंटीन वाला छोटू चाय ले के आ गया।" चाय साहब" छोटू ने आवाज दी।
मेरी और तीसरे मित्र की तंद्रा टूटी।दूसरे मित्र ने कहानी का जैसे समा बांधा था हमे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे हम ये सब सामने होते देख रहे हैं।
मित्र ने चाय की प्याली उठाई।चाय वाला छोटू भी साथ ही बैठ गया।
मैने और तीसरे मित्र ने चाय का प्याला उठाया।
दूसरे मित्र ने कहानी आगे शुरू की," विद्यालय में हाहाकार मच गया था।किसी को कुछ समझ में ना आए क्या करें।कोई पानी की बाल्टी उठा के लाए,कोई बच्चा अपनी बहन या रिश्तेदार बेटी को गोद में ले फूंक मारे ,कोई पानी पिलाएं।बहुत से छोटे बच्चों ने रोना ,चीखना चिल्लाना शुरू कर दिया।विद्यालय घनघोर चित्कार और भयानक डर की ध्वनियों से भर गया था।मुझे लगा मैं खुद भी बेहोश हो के गिर जायुंगा।ऐसा दृश्य मैने पहले कभी नहीं देखा था। हर तरफ बेहोश हुई बच्चियां।मैंने एक बच्ची को गौर से देखा।उसकी आंखे खुली हुई थी परंतु पुतलियां ऊपर की ओर चढ़ी हुई।दांत आपस में कट कटा रहे।मुंह से झाग निकल रही।मुंह बिल्कुल लाल और पसीने से भरा हुआ था।बेसुध वो जमीन पर पड़ी हुई और शरीर को ऊपर नीचे ऐंठ रही।हाथ पेट और कमर पर। ह्न ह्न ह्न की अजीब सी आवाज निकल रही थी उसके मुंह से।
उसकी हालत देख मेरे माथे पर ठंडे पसीने की बूंदे उभर आई।मैंने ऐसा दृश्य अपनी जिंदगी में पहले कभी नहीं देखा था। मैं उस बेटी को उठा के ,सिर हाथ में ले के पानी पिलाना चाह रहा था पर उसके मुंह से निकल रहे झाग,दांतो के किट किताने और डरावनी आवाज को सुन हिम्मत नहीं जुटा पाया।
आजू बाजू नजर दौड़ाई दो सौ से ज्यादा बेटियां इसी हालत में थी।
मुझे लगा मेरा सारा शरीर सुन्न हो रहा है।अब कोई आवाज मुझे सुनाई नहीं दे रही थी।स्कूल ,स्कूल से दूर कस्बे का बाजार,पहाड़ी,पहाड़ियों पर देवदार के पेड़ सब घूमते हुए नजर आना शुरू हुए।इस से पहले की मैं बेहोश हो के गिर पड़ता,किसी ने मुझे संभाल लिया और अपने आगोश में ले लिया।
अपनी पूरी इच्छा शक्ति को समेट मैंने आंखे खोली ,शंभू जी ने मेरा सर अपने कंधे पर ले रखा था और मेरे सिर पर पिता की तरह अपना हाथ फेर रहे थे।मेरी आंखे खुलती देख मुस्कुरा के बोले," ठीक हैं साहब,कैसा महसूस हो रहा अब। आप तो बेहोश हो गए थे।सिर पत्थर से टकरा जाता तो बड़ा हादसा हो जाता।"
मैं पूरी इच्छा शक्ति से कुछ कहना चाहता था पर मुंह से शब्द नहीं निकले।ऐसा लग रहा था जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने मेरा शरीर जकड़ रखा है और होंठ सिल दिए हैं। हां,मैने हाथ ऊपर कर ठीक होने का इशारा जरूर किया।
शंभू जी फिर बोले," हलवा बनवा दूं,प्रसाद बांट देते।क्या बोलते हो।"
मुझे नहीं पता मैने हां की या ना की। मैं वैसे ही शंभू जी के कंधे पर झूल रहा था।दिमाग शरीर को आदेश दे रहा था पर शरीर सुन नहीं रहा था।
फिर काफी देर बाद शास्त्री जी हलवा लाए।मुझे पहले पानी पिलाया और पूछा की कैसा महसूस कर रहे हो।मैने सिर झटका।अपनी पूरी इच्छा शक्ति से अपना शरीर हिलाया।ऐसा लग रहा था जैसे शरीर को हजारों गेलन शराब का नशा दे दिया गया हो।आंखे खोलने की कोशिश कर रहा था ,पर पलकें ऊपर होने को त्यार नहीं थी।शास्त्री जी ने पानी की बूंदे चेहरे पर मारी। चेहरे और आंखों को ठंडक महसूस हुई।पलकें खुल गई।मैने मुंह इधर उधर हिलाया।और सिर को शंभू जी के कंधे से उठाया ।
पानी पिया।थोड़ा अच्छा महसूस कर रहा था। दस मिनट के बाद खड़ा भी हो गया।पानीं का पूरा ग्लास गटका और हलवा भी खाया।
शंभू जी प्रिंसिपल ऑफिस तक ले आए और कुर्सी पर बिठा दिया।
मैने घड़ी की तरफ देखा ।आधे से ज्यादा दिन गुजर चुका था।शंभू जी ने बेहद दार्शनिक स्वर में कहा," इतना कर ही टाइम लगना था कल भी प्रसाद बनाने को।पुरानी रिवायतें हैं क्यों तोड़नी।चलने दो जैसा चल रहा।"
ये कह के वो बाहर चले गए।
आधा घंटा कुर्सी पर पसर कर मैं बाहर निकला।कक्षाएं चल रही थी।कहीं कोई चित्कार नहीं,कोई विचित्र आवाज नहीं।
स्कूल गेट की तरफ नजर दौड़ाई तो शास्त्री जी प्रसाद की प्लेटों को गढ़े में फिंकवा रहे थे और पियन को कड़ाही साफ करके स्टोर में रखने की हिदायत दे रहे थे।मुझे बाहर देख वो मेरी तरफ़ आए,कुछ बोले नहीं ,मुस्कुरा के अपनी कक्षा की तरफ चले गए।
मैने आज तक किसी से भी इस वाकए की चर्चा नहीं की।
सचिन भाई आप बताओ।क्या था ये सब।"
चाय वाला छोटू डर के मारे तीसरे मित्र के करीब खिसक आया था।
मैने भी चाय की चुस्की ली।अपने को थोड़ा संभाला और दिमाग पर जोर दिया।
"मास हिस्टीरिया " मेरे मुंह से निकला।"निसंदेह ये मास हिस्टीरिया का केस है।वो देखा आपने गांव में जब कोई अपने को खूंखार तांत्रिक कहने वाला देवता के सामने खेलना शुरू करता,अपने शरीर को जोर जोर से हिलाना शुरू करता तो कमजोर दिल और अविकसित दिमाग वाली महिलाएं ,कई बार पुरुष  भी तांत्रिक के साथ वैसा खेलना शुरू कर देते।उन्हें ये महसूस होता कि उनके शरीर में कोई और शक्ति घुस आई है।बिल्कुल ऐसा ही आपके स्कूल में हुआ होगा।बच्चों को अमावस्या वाले दिन हलवा न बन ने का तो पता था।घर जाकर बताया होगा तो घर वालो ने देवता के नाराज होने की बात उन्हें बताई होगी।ये चर्चा सभी बच्चों में हुई होगी और जब एक दो बच्चियां बेहोश हुई तो मास हिस्टीरिया से बाकी बच्चियां भी बेहोश होती गई।तुम भी मास हिस्टीरिया के शिकार हो गए और डर के मारे बेहोश हो गए। "कह कर मैने चाय का प्याला खत्म किया।" मास हिस्टीरिया में लोग सामूहिक विचित्र बर्ताव (कलेक्टिव ऑब्सेशनल बिहेवियर ) करना शुरू कर देते।" मैने आगे कहा," ये दो तरह का होता।एक को हम " मास एंग्जाइटी हिस्टीरिया कहते जिसमे सांस फूलने,चक्कर आना,शरीर ऐंठने की शिकायत होना, सर दर्द और वहां तक की दिल का दौरा भी पढ़ सकता।तुम्हारी छात्राओं के साथ ये हुआ।दूसरी तरह के मास हिस्टीरिया को हम " मास मोटर हिस्टीरिया " कहते।इसमें पार्शियल पैरालिसिस,तुम्हारा मोटर सिस्टम काम करना रोक सकता या फिर सेंट्रल नर्व सिस्टम काम करना बंद कर सकता।तुम्हारे साथ यही हुआ।महिलाएं और बच्चियां चूंकि भारतीय परिवेश में अधिक मानसिक प्रताड़ना वाले माहोल में जीती इसीलिए "मास इंगजायती हिस्टीरिया" की आसानी से शिकार बन जाती।
हिस्टेरिआ' का सरल अर्थ है बेलगाम भावनाओं की अनुभूति| जब यह सामूहिक स्तर पर ऐसी कोई अनुभूति है, तब इसे 'मास्स हिस्टीरिया' का नाम दिआ जाता है| 'हिस्टेरिआ' शब्द अब मनोविज्ञान मे उपयोग नहीं किआ जाता क्योंकि इसके पीछे की थ्योरी - फ्रोइडियन साइकोएनालिसिस - आधुनिक मनोविज्ञान में प्रचलित नहीं है| मनोवैज्ञानिकों को एहसास हुआ है कि मास्स हिस्टीरिया की घटनाओं में जो शारीरिक लक्षण पाए जाते है - जैसे सिरदर्द, बेहोशी, सास लेने में दिक्कत, इत्यादि - उनके पीछे भावनाएं तो होती ही है, लेकिन साथ ही संज्ञानात्मक और सांस्कृतिक कारण भी होते है| इसलिए 'मास्स हिस्टेरिआ' की बजाय अब 'मास्स पसाइकोजेनिक इलनेस' अर्थात ऐसी शारीरिक बीमारी जो सामूहिक स्तर पर मानसिक कारणों से उत्पन्न होती है. 1962 में तंजानिया का मास लाफिंग याद है ना।स्कूल में एक बच्ची ने हंसना शुरू किया तो सारे बच्चों में हंसने का हिस्टीरिया फैल गाय और स्कूल बंद करना पड़ा ।जल्दी ही आस पास के शहरों के लोगों ने भी हंसना शुरू कर दिया।1967 में सिंगापुर के पुरुषों को लगा कि किसी खास प्रजाति के सुअर का मांस खा के उनका लिंग का आकार छोटा हो गया है।लाखों पुरुषों ने जब ये शिकायत की तो सिंगापुर सरकार को  काउंसलिंग सेंटर खोलने पड़े।"
मेरे तीसरे मित्र को बात जंच गई।" हम्म ,मास हिस्टीरिया का ही केस था ये।अप्पर शिमला,मंडी इंटीरियर,सिरमौर में ऐसे हादसे कॉमन हैं।"
चाय वाला छोटू भी थोड़ा सामान्य हुआ।
मेरे दूसरे मित्र ने भी चाय खत्म की ।बीड़ी निकाली,माचिस से सुलगाई और बोला," हो सकता है,लेकिन इस के बाद एक और घटना घटी।इसे सुन कर आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे।"
मैं कुर्सी से उठा और वाशरूम जाने का इशारा किया ।
मित्र ने धुएं का कश छोड़ा और बीड़ी वाले हाथ से जाने का इशारा कर कहा," जा आओ,अब जो बताऊंगा उस से यहीं न हो जाए..... "
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल

Thursday, 15 April 2021

भूत: 1

 विज्ञान प्रसार में लगे  ज्ञान विज्ञान समिति,तर्कशील सोसाइटी और अंधविश्वास मुक्त भारत जैसे बहुत सारे  संगठनों से मैं परोक्ष और अपरोक्ष रूप से जुड़ा हुआ हूं।ऐसे ही एक संगठन की राज्य स्तरीय कार्यशाला में भूतों पर एक सेशन था।

सेशन में मेरा अभिभाषण ऑप्टिकल इलुजन पर था।
पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन पर मैंने ऐसी बहुत सारी क्लिप्स इस्तेमाल की जो आंखो को धोखा देने के लिए काफी है। यहां तक कि अभिभाषण के दौरान मैंने डिप्रेस्ड आई इम्प्रैशन इस्तेमाल कर श्रोताओं को हॉल की दीवारों पर भूत भी दिखा डाले।
ये लेक्चर मैं अपनी नियमित विद्यालय कक्षाओं में भी इस्तेमाल करता हूं जिसे मुझसे पढ़े अधिकांश छात्रों ने ग्रहण किया है और कक्षा में ही भूत देखे हैं।
खैर ,वर्कशॉप की शाम को डिनर के बाद मैं अपने दो पुराने मित्रों के साथ डाइनिंग टेबल पर ही गप शप में व्यस्त था।दोनों मित्र शिक्षा विभाग में ही प्रवक्ता है एक मंडी जिला के दूर दराज क्षेत्र और दूसरे सिरमौर के शिलाई क्षेत्र में सेवारत है।
दोनों मित्रों ने दिन के व्याख्यान हेतु मुझे साधुवाद दिया और व्याख्यान को अद्वितीय बताया।
चर्चा में दोनों मित्रों ने आग्रह किया कि कोई स्व घटित भूतो वाली घटना सुनाओ और उसके पीछे का विज्ञान भी समझाओ।
मेरे पास सुनाने को कुछ खास था नहीं।उन दोनों के पास बेहद डरावनी कहानियां जिन्हे में अगले लेखों में सुनाऊंगा।खैर शुरू मैंने ही की।
" बात बचपन की है।मेरा गांव दिघो,सरकाघाट के चोर थला क्षेत्र में है।गांव पहाड़ी पर स्थित है ,जिसमे ढलान के साथ रास्ता नीचे खड की तरफ जाता है।रास्ते के दाएं बाएं ही सारे मकान बने है ।गांव ऊपर से नीचे तक कोई आधे किलोमीटर में फैला हुआ है और बिल्कुल तराई पर खड्ड है।खड्ड के ऊपर हमारे खेत है।खड्ड के साथ श्मशान घाट।श्मशान घाट के साथ खड्ड में पानी की बोगियां बनाई गई है जिसमें हम बहुत सारे लकड़ियों के डंडे पानी के अंदर डाल देते हैं और ऊपर से बड़े बड़े पत्थर से दबा देते हैं।दो तीन महीने बाद लकड़ियों का रेशा और अंदर की कठोर लकड़ी अलग हो जाती है।रेशे से हम लोग रस्सियां बनाते थे और लकड़ी,जिसे आम भाषा में भलेठी कहते हैं, जलाने में इस्तेमाल होती थी।इस से थोड़ी दूरी पर खड्ड बेहद डरावनी,अंधेरी और झाड़ियों से भरी हो जाती है ।आगे बच्चों के जाने पर प्रतिबन्ध था।
ऐसे ही एक बार लकड़ियों से रेशा निकलते वक्त दद्दू और मुझे प्यास लगी।दद्दू साहब ने बताया कि खड्ड में आगे जैसे पानी का एक चश्मा है जिसे नालू कहते हैं।दद्दू ने बताया कि पहले पानी नालु से ही पीने के लिए ले जाया जाता था।पानी की विकराल समस्या थी गरमियों में तो रात के वक्त भी हम पानी लाने यहां आते थे।खैर दद्दू साहब की बात सुन मैं उनके साथ नालू तक चल पड़ा।ऊपर से बेहद संकरी दिखने वाली खड्ड का नया रूप देख मैं चकित था।चट्टानों के नीचे खड्ड बेहद चौड़ी है।फुटबॉल स्टेडियम जितनी तो होगी। नालु का पानी सच में मीठा था,ठंडा भी।
पानी पी के आजू बाजू की जगह को निहारा।सामने एक बड़ी गुफा जिसका मुहाना बड़े बड़े पत्थरों से बन्द कर दिया गया था ,दिखी। मैं आश्चर्यचकित था।दद्दू साहब से पूछ लिया ये क्या है।दद्दू साहब ने होंठो पर उंगली रख चुप रहने का इशारा किया। पानी पी के चुपचाप उनके साथ वापिस आ गया।
खड्ड के दूसरे किनारे पर मोर्तन नाम का गांव है।उस गांव से मेरे विद्यालय चोरथला के पी टी आई साहब थे।जो उसी रास्ते से विद्यालय आया जाया करते थे।शाम को कई बार देर हो जाने पर वो हमारे घर से जलती हुई लकड़ियां ले जाते थे और उस खौफनाक रास्ते को पार कर अपने घर पहुंचते थे।टॉर्च उस जमाने में बड़ी कीमती चीज हुआ करती थी।चूंकि मेरे दद्दू के साथ उनकी अच्छी मित्रता थी तो वो घर बैठ भी लिया करते थे।बातों बातों में वो श्मशान घाट के आस पास जलते हुए सिर वाले भूतों के नाच ,श्मशान घाट पर भूतों की धाम और नाच वाले किस्से सुनाया करते थे।चूंकि वो ऐसा अक्सर देखते थे तो सुन कर मैं सहम जाता था।टॉयलेट जैसी चीजें गांव में नहीं होती थी ना ही कोई बल्ब बाहर लगे होते थे।रात को टॉयलेट जाना सबसे डरावना काम होता था क्यूंकि इस काम को अंजाम देने के लिए घर से बाहर निकल कर आंगन के आगे जाना होता था।और इसी वक्त पी टी आई साहब की कहानियां जीवंत रूप लेती थी।कितनी बार तो पजामा ही गीला हुआ ।
गुफा अभी भी मेरे दिमाग में थी।जैसे तैसे मैंने दद्दू साहब को गुफा के बारे में बताने के लिए मना लिया।
दद्दू ने बताया कि "कुछ समय पहले इस गुफा में चुड़ैल रहती थी।एक बार वो चुड़ैल सामने के गांव थाना के पुरुष " कालू रांझा" जो घर के बाहर सो रहा था को उठा के अपनी गुफा में ले गई।पहले बहुतेरे लोग घर से बाहर आंगन में ही सोया करते थे।
चुड़ैल देखने में बेहद खौफनाक थी।मैंने भी देखा है उसे।
सफेद कपड़े पहनती थी।उसके पांव पीछे की तरफ थे और वक्ष स्थल भी।वो चलती नहीं थी बस जमीन से अधा फुट ऊपर उड़ती थी।उसकी चमड़ी जली हुई थी और आंखे बिल्कुल लाल। दांत बड़े बड़े बाहर निकले हुए।अजीब सी आवाजें निकालती थी जैसे हामफ रही हो।
लेकिन गुफा के अंदर वो कोई भी रूप धर सकती थी।किसी बेहद सुंदर स्त्री का भी।" कालू रांझा" को उसने इसी रूप से भरमाया ।उसके साथ विवाह कर लिया।जब चुड़ैल शिकार करने गुफा से बाहर जाती तो वो कालू रांझा की आंखो मे कोई काजल डाल के जाती थी जिस से कालू रांझा को दिखना बन्द हो जाता था।
दिन गुजरते गए।चुड़ैल ने दो जुड़वा बच्चों को जन्म दिया।
इधर बाहर कालू रांझा की बीवी और बच्चों ने मान लिया था कि वो मर चुका है पर शव नहीं मिला।
एक दिन कालू रांझा ने चाल चली।उसने चुड़ैल को बोला कि जब तुम बाहर जाती हो,तो काजल मत लगाया करो।इतने सालो से तुम्हारे साथ हूं बाहर जा के भी क्या करूंगा। भाग के जायुंगा भी कहां।
चुड़ैल मान गई।कालू रांझा अब देख सकता था।चुड़ैल शिकार पर निकली यहां कालू रांझा ने चुड़ैल के बच्चों को छोड़ गुफा से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढा और गुफा से बाहर निकल आया।आके सीधा घर गया।परिवार हैरत मिश्रित खुशी से झूम उठा।सारे गांव और आस पास के गांव के लोग इकट्ठा कर आपबीती सुनाई।गांव वालो ने गांव का पहरा शुरू करा।बड़ी बड़ी आग की मशाल जला गांव का रात भर पहरा करते।
उधर चुड़ैल कालू रांझा को गुफा में ना पा आग बबूला हुई और उसे वापिस उठाने उसके गांव की तरफ लपकी परंतु गांव वालो को आग की मसलों के साथ देख जा नहीं पाई।
अब रोज रात को चुड़ैल श्मशान घाट के आजू बाजू की खड्ड में जोर जोर से चीखती और गाना गाती।गाना अभी भी याद है मुझे," कालुआ रांझा, कुथी तेरा मांजा, कूथी तेरे बच्चे, कुथि तेरी जनाना" (कलुआ रांझा,तेरी चारपाई कहां है,तेरे बच्चे कहां है और तेरी बीवी कहां है)
एक रात पहरे दार को सोता पा वो गांव में घुस गई और कालू रांझा को मार डाला।
सारे इलाके में सनसनी फ़ैल गई।इलाका वासियों ने इकठ्ठे हो बड़े बड़े पत्थरों से गुफा का मुंह बन्द कर दिया।तब से चुड़ैल और उसके बच्चे उस गुफा में बन्द है।बहुत से लोग जो आज भी गुफा के आस पास जाते हैं अंदर से अजीब आवाजें सुनाई देने की गवाही देते हैं।
दद्दू ने कहानी बन्द की।
मैंने भी विराम लिया।मेरे मित्र कुहनी को टेबल पर टिका और हथेली पर ठुद्दी रख बड़ी बड़ी आंखें कर एकटक मुझे देख रहे थे।
पूरा सन्नाटा।
पहले ने बीड़ी सुलगा पूछा," क्या ये गुफा अब भी है।"
"हां" मैंने जवाब दिया," पर बन्द है।उस तरफ जाने की हिम्मत कोई नहीं करता अब।"
बीड़ी का कश खींच,धुआं ऊपर की ओर उड़ा मित्र मुझे एक टक देख रहा था।बोला," अब बताओ,तुम्हारा विज्ञान क्या कहता"
मैंने अपनी थेओरी पेश की," दद्दू साहब कहते थे कि चुड़ैल सफेद कपड़े पहनती थी।किस दुकान से लेती होगी और कौन दर्जी होगा।अच्छा खाती क्या होगी।प्याज टमाटर तेल नमक कुछ तो खरीदती होगी।ले दे के चोरथला में तीन तो दुकानें थीं।अच्छा फिर चुड़ैल बच्चे कैसे पैदा कर सकती।
मेरा मानना है कि इस गुफा के साथ कुछ और भी जुड़ा है।मंडी राजा का अविजित किला कमलाह गढ़ यहां से ज्यादा दूर नहीं।कमलाह किले तक ले जाई जाने वाली रसद इसी रास्ते से जाती थी।गुफा का दूसरा किनारा कोई दो किलो मीटर दूर पहाड़ी के दूसरी तरफ बनाली गांव में है तो हो सकता है कि राजा की रसद इसी गुफा से आर पार की जाती हो।ये भी हो सकता है कि मंडी राजा खुद पहाड़ी की चढ़ाई से बचने के लिए इसी गुफा का इस्तेमाल आने जाने के लिए  करते हों।या है सकता वहां सैनिक छावनी हो।ये भी हो सकता कि कोई खजाना वहां छुपाया गया हो और फिर लोगों में डर फैलाने के लिए ये कहानी प्रचारित की गई हो।"
मेरे मित्र की आंखो की चौड़ी पुतलियां अब सिमट गई थी।
बोला," हां.. हो सकता है।आम तौर पर खजाने छुपाने के लिए ही ऐसी कहानियां फैलाई जाती है। डिस्कवरी चैनल वालों को बोलते हैं ,गुफा का राज जानने को।वहीं है जो इस रहस्य को सुलझा सकते।"
मैंने विजयी मुस्कान दागी।मेरी थेओरी काम कर गई थी।
अब दूसरे मित्र ने अपनी कहानी सुनाने के लिए अपनी कमीज़ के बाजू को ऊपर किया।
क्रमश:
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धर्मशाला की फेसबुक वाल।

पुरुष:

सावधान : अगर आप “ हनी ट्रैप” ,”एक्स्टॉरशन मनी” ,और “ मोडेस्टी ऑफ वुमन “ के नाम चल रहे गोरख धंधों ,सरीखे संजीदा ,सामयिक और पुरुष जाती के लिए घातक होते जा रहे न्यायलयों पर कुछ सुनना और पढ़ना पसंद नहीं करते तो ये लेख आपके लिए नहीं है।लेकिन आप अगर इस नए खतरे, जो आपके परिवार,सामाजिक प्रतिष्ठा और आपकी कमाई पर भयंकर चोट कर सकता है,के बारे में जानना चाहते हैं तो फिर ये लेख पढ़िए,कॉपी पेस्ट करिए और इसे शेयर करिए।मैंने लेख में वही शब्द इस्तेमाल करे हैं जो मुझे बताए गए इसलिए आप शब्दों से विचलित हो सकते हैं। घटना के वास्तविक पात्रों को मैंने बदल दिया है, ताकि उनकी पहचान सार्वजनिक ना हो। 
 अमेजॉन फायर टी वी पर नई जोड़ी गई फिल्मों को निहार रहा था। अक्षय खन्ना अभिनीत फिल्म “ सेक्शन 375” पर नजर पड़ी।कभी सुना नहीं था इस फिल्म के बारे । शाम को अकेला था और कोई नई फिल्म देखने को मिल नहीं रही थी इसलिए उसे ही देखने बैठ गया।फिल्म का पूरा कंटेंट जबरदस्त है।आपको देखनी चाहिए।स्त्री वादी होती जा रही न्यायिक व्यवस्था पर भयंकर चोट करती फिल्म है। सहमति से बने शारीरिक सम्बन्धों को किस तरह से बलात्कार बना अदालत मैं घसीटा जाता और फिर आउट रेज ऑफ मॉडेस्टी ऑफ वूमेन के नाम पर सारे सबूतों को दर किनार कर पुरुष को ही दोषी करार दिया जाता क्यूंकि स्त्री का सिर्फ कहना कि उसका रेप हुआ है पुरुष को दोषी करार देने में काफी है । फिल्म देख के मैं विचलित हुआ।
नवोदय विद्यालय पण्डोह में पड़ी कुछ अच्छी आदतों में से एक आदत मेरी ये भी है कि विचलित होने पर आइने के सामने खड़ा हो कर मैं अपनी छवि की आंखो में आंखे डाल कर अपने को तोलता हूं ।अपने आप से बात करना मुझे हमेशा नई ऊर्जा देता है। मैं आइने के सामने जा खड़ा हुआ। अपने प्रतिबिंब की आंखो में आंखे डाल मुझे महसूस हुआ कि ऐसा तो किसी भी पुरुष के साथ हो सकता।मेरे साथ भी।विचलित हुआ।इसी विचलन से मुझे ये लेख लिखने को प्रेरित किया। 
 पालमपुर में अपने आशियाने में शाम का भोजन बनाने की सोच रहा था।मुझे कूकिंग का जबरदस्त शौक है।बड़े दिनों बाद बिरयानी बनाने का मूड था।
अचानक मोबाइल बजा।स्क्रीन पर राजू का नाम देख अच्छा लगा।चार पांच महीने से राजू से बात नहीं हुई थी।वैसे राजू वो हमारे लिए है।दुनिया के लिए वो डॉक्टर राज कुमार हैं।गणित के धांसू छात्रों और शिक्षकों में से एक।विश्वविद्यालय में अपने बैच के गणित एम एस सी के गोल्ड मेडलिस्ट, तीसरे सेमेस्टर में ही नेट परीक्षा निकालने और दो साल से भी कम समय में पी इच डी पूरा करने के कारनामे उनके नाम दर्ज हैं।कॉलेज में गणित के प्रोफेसर है और जो सम्मान वो अपनी अद्भुत अध्यापन शेली और जबरदस्त मेहनत से हासिल कर पाए वो बिरलों को ही हासिल हो पाता है। 
 हलकी मुस्कुराहट के साथ मैंने फोन उठाया,” राजू भाई की जय हो।“ दूसरी तरफ से कोई आवाज नहीं आई।मैंने फिर कहा,” राजू भाई की दो बार जय हो।“ इस बार हलकी घरघराहट के साथ आवाज सुनाई दी” हल्लो सचिन” राजू अपनी दमदार आवाज के लिए जाना जाता है।विश्व विद्यालय के खांटी वाम छात्र संगठन की सबसे दमदार और भारी आवाज।जब वो क्रांति चौक पर भाषण दिया करता था तो दुकानदार तक उनके संबोधन को सुनने बाहर निकल आते थे।मैंने वाइस चांसलर साहब को भी राजू का भाषण सुनते हुए देखा है।
 फोन पर इस क़दर कमजोर आवाज की कतई आशा नहीं थी।मैंने अपने परिचित हास्य अंदाज में पूछ लिया,” भाई ,क्या हुआ।भाभी के हाथ का खाना नी मिल रहा आजकल तो कमजोरी आ गई।अब वामपंथी बने रहना तो सरकार क्यूं आपको आपके घर के आस पास रखेगी ,पटक दिया ना घर से दो सौ किलो मीटर दूर।कोई ना।खाना पूरा खाना।देसी घी भी ।ट्रांसफर से हमारे इलाके बदलते हैं,इरादे थोड़ी। “ दूसरी तरफ से कोई आवाज नहीं आई।आम तौर पर मेरी गप्पों पर राजू भयंकर अट्टहास करता है।वास्तव में विश्व विद्यालय में मेरी और राजू की बेहद निकटता का कारण ही मेरी व्यंगात्मक शेली थी। मुझे चिंता हुई। 
 मैंने फिर पूछा,” राजू, सब ठीक है ना भाई।“ अब भरराई हुई आवाज सुनाई दी,” नहीं सचिन, सब ठीक नहीं है।कुछ गलत हो गया है।इससे पहले कि कुछ घातक हो जाए मैं उन सब लोगों को फोन कर के माफी मांग रहा हूं जो मेरे लिए जीवन में महत्वपूर्ण है।मुझे माफ़ कर देना मेरे भाई,मेरी वजह से आप सब को शायद नीचा देखना पड़े।“ आवाज में जबरदस्त टेंशन और बेहद पीड़ा साफ दिख रही थी। 
 मेरी आंखों कि पुतलियां चौड़ी हो गई।कम से कम राजू से मुझे इस बात की आशा नहीं थी।हम में से कइयों के लिए वो प्रेरणा था। मैं उसके कितने छात्रों और छात्राओं को जानता हूं जो सार्वजनिक तौर पर इस बात को स्वीकार करते हैं कि प्रोफेसर साहब ने हमारी जिंदगी,हमारी सोच समझ को बदल डाला। 
मैंने फिर पूछा,” हुआ क्या?” ।कोई आवाज नहीं आई।
मैंने फिर पूछा, “ कम ऑन यार, वी आर फ्रेंड्स ना। बिंदास बताओ।“ दूसरी तरफ से सांसों का वेग बता रहा था कि राजू भयंकर पीड़ा में हैं।कुछ देर बाद आवाज आई,” बताने लायक नहीं है सचिन।बस ऐसा समझ ले के मेरा परिवार,मेरा सोशल रेपुटेशन,मेरा कैरियर सब कुछ स्टेक पर है।“ अब मुझे चिंता हुई।“ कम ऑन यार।खुल के बताओ।अभी तुम्हारे दोस्त जिंदा हैं।ऐसी तैसी साले किसी कि “
 राजू बेहद पीड़ा में था। भर्राई आवाज में बोला,” आई एम् ट्रेप्ड यार ।“ 
मैं चिंतित था,” खुल के बताओ राजू ।जो भी है।देखते हैं ,क्या कर सकते।तुम परेशान हो।सोच नहीं पाओगे।इसलिए मुझे बताओ।मै सोचता कि क्या कर सकते।“ 
राजू बेहद डरा हुआ था।बेहद विचलित आवाज में बोला,” आई एम् सेक्सुअली ट्राप्ड यार। वी कैन टॉक ऑन दिस इश्यू ना।“ 
मैंने कहा,” श्योर यार।अब बूढ़े हो गए हम और समझदार भी।बिंदास बताओ। पुरुष को सेक्सुअली ट्रैप करना बेहद आसान है। हमें प्रकृति ने ऐसा बनाया है ।“ अपने बिज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ मैंने राजू को सहज करने की आखिरी कोशिश करी ,” बायोलॉजिकल लाइफ का विज्ञानीक अर्थ होता है,की हम अपने जैसे कितने पैदा कर सकते।मरी हुई चीजें प्रजनन नहीं करेंगी।और लाइफ को आगे बढ़ाने के लिए प्रकृति ने चीजें सेक्सुअल बनाई है।पुरुष और स्त्री बनाई।सेक्सुअली पुरुष को प्रकृति ने एक्टिव बनाया क्यूंकि हमें स्पर्म देने हैं।तू भी ले तू भी ले।स्त्री पैसिव है क्यूंकि उसी को जीव धारण करना है और उसे पैदा करना है।इसलिए वो सेलेक्टिव है।वूमेन नीड रीज़न फॉर सेक्स।वो कुछ भी हो सकता।इमोशंस, लगाव, मजबूरी या पैसा। व्हाइल वूमेन नीड ए रीज़न , मेन ऑनली नीड स्पेस।मेरा तो ये भी मानना है कि मैरेज इज द प्राइस मेन पे फॉर सेक्स एंड सेक्स इज द प्राइस वूमेन पे फॉर मैरिज।“ 
 राजू अब थोड़ा सहज हुआ,” मुझे ट्रैप किया गया यार।कोई पांच महीने पहले मुझे फेसबुक पर एक अनजान महिला की फ्रेंड रिक्वेस्ट आई।मेरे क्षेत्र का नाम लिखा था प्रोफ़ाइल में तो मैंने अक्सेप्ट कर ली।कुछ दिनों बाद उसने फेसबुक मैसेंजर पर गुड मॉर्निंग मेसेज छोड़ा।दिन के समय में मैंने भी रिप्लाइ कर दिया।इसके बाद उसने चैट करना शुरू कर दिया।मुझे बताया कि आपकी ट्रांसफर से यहां के कॉलेज के छात्र बहुत दुखी हैं।कहते कि सर के जाने के बाद मैथ्स का कुछ समझ नी आता।कॉलेज जाने का दिल नहीं करता।मुझे लगा कि शायद महिला मेरी जानकर है या किसी छात्र की रिश्तेदार इसलिए मैंने भी रिप्लाइ कर दिए कि ट्रांसफर से बंधे होते कर्मचारी,फ्लान फलां। चैट चलती रही।कुछ दिनों बाद उसने मुझे बताया कि आप मेरे रिश्तेदार हो।आपकी दादी मेरी मम्मी की मौसी हैं। मुझे थोड़ा अपनत्व महसूस हुआ।महिला ने बातों बातों में मुझसे मेरा वॉट्सएप नंबर भी ले लिया।मुझे कुछ खास महसूस नहीं हुआ क्यूंकि मैं हज़ारों लोगों से फेसबुक और व्हाट्स ऐप पर इंटरैक्ट करताहूं । एक दिन महिला का फोन आया। हाय हल्लो ।फिर अंतराल पर लगातार फोन आने लगे। ऐसे ही एक कॉल के दौरान महिला ने मुझे बताया कि उसके पति आर्मी में बड़े ऑफिसर हैं।उन्होंने काफी पैसा कमाया है।शिमला , चंडिगड़ और दिल्ली में उनके अपने फ्लैट है।मुझे अच्छा लगा।इतनी अमीर महिला आपको कॉल कर रही आपको अपने में ही अच्छा लगता।मैंने भी शायद एक दो बार हाल चाल पूछने को कॉल कर दी होगी।महिला ने मुझे अपने दो अन्य नंबर भी दिए।उसमे से एक उसकी बेटी का था।उसने बताया कि ये नंबर सिर्फ बेटी के पिता के पास है ।अगर मेरा फोन बन्द मिले तो इस नंबर पे कॉल कर लेना। एक दिन उसका कॉल आया। चिंतित थी बोली,” की मेरे पति ने मुझे 6 लाख रुपया दिया था।उसमे से तीन लाख रुपया मैंने अपने किसी मित्र को दे दिया है जो उसे अब वापिस नहीं कर रहा। मित्र शिमला जिला के किसी हिस्से में बिजनेस करता है इसलिए उस तक पहुंचना भी आसान नहीं है। मुझे पैसों की सख्त किल्लत है।मुझे 25 हजार रूपए चाहिए जो में आपको अगले हफ़्ते लौटा दूंगी।“ 
"मुझे लगा कि मुझे सहायता करनी चाहिए।परंतु महीने के आखिरी दिन चल रहे थे। बिट कॉइन का नया नया भूत चडा था तो मैंने अपनी कुल बैंक बेलेंस कि पूंजी बिट कॉइन खरीदने में लगा दी थी।जी पी एफ तो मैं निकालने से रहा। खैर मैं कॉलेज गया।फीस क्लर्क से पूछा कि चेस्ट में कितना पैसा है।दुर्भाग्य से वहां भी पैसा नहीं था।मैंने महिला को कॉल करा की अभी तो कुछ जुगाड नहीं कर पाया परंतु पहली तारीख पे मिलने पर देखता हूं कि आपकी क्या सहायता कर पाता। महिला ने अब वीडियो कॉल करना शुरू कर दिए।चूंकि अपने गृह क्षेत्र से कोई 300 किलो मीटर दूर हूं।घर में बूढ़े मा बाप ।बेटी एमिटी यूनिवर्सिटी दिल्ली में पढ़ रही, बेटा श्रीराम कॉलेज चेन्नई से बी टेक कर रहा तो श्रीमती जी घर पे ही रह रही मा पिताजी की देख भाल करने को।अकेला रहता हूं यहां तो कोई महिला वीडियो कॉल कर दे तो उसमे समस्या तो कोई नहीं।“ ये बता मित्र ने विराम लिया।
राजू की आवाज में भय का जबरदस्त मिश्रण था। विराम के बाद राजू ने आगे बताया,” आई एम् एन आर्डिनरी मेन सचिन। हू नीड एवरीथिंग वॅट इज नीडेड बाय एन आर्डिनरी मेन। आई हैव माय बायोलॉजिकल नीड्स। बिफोर स्लीप आई युज टू मस्टर्बेट एंड टू फेंटे साइज़ माय सेल्फ आई यूज टू वाच पोर्न मूवीज।“ ये कह कर राजू चुप हो गया।
 मैंने राजू को सहज करते हुए कहा,” इसमें कोई समस्या नहीं।लगभग हर पुरुष ऐसा करता है । हां बात करने में हिचकिचाते जरूर है।हमारी परवरिश ऐसे माहौल में हुई है।भगवान शब्द का उच्चारण करते हैं कभी शब्दकोश में “भग” और “ वान” शब्दो के अर्थ देखे नहीं। योनि की आकृति पर रखे शिव लिंग पर पानी, दूध और तीन पतियों वाले भेल पत्ते चड़ाते जरूर हैं ,उनका विज्ञानिक पहलू कभी समझा नहीं। डरो नहीं।राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपनी जीवनी “ माय एक्सपेरिमेंट विद ट्रुथ” में लिखा है कि जब उनके पिता मरना आसन पर थे तो वो बगल के कमरे में दरवाजा बन्द कर मैथून कर रहे थे।तो जब राष्ट्र पिता इस मुद्दे पर इमानदार हो सकते तो आपको कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। “ 
राजू अब सहज था, बोला,” महिला ने ऐसे ही समय रात के दस बजे मुझे वीडियो कॉल करा।वो बिना शर्ट के थी।बोली कि कुछ भी बात मत करना ।मेरी मा साथ सो रही तो आवाज से उठ जाएगी।लिखो की क्या करूं मैं। वासना जब आपके शरीर पर हावी होती तो दिमाग काम करना बन्द के देता।मैंने भी लिखना शुरू कर दिया।शो मी दिस,शो मी देट।शायद कुछ और एरोटिक बातें भी मैंने लिखी हों।उसने वो सब किया को मैंने कहा।वो भी जो मैंने नहीं कहा। हां कुछ स्क्रीन शॉट मैंने ले लिए ताकि फिर कभी अपने को फेंटे साइज़ करने के काम आ सकें। उसके बाद मैं निढाल हो के सो गया।शनिवार को मुझे घर आना था। मैं सारी वॉट्सएप और मैसेंजर चैट डिलीट कर के घर जाता हूं इसलिए सब कुछ डिलीट कर दिया। एक तारीख को बेटी का फोन आया।उसे किसी समर स्कूल में जाना था तो पचास हजार रुपए उसे भेजने पड़े। महिला को कॉल करा की ये समस्या खड़ी हो गई इसलिए चाह कर भी उसकी सहायता नहीं कर पा रहा। चार पांच दिन बाद मै कॉलेज में अपना लेक्चर ख़तम कर क्लास से बाहर निकला तो मुझे मेरे गृह क्षेत्र के किसी नंबर से फोन आया कि आपके खिलाफ किसी महिला ने फेसबुक पर अश्लील बात करने की शिकायत की है,आप थाने आइए और इस समस्या को सुलझाइए।पहले मुझे मजाक लगा।फिर भी मैंने अपने कजिन को फोन के सम्बन्ध में बताया और पता करने को कहा।कजिन ने पता करके बताया कि वाकई शिकायत है।महिला का नाम भी बताया। वही महिला थी। मैंने फोन घुमाया।महिला ने मुझे बताया कि उसके पति ने वो चैट पढ़ ली थी और उसी के दवाब में मैंने ये शिकायत करी की आगे से ऐसी कोई चैट ना हो।आप इस तारीख को पुलिस थाने आ जाना।मुझे ग्लानि महसूस हुई।मुझे लगा कि मेरी वजह से पता नहीं बेचारी को क्या सेहना पड़ रहा।मैंने भी तय किया कि महिला के पति से माफी मांग लूंगा और आगे से कोई चैट ना करने का भरोसा दिला के वापिस आ जाऊंगा। नीयत दिवस को मैं थाने पहुंच गया। माफी मांग कर बात ख़तम कर आगे बढ़ने की बात दिमाग में थी।परंतु वहां कुछ और ही था।महिला के साथ ना उसका पति था ना कोई और रिश्तेदार।दो तीन लोग थे जिनमें से एक कानून का जानकार होने का दावा कर रहा था। मैंने उन सब से माफी मांगी और आइंदा से ऐसी कोई चैट ना करने का आश्वासन भी दिया। मैं हैरान रह गया जब महिला ने अपनी शिकायत वापिस लेने के लिए दो लाख रुपए लेने की मांग की। पुलिस के अधिकारी ने मुझे समझौता करने की सलाह दी।समझौता ना होने की स्थिति में एफ आई आर होने की बात कही और प्रिंट मीडिया में खबर छपने कि बात कही।" 
'मेरी समझ में नहीं आया कि समझौता क्या करना है।किस बात का करना है। दो वयस्क लोग आपस में इंटरैक्ट कर रहे थे वो भी सहमति से।इसमें कानूनी रूप से गलत क्या है? मैं वहां से वापिस चला आया।मुझे पता चला कि ये महिला इस तरह की सेंकड़ों घटनाओं को अंजाम दे चुकी हैं।शहर के कई नामी नाम इसके शिकार हो चुके हैं। हां मुझे शर्मिंदगी जरूर महसूस हुई की ये मैं क्या कर गया था। अखबारों में खबर लगने के बाद की स्थिति से में डर गया।परिवार, कैरीयर,सोशल स्टेट्स सब कुछ खतरे मे है। टेंशन इतनी है कि कई दिनों से सो भी नहीं पा रहा हूं।किसी को कुछ बता भी नहीं पा रहा हूं।सोचा तुम शायद समझोगे,इसलिए तुझे फोन करा….” ये कहते कहते राजू फोन पर रो पड़ा।
 मैं स्तब्ध था।मुझे राजू पर गुस्सा आया।उसे अपराधी समझ लिया।मैने गुस्से से कहा,” मैं तुझे थोड़ी देर में फोन करता” और फोन काट दिया।राजू ऐसा कर रहा।कल को अखबार में ख़बर लगेगी।हम सब भी सवालों के घेरे में आएंगे।मैंने फेसबुक पर राजू को अनफ्रेंड करने की सोची। वॉट्सएप पर ब्लॉक करने की भी।यहां तक कि उसके नंबर डिलीट करने की भी। 
बिरयानी बनाने का समय निकल रहा था। मैं खड़ा हुआ।आइने के सामने।अपनी आंखो में घूरा।आंखे बन्द की।अब मेरे दिमाग में बहुत कुछ घूमने ल गा। मैं सहज हुआ। राजू कहीं भी गलत नहीं था।वो कमजोर होती पुरुष की न्यायिक स्थिति का शिकार होने जा रहा था।मेरे सामने अपने विभाग के बहुत सारे किस्से घूम रहे थे।छात्राओं के साथ आपत्ति जनक चैट के नाम पर सस्पेंड हुए शिक्षक,छात्राओं को अश्लील मैसेज भेजने वाले शिक्षकों की खबरें,महिला अध्यापकों द्वारा छेड़खानी के आरोप लगने वाले पुरुष प्रधानाचार्यों की सेवा समाप्ति कि खबरें,पोस्को और भी पता नहीं क्या क्या।फिर मुझे महसूस हुआ कि क्या इन सभी मामलों में पुरुष ही दोषी थे।क्या वो इतने वासना लोलूप थे कि बिना किसी वजह के किसी को भी तथाकथित अश्लील मैसेज भेज रहे थे,अथवा महिलाओं को सरेआम निमंत्रण दे रहे थे।क्या वो सब पागल अथवा मानसिक विकृति के शिकार हैं कि चौबीस घंटे सिर्फ वासना पूर्ति में लगे रहते हैं। या फिर कहानी का दूसरा पहलू कभी रिपोर्ट ही नहीं हुआ।अखबारों में , डिपार्टमेंटल इंक्वायरी में सिर्फ महिला अथवा छात्रा का ही पक्ष सुना गया।पुरुष का पक्ष हो भी तो वो बोले क्या?कुछ बोले तो परिवार का दोषी,पत्नी से बेवफ़ाई का दोषी और ना बोले तो कैरियर बरबाद,समाजिक प्रतिष्ठा समाप्त।वो अपनी स्थिति पर कुछ बोले भी तो क्या? कोई सुनेगा नहीं।सुनेगा भी तो अपराधी उसे ही माना जाएगा।छात्राओं के साथ किसी भी तरह की चैट के लिए सिर्फ शिक्षक उत्तरदाई।क्यूंकि बच्चे तो अबोध होते। 18 साल तक उनको सब माफ़।
दिल्ली के वीभत्स निर्भया कांड में जिस शख्स ने निर्भया को सबसे ज्यादा निर्दयता से घाव दिए थे, उसकी योनि में हाथ डाल ओवरी को खींच शरीर से बाहर निकाल सड़क पर फेंक दिया था वो 18 वर्ष से कम था।नतीजा तीन माह के लिए बाल सुधार गृह की सैर और फिर आजाद।स्कूल में रेड करते वक़्त कितने छात्रों और छात्राओं के फोन जब्त करते हम।लगभग हर फोन पोर्न से भरे हुए।क्या छात्र , क्या छात्राएं।परन्तु शिक्षक की मर्यादा में बंधे खामोशी से सब नजर अंदाज करते।इसलिए सिर्फ स्त्रीलिंग होने से हर कोई अबोध हो ये आवश्यक नहीं।
 मैं पहली बार इस मुद्दे पर संजीदा हुआ।रोज की अखबारों की कर्तनो पर हम हंसी मजाक कर के निकल लेते हैं।पुरुष शिक्षकों का मजाक बना निकल लेते हैं।दो तीन दिन बाद भूल जाते हैं क्यूंकि कोई नया किस्सा अखबारों में होता। मैं पहली बार किसी पुरुष जिसके साथ ऐसा हुआ था उसके दिमाग से गुजर रहा था था।उसके अपराध बोध,उसकी छटपटाहट ,उसकी अपने आप से घृणा,उसके डर के साथ आत्मसात हो रहाथा। मैंने आंखे खोली। अपने बेहद घनिष्ठ मित्र जो पेशे से वकील हैं से इस मुद्दे पर बात की।वकील महोदय ने दो ऑप्शन दिए। पहला की कुछ ले दे के इस मुद्दे को सेटल करो क्यूंकि एक बात तो सपष्ट थी कि ये सारा प्लॉट सिर्फ पैसे ऐंठने के लिए घडा गया था।महिला क्यूंकि इस तरह की लूट की अभ्यस्त है तो समझाने बुझाने की गुंजाइश है नहीं।कई बार साधारण दिखने वाली चीजें बड़े गिरोहों की शक्लों में होती जिनमें कुछ वकील,पुलिस के लोग,शरारती तत्व और अपराधिक किस्म के लोग शामिल हो सकते हैं। 
दूसरा लड़ने का।जो तुम्हारे साथ हुआ किसी और के साथ ना हो इसके लिए लडना पड़ेगा।सारे कॉल डीटेल्स कि कॉपी लो मोबाइल कंपनी से।सारे एस एम् एस रिकॉर्ड। वटसअप और मैसेंजर के चैट जो क्लाउड स्टोरेज पर स्टोर होते या फोन की मेमोरी में तब तक रहते जब तक डिलीट करने के बावजूद उस मेमोरी स्लॉट पर कोई नई फाइल राइट ना होने तक सेफ रहते।फिर कोर्ट में देखते।परंतु तब तक राजू को शर्मिंदगी सेहन करनी पड़ेगी। 
मैंने राजू को फोन मिलाया।राजू को हिम्मत दी।मैंने कहा, “ कोई बात नहीं।गलती हो गई ना अनजाने में ही सही,ट्रैप हो गए।कोई बात नहीं।जो होना था हो चुका।अब सबसे पहले अपनी बीवी को बताओ की हुआ क्या है।रही तुम्हारे सोशल स्टेट्स की बात तो तुम डॉक्टर राज कुमार हो।जो बनाया है उसके लिए 25 साल की अध्यापक की मेहनत है और छात्र जीवन की रात दिन की मेहनत।वो छोटे मोटे आरोपों से धूमिल नहीं होने वाली। हां विरोधियों को थोड़ी देर का सकून मिल सकता है।वो इंपोर्टेंट है भी नहीं। होने दो एफ आई आर।कल देखता हूं।और क्या कर सकते। कम से कम ऐसी महिलाओं को पैसा तो कतई नहीं देंगे।खून पसीने की कमाई है यार।शिक्षक की कमाई।ईमानदारी की कमाई।“ 
राजू को शायद इसी हिम्मत कि आवश्यकता थी।उसने वाकई भाभी जी को बात बताई। अपने माता पिता को भी।शायद अपने सभी रिश्तेदारों और करीबी मित्रों को भी।मैंने भी अपने विश्व विद्यालय ,कॉलेज और नवोदय विद्यालय के एलुमनी छात्रों से संपर्क साधा ।पता चला कि राजू के पुलिस क्षेत्र के डी एस पी राजू के विश्व विद्यालय के पुराने मित्र हैं।राजू ने उनसे बात की।फिर पता चला कि राजू के गृह जिला के एस पी भी उनके किसी करीबी मित्र के जीजा है।करीबी मित्र राजू को ले एस पी साहब से मिला।बात शायद डी आई जी लेवल तक पहुंची। क्यूंकि महिला कुख्यात थी इसलिए समस्त पुलिस तंत्र कम से कम आधिकारिक स्तर पर इस बात पर सहमत था की महिला पर घात लगाई जाए और उसको ब्लैक मेल करने और एकटोर्षण मनी लेने के अपराध पर गिरफ्तार किया जाए।राजू से लिखित शिकायत एस पी साहब ने ली ।
अब अगला प्लान बना।ये तय हुआ कि किसी ऐसे मित्र को जो महिला का जानकार हो से महिला से मोल भाव करने को कहा जाए।फिर महिला को पैसा लेने हेतु किसी चिन्हित स्थान पर बुलाया जाए और नगदी पैसे पर केमिकल लगा महिला को दिया जाए, और महिला को रंगे हाथ गिरफ्तार किया जाए।तब तक राजू सारे कॉल डिटेल,वीडियो चैट के स्क्रीनशॉट,सारी फेसबुक और वॉट्सएप चैट की हार्ड कॉपी हासिल कर चुका था।
 मेरी दिल्ली में दो हफ़्ते की प्लाज्मा फिजिक्स पर राष्ट्रीय वर्कशॉप थी।रवाना होने से पहले मैंने राजू को फोन किया।राजू काफी पॉजिटिव था।उसने मुझे शुक्रिया किया की तुमने हिम्मत ना बढ़ाई होती तो मैं इतना एफर्ट ना करता।मैंने भी शुभकामनाएं दी और दिल्ली निकल गया।
दो सप्ताह की वर्कशॉप में सिर झुकाने का वक्त प्लाज्मा फिजिक्स के वैज्ञानिकों ने नहीं दिया।ना ही मुझे कोई फोन कहीं से आया। 
16 दिन बाद वापिस पालमपुर आया।स्कूल ज्वाइन करा। 
छुट्टियों के बाद नई कक्षा ,नए बच्चे।
 शाम को ऐसे ही राजू को फोन करा जानने के लिए की क्या हुआ?
 राजू काफी प्रसन्न था ।बोला,” थैंक्स यार।सब ठीक हो गया।सेटल कर लिया सब कुछ।“ मैंने पूछा कि वो महिला जेल में है? राजू ने लंबी आह भरी ।बोला “ तेरे दिल्ली जाने के बाद घटना क्रम बड़ी तेजी से बदला।दो दिन बाद ही मुझे फिर पुलिस थाने बुला लिया गया। सारा प्लॉट बना हुआ था।बस महिलाको पैसे लेने किसी चिन्हित स्थान पर बुलाना था और धर दबोचना था।इसी बीच इस शिकायत के बारे में लोगों को पता चल गया,मेरे विरोधियों को भी।फिर खेल कुछ और ही शुरू हो गया।मेरे विरोधियों को ये मौका जबरदस्त जान पड़ा।उन्होंने महिलाको ज्यादा धन उगाहने ,और एफ आई आर रजिस्टर करवा मेरा नाम अखबार में छपवा मुझे बदनाम करने की घिनौनी साजिश रची।किसी स्थानीय नेता से पुलिस स्टेशन फोन भी करवाए और किसी महिला नेता ने महिला आयोग तक शिकायत ले जाने और शहर में जलूस निकालने तक की धमकी पुलिस को दी।मेरे करीबी राजनेतिक नेता को भी जब ये पता चला तो उन्होंने इसे सेटल करने की सलाह दी।लडना बुरी बात नहीं लेकिन जो कुछ तुम्हे ,तुम्हारे परिवार को और तुम्हारे मित्रों को झेलना पड़ेगा वो तुम्हारी कल्पना से परे है।सारी उम्र के लिए जो दाग तुम पर लगेगा वो धुलेगा नहीं।अखबारों में छा जाओगे। एक बेहद करीबी मित्र जो पेशे से हाई कोर्ट में वकील हैं ने भी सेटल करने की सलाह दी।कोर्ट में बहस जिस तरह से होती वो भी बताया। न्यायालय के महिलाओं के पक्ष होने कि बात भी समझाई।वकील साहब ने आई टी एक्ट भी समझाया और आई टी एक्ट कि धारा 16 भी समझाई।फेसबुक पर बिना महि ला की रजामंदी के बात करना भी गुनाह है ,तुमने तो एरोटिक चैट की है।“मोड़ेस्टी ऑफ वूमेन” के नाम पर तुम्हे जज अंदर भी ठोक सकता। अब सारी चीजें फिर से हाथ से निकलती हुई दिखीं।मैंने आंखे बन्द कर के अपनी बेटी की,बेटे की शक्ल देखी की जब ये सारा किस्सा अखबारों में आएगा वो अपने दोस्तों को क्या जवाब देंगे।किस से नजर मिला पाएंगे।मेरी बीवी ,मेरे बूढ़े मा बाप किसको क्या जवाब देंगे।मेरी एक बेवकूफी कि वजह से किसी को सिर उठा के देखने की हिम्मत नहीं होगी।ना मित्र बचेंगे ना रिश्तेदार।'
" मैंने तय किया कि इस मामले को सेटल किया जाए।मैंने अपने बेहद करीबी मित्र जो महिला का अच्छा परिचित है ,को सेटल करने का अनुरोध किया।मेरे मित्र ने चीजें सेटल कर दी।मुझे ना पुलिस स्टेशन जाना पड़ा ना कुछ और करना पड़ा।मेरे मित्र ने कैसे क्या किया अभी तक मुझे नहीं बताया है।सिर्फ ये बताया कि एक महीने बाद बताऊंगा की क्या क्या हुआ।तब तक तुम आराम करो और पचास हज़ार रुपए मेरे अकाउंट में ट्रांसफर कर दो। चल मरने दे।इमानदार शिक्षक का पैसा है।हजम भी होना चाहिए। पर चलो पिंड छूटा। थैंक्स यार ।तूने सपोर्ट नी किया होता तो शायद डिप्रेशन में या तो फैंट हो जाता या आत्म हत्या कर लेता। “ 
मैंने आगे बात नहीं की।फोन काट दिया।फोन बिस्तर पर रख आइने के सामने जा खड़ा हुआ।आंखे बन्द की।पूरे किस्से को ध्यान से देखा।राजू को जबरदस्त तरीके से हनी ट्रैप किया गया था।महिला काफी लंबे समय से राजू का पीछा कर रही थी।और जब राजू अपने परिवार से दूर था,अकेला था तो वो शिकार पे उत्तर आई और कर भी गई।मेरी आंखे तेजी से पलको में घूम रही थी। एक एक कर के किस्से मेरी आंखो के आगे प्रकाशित हो रहे थे।मेरे एक रसायन विज्ञान के प्रवक्ता मित्र को किसी ने इस लिए फसा दिया कि 15 साल पहले हुई पी टी ए की अपॉइंटमेंट के समय मित्र ने उस शख्स की सहायता नहीं की थी।प्रवक्ता के विरुद्ध किसी छात्रा से झूठी शिकायत करवाई गई।ये तो भला हुआ की पेरेंट्स,स्टाफ और अन्य छात्र प्रवक्ता मित्र की सपोर्ट में खड़े हो गए वरना मित्र पोस्को एक्ट के तहत अंदर होता।इसी तरह मेरे एक मित्र जो भौतिक विज्ञान के प्रवक्ता है को उन्हीं के स्टाफ के किसी सदस्य ने जलन वश किसी लड़की को बहला कर झूठी शिकायत करवा दी।मेरे बेहद करीबी मित्र जो प्रधानाचार्य है उनके ही स्कूल के डी पी ने गाड़ी में भांग छुपा कर फसाने की कोशिश करी।बाद में पता चला कि कुछ छात्राओं को भी डी पी साहब ने तैयार किया था कि वो प्रधानाचार्य पर योन शोषण का आरोप लगाएं। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस तक पर कीचड़ उछला। 
ऐसे हज़ारों किस्से मेरी आंखो के सामने से गुजर रहे थे।सब में पुरुष दोषी।अथवा पुरुष को दोषी करार देने कि पुरजोर कोशिश।इस खेल में पत्रकार,बुद्धिजीवी ,आम जन सब शामिल हो जाते।बिना किसी जांच के आरोपित पुरुष अपराधी।बाद में छूट भी जाए,बा इज्जत बरी हो जाए तो कोई अख़बार नहीं लिखेगा।परिवार और पुरुष किस किस को सफाई देगा।
मुझे लगा इन मुद्दों पर समाज ,बुद्धिजीवी और न्याय पालिका को नए सिरे से सोचने की आवश्यकता है।जरूरत से ज्यादा महिला पक्षीय होती न्याय व्यवस्था और उसकी आड में चल रहे ऐसे गोरख धंधों पर पूरी न्यायिक व्यवस्था में एक नई बहस शुरू होनी चाहिए। . 
मैं अभी भी आइने के सामने खड़ा था। सिर झुकाए। फिर मैंने आंखे खोली ।सिर झुका के अपनी ही छवि को भृकुटी ताने निहारा।फिर मेरे दोनों हाथ मेरी ही छवि की तरफ उठे और मुह से नफरत भरी ,गहरी उदासी पूर्ण आवाज निकली, ” …….पुरुष ….“
 सचिन ठाकुर, 
प्रवक्ता : भौतिक शास्त्र, 
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वॉल।