Sunday, 15 December 2024

 विज्ञान लेख 27:

50 पर:

आहा ,तो आप 50 के हो गए।

कोई न।

मेरी घनिष्ठ मित्र सविता आठ दस साल के लिए एक ही उम्र पर रहती है।35 से 45 के होने के बाजूद अपनी उम्र 35 ही बताती रही।अब 50 की होने को है पर पिछले पांच सालों से उम्र 44 ही बता रही🤪🤪।अच्छा है।मुझे उसकी यही जीवटता पसंद है।

तो चलिए आज बात करते हैं उन नए शोधों की, जो 50 साल के होने पर आपकी बेहतरीन सेहत के प्लान पर असर डाल सकते हैं।

1. मैग्नीशियम : मैग्नीशियम आपके शरीर की 300 से अधिक बायोकेमिकल रिएक्शन को प्रभावित करता है।रक्त चाप,ग्लूकोज रेगुलेशन और प्रोटीन सिंथेसिस के लिए मैग्नीशियम का महत्वपूर्ण योगदान होता है।50 के बाद आपके शरीर की मैग्नीशियम को ग्रहण करने की क्षमता घट जाती है। क्रैंप्स,थकावट,भूलने की बीमारी ,अनिद्रा और इंग्जेटी जैसे लक्षण मैग्नीशियम की कमी का सीधा इशारा है।मैग्नीशियम थ्रियोनेट दिमाग के लिए ,मैग्नीशियम सिट्रेट इंटेस्टाइन के लिए ,मैग्नीशियम मलेट ऊर्जा के लिए बेहतरीन सप्लीमेंट हो सकते है। स्पींच ,एवोकाडो आलमंड और डार्क चोकोलेट बेहतरीन भोजन हो सकते हैं।मैग्नीशियम स्ट्रोक के खतरे को भी कम करता है।हालांकि अगर आप किडनी की किसी व्याधि से ग्रसित हैं तो बिना डॉक्टर की सलाह के सप्लीमेंट लेने से परहेज रखिए।

2.विटामिन डी: विटामिन डी हड्डियों के लिए ही नहीं रोग प्रतिरोधक क्षमता,मानसिक स्वास्थ्य और स्वस्थ दिल के लिए भी आवश्यक है।अब इसे प्रकृति ने आपको मुफ्त का दिया है।सूर्य की रोशनी से ही काम चल जाएगा।परंतु आपने जो घर बनाया है ना ,कॉलोनी बनाने के चक्कर में झोंपड़पटी बना डाली,घरों से सटे घर बना डाले इसी चक्कर में शोध के अनुसार हर तीसरा शहरी भारतीय विटामिन डी की कमी से जूझ रहा है।

घर खुली जगह बनाना था,आजू बाजू के मकान में इतनी दूरी जरूर रहनी चाहिए की हवा और धूप बाधित न हो।परंतु दुखद ,भू माफिया के बढ़ते लालच और आपकी बेबसी ने ऐसा होने न दिया।

अब हर तीसरा भारतीय जोड़ों का दर्द ,मेमोरी लॉस से परेशान है।तो फिर कोशिश करिए की कम से कम एक घंटा धूप में गुजरे ।फिश और अंडे भी सहायता कर सकते हैं।

3. विटामिन बी 12 : सुभा उठने का दिल नहीं कर रहा,याद रखने में परेशानी हो रही,थकावट है , किसी काम में दिल नहीं लग रहा और टांगे भारी लग रही तो समझ जाओ की शरीर विटामिन बी 12 की कमी से जूझ रहा।50 बाद पेट की अम्ल पैदा करने की क्षमता जो विटामिन बी 12 को ग्रहण करने के लिए आवश्यक है, घट जाती है।अगर आप मधुमेह के लिए दवा ले रहे या रिफ्लक्स मेडिकेशन ले रहे तो हालात और भी बुरे हो सकते हैं।तो फिर अपने खाने में बदलाव लाना ही साधारण उपाय है।लाल मांस,फिश, अंडे और दूध आपकी सहायता कर सकते है।हालांकि जिनका पाचन तंत्र सही काम नहीं कर रहा उनको इस विटामिन के इंजेक्शन लेना ही सही उपाय होगा।

हालांकि ये लेख विभिन्न विज्ञान पत्रिकाओं में छपे शोधों पर आधारित है फिर भी डॉक्टर की सलाह और सहायता आवश्यक है।

शोध बता रहे हैं की 50 पार होने पर जिम जाना जोखिम पैदा कर सकता है,खास कर यदि आप हार्ड एक्सरसाइज कर रहे हैं तो।सबसे बेहतर है की आप 30 मिनट की धीमी और लगातार दौड़ पर शिफ्ट हो जाएं।अगर ये भी नहीं तो सुभा सुभा एक घंटे की वॉक उसके बाद योग या हल्का व्यायाम सबसे बेहतरीन एक्सरसाइज है।

चीनी को तुरंत बंद करें।नमक भी धीमा।देसी घी से परहेज करिए और खाना ऑलिव ऑयल या खुद के सरसों के तेल में बनाइए।

खाना खाइए,प्रोडक्ट कतई नहीं।मतलब आलू खाइए,आलू के चिप्स नहीं।

दिमागी तौर पर मैच्योर होना बेहद आवश्यक है।अब आपको अपनी फालतू की इगो को बिलकुल किनारे करना होगा।ऐसे लोग,ऐसी जगहें ,ऐसी चर्चाएं और अपनी ऐसी करनीयों से तुरंत अपने आपको मुक्त करना होगा जो आपकी मानसिक शांति में खलल डालते हैं।

अगर आप किसी उच्च पद पर आसीन हैं तो फिर अपने कनिष्ठ लोगों को आदर की दृष्टि से देखना शुरू कर दीजिए ,उन्हें सही दिशा में प्रोत्साहित करना,उनकी सहायता करना सीख जाइए।अन्यथा आपकी रिटायरमेंट के बाद आपको सम्मान देना तो दूर ,वो आप से बदसुलूकी तक कर सकते हैं।मैने अपने ही एक साथी शिक्षक को शिक्षा विभाग के निर्देशक स्तर के अधिकारी के मुंह पर उनकी रिटायरमेंट के बाद थूकने का दृश्य देखा है।सोचिए वो अध्यापक किस कदर अधिकारी से नफरत लिए होगा।

अब इस उम्र में आपकी सामाजिक प्रतिष्ठा का नाश हो ये न तो आपके लिए अच्छा है ,ना आपके परिवार के लिए।

कुछ बेहतरीन मित्र ,जो अब तक आपका परिवार बन चुके होंगे उनके साथ अपने रिश्ते और भी प्रगाढ़ कीजिए।मित्र परिवारों के साथ कुछ महीनों के अंतराल पर दूर भ्रमण करने की आदत डालिए और महीने में कम से कम एक बार चाय पर या डिनर पर जरूर मिलिए।

घर पर हो चाहे बाहर बेहतरीन कपड़े पहनिए।राउंड नेक टी शर्ट और जींस को त्यागने का यही सही वक्त है।

मिडिल एज क्राइसेस,माइल्ड डिप्रेशन से आप इसी उम्र में दो चार होते हैं,जिसका आपको पता भी नहीं चलता।इसलिए कोई न कोई ऐसा शख्स जरूर ढूंढिए जिसके साथ आप कुछ भी शेयर कर सकें,कुछ भी सलाह ले सकें। उसका कंधा हो आपके पास सिर रख के रोने को और उसका वजूद आपके हाथ थामे रखने के काबिल हो बाकी बची उम्र के लिए। भले ही वो परिवार का हो या परिवार से बाहर का।

अब समझ जाइए की शारीरिक तौर पर आप जी नहीं रहे बल्कि रोज सरवाइव कर रहे हो।इसलिए खुल के जीना शुरू करिए।अपने पैसे को अपने ऊपर खर्च करना सीखिए, खूब सारी यात्राए कीजिए ,मरने से पहले देख लीजिए जितनी दुनिया देख सकते हो।

आडंबरों,पूर्वाग्रहों ,मान्यताओं,सामाजिक कुरुतियों से अपने आपको बाहर निकालिए,समझ जाइए के आपके पास यही जीवन है जिसका बड़ा हिस्सा आप जी चुके।ये भी समझ जाइए के ना ही तो कोई आत्मा है ना ही कोई परमात्मा की आप फिर से दुनिया में आओगे और अदानी अंबानी के घर पैदा होयोगे।जो है ,बस अब यही है।

और सुभा जब उठो ना, तो बड़ी अंगड़ाई लेना ,पूरे शरीर को खोलने वाली अंगड़ाई।फिर शीशे के सामने जा कर अपने आप को निहार के कहना," आह, मैं तो अभी जिंदा हूं....और रापचिक हूं.."

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता: भौतिक शास्त्र

राजकीय उच्च शिक्षा विभाग,

हिमचल सरकार


Saturday, 23 November 2024

स्टाफ रूम


 स्टाफ रूम :

पिछले साल मैं दिल्ली गया था। डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के तत्वाधान स्टेट रिसोर्स सेंटर और ज्ञान विज्ञान समिति द्वारा  ट्राइबल क्षेत्रों के छात्रों में विज्ञान विषय के प्रति रुचि उत्पन्न करने हेतु  विज्ञान मेलों का आयोजन करने हेतु राष्ट्रीय स्तर की वर्कशॉप थी।

दिल्ली के कुछ सरकारी विद्यालयों में जाने का मौका मिला।

शिक्षक होने के नाते मैं इस बात को पूरी जिम्मेदारी से कह सकता हूं कि ये विद्यालय उत्कृष्ट हैं।शानदार क्लासरूम,बेहतरीन मैदान,जबरदस्त इंफ्रास्ट्रक्चर।।काबिल अध्यापक और बेहतरीन प्रधानाचार्य जिन्हें विशेष प्रशिक्षण हेतु सिंगापुर और अन्य देशों में भेजा गया था। विद्यालय में इन बिल्ट जिम और यहां तक कि कई विद्यालयों में स्विमिंग पूल तक उपलब्ध हैं।

प्रधानाचार्य कक्ष शायद मंत्रालयों में मंत्रियों के कक्षों से भी ज्यादा सुंदर हैं।टॉयलेट्स चकाचक और सफाई व्यवस्था लाजवाब।

एक दो विद्यालयों के स्टाफ रूम भी देखे।सारे एक ही पैटर्न पर बनाए गए हैं।हर शिक्षक को एक छोटा चेंबर दिया गया है जिन्हे एक बड़े लंबे टेबल का पार्टीशन कर के बनाया गया है। चैंबर में चार्जिंग प्वाइंट दिया गया है जिसमें आप मोबाइल ,लैपटॉप चार्ज कर सकते हैं और अपने इलेक्ट्रिक टिफिन में खाना गर्म कर सकते हैं।चैंबर में एक रिवॉल्विंग चेयर है, कॉपियां किताबे रखने की जगह है और नीचे को ड्रॉअर हैं जिनमें आप अपना पर्स या अन्य सामान रख सकते हैं। चार गुना चार के ये चैंबर आपको लेक्चर तैयार करने,बच्चों की कॉपियां चेक करने, लैपटॉप पर पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन तैयार करने में सहायता करते हैं साथ ही आपको निजता भी उपलब्ध करवाते हैं। सारा स्टाफ पुरुष हो या स्त्री एक ही कमरे में अपने अपने चैंबर में बैठते हैं।स्टाफ रूम में पानी के लिए आर ओ फिल्टर और कॉफ़ी बनाने की मशीन तक उपलब्ध करवाई गई है।एक पियोन भी स्टाफ रूम के पास तैनात किया गया है।

हमारे भ्रमण के दौरान जितने भी शिक्षक और शिक्षिकाएं स्टाफ रूम में थे सब अपने अपने चैंबर में अपने काम में व्यस्त थे।कोई पीपीटी बना रहा था,कोई कॉपी चेक कर रहा था,कोई असाइनमेंट चेक कर रहा था तो कोई पढ़ाई कर रहा था।छात्रों का स्टाफ रूम में जाना लगभग निषेध है।मजेदार बात ये है कि कई घंटे वहां गुजरने के बाद स्टाफ रूम में कोई शिक्षक या शिक्षिका आपस में गप्पे मारते नजर नहीं आए।स्टाफ रूम कैमरे कि सख्त निगरानी में हैं।स्टाफ रूम के साथ जुड़े हुए पुरुष और महिला शिक्षकों के लिए अलग अलग टॉयलेट्स बने हुए हैं।

जिन शिक्षकों से हमने बात की वो स्टाफ रूम से बाहर आ के ही बात कर पाए।इतनी खामोशी तो हमारे यहां लाइब्रेरी में नहीं होती।

शायद इसीलिए दिल्ली के सरकारी स्कूल इतना बेहतरीन कार्य कर पा रहे हैं।चार पांच साल पहले न्यूज चैनल ऑन करने पर एक घंटे के न्यूज बुलेटिन में दस मिनट दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की बेतहाशा बढ़ती फीस के विरूद्ध पैरंट्स की हड़ताल की खबरे होती थी।अब वो नामी गिरामी प्राइवेट स्कूल बन्द होने के कगार पर पहुंच गए हैं।दिल्ली सरकार ,विशेष कर तत्कालीन शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया को साधुवाद।

अब आते हैं अपने सरकारी स्कूलों के स्टाफ रूम पर।  एस एस ए के आंकड़े बताते हैं कि 40% विद्यालयों में स्टाफ रूम बनाने लायक कमरे ही नहीं है।जिन 60 % स्कूलों में स्टाफ रूम उपलब्ध हैं उनमें से 47 % स्कूलों में एक छोटे कमरे को स्टाफ रूम बनाया गया है जिसमें बमुश्किल 10 से 15 कुर्सियां और एक दो टेबल रखे गए हैं।कमरों के हालात पशुशाला से ज्यादा अच्छे नहीं हैं।कहीं सीलन है ,जलिया दरवाजे नहीं है ,पेंट का तो छोड़ दो।शिक्षक जिसकी कक्षा नहीं है वो आके थोड़ी देर कुर्सी पर बैठ कर आराम करता है।पंखे अथवा हीटर की कोई सुविधा नहीं है।पीने के पानी हेतु प्रधानाचार्य के कमरे के बाहर दो बाल्टियां है जिसे पीने के लिए सेवादार की दया आवश्यक है।

बाकी बचे 13 ‰ बड़े स्कूल तो यहां स्टाफ रूम बनाने लायक बड़े कमरे हैं।कमरों में शिक्षकों हेतु लॉकर उपलब्ध हैं जिनमें शिक्षक अपनी किताबें या कोई छोटा मोटा सामान रख सकता है।कमरे में एक बड़ा टेबल लगाया गया है जिसके दोनों तरफ कुर्सियां लगाई गई हैं ताकि शिक्षक अपना काम कर सके।

परंतु निजता की कोई व्यवस्था नहीं है।इसी कारण ये कमरे काम करने,अध्ययन करने लायक कतई नहीं रहते।पढ़ने,लेक्चर त्यार करने ,पीपीटी बनाने या कॉपी चेक करने लायक माहौल इन कमरों में बनता ही नहीं है।फिर भी यदि पुरुष शिक्षक और महिला शिक्षक एक ही कमरे में हैं तो हलकी गप शप के साथ माहौल हलका रहता है जिसमें शिक्षक सरकारों की आलोचना के साथ अपने बच्चों अथवा परिवारों के बारे में गप्पे मार लेते हैं।प्रधानाचार्य की आलोचना ,डिपार्टमेंट को गालियां देना और बच्चों के व्यवहार पर टिप्पणियां इन्हीं स्टाफ रूम की खासियत होती है।

कुछ बड़े विद्यालयों में पुरुष और महिला शिक्षकों हेतु अलग अलग कमरों का भी जुगाड हो जाता।कमरे की व्यवस्था आम तौर पर वहीं होती,एक बड़ा टेबल और उसके दोनों तरफ कुर्सियां।

पुरुषों का स्टाफ रूम आम तौर पर राजनेतिक बहसबाजी का मुख्य अड्डा होता है।गलती से अगर कुछ शिक्षक दक्षिण पंथी हुए और कुछ वामपंथी हुए तब तो हालात भारतीय संसद से ज्यादा घातक होते हैं।अपने अपने नेता के गुणगान और दूसरे के नेता का चीरहरण प्रमुख वार्तालाप होता है।लेकिन अमूनन राजनेतिक कटाक्ष के बावजूद सभी पुरुष शिक्षक एक साथ खाना खाना पसंद करते हैं। पुराने समय में बीड़ी पीना,सिगरेट फूंकना इन स्टाफ रूम की गुप्त योजना होती थी और कई बार छुट्टी के बाद दारू की बोतलें और चिकन भी यहां पर मिल जाता था।शिक्षक चेस भी खेल लेते हैं।

हालांकि अब समय तेजी से बदल रहा परन्तु जब स्मार्ट फोन नए नए आए थे तब एक दूसरे के फोन से हर तरह की वीडियो   क्लिप्स लेना ,  इलाके की महिलाओं के बारे में रिपोर्ट कार्ड तैयार करना,शादी में कितनी दारू की बोतल गटकी और उसके बाद के कारनामों की शेखिया इन कमरों की शान होती थी।पुरुष शिक्षक आम तौर पर गॉसिप एन्जॉय नहीं करते।

महिला स्टाफ रूम दुनिया की सबसे ख़तरनाक जगह होते हैं।महिलाओं का गॉसिप एन्जॉय करना उनकी बेसिक नेचर है।महिला स्टाफ रूम में आम तौर पर प्रिंसिपल और पुरुष शिक्षकों को लेकर कमाल कि परिचर्चा होती है।पुरुष शिक्षक कम बात करे तो अकडू और ऐटिट्यूड वाला, ज्यादा  बात करे तो  चिपकू या फुकरा।अच्छे कपडे पहने तो ठरकी,  बुरे कपड़े पहने तो बेकार बीवी वाला।कुछ महा फ्रस्टेटेड महिला शिक्षक जो अपने पतिं की ओछी हरकतों से घर में परेशान होती हैं वो अपने सहयोगी शिक्षकों को चरित्र प्रमाण पत्र बांटती रहती हैं ।वो उनको अपने पति के सम कक्ष खड़ा करने के प्रयास में भौंडी कहानियां घड़ेंगी और फिर अपनी फ्रस्ट्रेशन को शांत करने को सभी पुरूषों के एक जैसा होने का सर्टिफिकेट जारी करेंगी।कुछ महिला शिक्षक अपनी ही साथी महिला शिक्षक के चरित्र पर भी सर्टिफिकेट इश्यू करती मिल जाएंगी।मजेदार बात ये है कि एक महिला शिक्षक जिसने अभी किसी को चरित्र प्रमाण पत्र जारी किया था,उसके कमरे से जाने के बाद बाकी बची हुई महिला शिक्षक उसके चरित्र पर पानी भर भर कर चर्चा करती है।हालांकि कुछ बुद्धिमान शीक्षिकाएं गॉसिप से कोसो दूर रहती हैं और बाकी शिक्षकियाओ को भी समझती रहती की ऐसे टेबल पर चर्चा में हिस्सा मत लिया करो जहां से उठने के बाद आप पर ही चर्चा आरम्भ हो जाए।महिला स्टाफ रूम में खाने पीने का पूरा जुगाड होता।चाय,बिस्किट,समोसे,मूंगफली, रेवड़ी ,गच्चकऔर कई बार गलगल खट्टे जैसे विशुद्ध उत्पाद इभी यहां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं।

अपनी सास की बुराई, अपने बच्चों की तारीफ और दूसरे के बच्चों कि बुराई,कपड़ों की ओलाइन शॉपिंग,गहनों की चर्चा,गुपचुप तरीके से मेंहदी लगवाना अन्य पसंदीदा मुद्दे हैं।

मेरे पिछले एक स्कूल में महिला अध्यापकों की आपस में खटपट थी।

खटपट का नतीजा ये हुआ कि कुछ महिला अध्यापकों ने एक कमरे पर कब्जा कर लिया ,दूसरे ग्रुप ने वोकेशनल लैब में डेरा बना लिया तो कुछ ने लाइब्रेरी में।

कुछ महिला अध्यापक जो किसी भी ग्रुप में फिट नहीं हुई उन्होंने मुझ से आई सी टी लैब की चाबी ले ली ये कह कर की एडमिशन विथड्रावल रजिस्टर,रिजल्ट बनाने का काम करना है।धीरे धीरे उन्होंने आई सी टी लैब को खाने पीने ,अपना सामान रखने और आराम करने का कमरा बना लिया।अब ये तो गनीमत है कि स्कूल के पास आई सी टी लैब के अलावा मॉडर्न कंप्यूटर लैब थी जहां आई टी शिक्षक अपने प्रैक्टिकल्स करवा रहे थे ,वरना हो ली थी आई टी एजुकेशन की पढ़ाई।

बेचारे पुराने कंप्यूटर पहले धूल फांक रहे थे ,अब दाल , भात, सब्जी और फलों के बीज/छिलके खा रहे हैं।

ईमानदारी से बता रहा हूं ,मैने महिला शिक्षकों को कुर्सी के पीछे लड़ते हुए भी देखा है कि ये कुर्सी मेरी है ,तुम इस पर कैसे बैठ गई।


समस्या ये है कि हमारे सरकारी स्कूल स्टाफ रूम की वास्तविक अवधारणा से कोसो दूर हैं।शिक्षा विभाग में अधिकारी स्तर से ले कर प्रधानाचार्य स्तर तक इन मूलभूत आवश्यकताओं के बारे में सोचने की न किसी को फुर्सत है न आवश्यकता।

 इन स्टाफ रूमज में ना तो चिंतन है,ना अध्य्ययन है,ना बच्चों की ग्रोथ को लेकर कोई परिचर्चा है।ना तो टीचिंग लरनिंग मटेरियल को बनाने की कोई अभिलाष है,ना ही कक्षा में अपने लेक्चर को उत्साह वर्धक बनाने का कोई टोटका।सबसे बड़ी समस्या निजता की है जिसके कारण शिक्षक अपने विषय पर ध्यान ही नहीं दे पाता।

यही कारण है कि अधिकांश शिक्षक अध्ययन से कोसों दूर हैं।हिंदी अखबार पर सरसरी नजर मारने के आलावा वो और कुछ नहीं पड़ते।

किसी भी शिक्षक से पूछिएगा कि  आपने अपने पिछले  एक साल कि तनख्वाह से  कितना पैसा किताबें खरीदने के लिए खर्च किया। मैं शर्त लगाता हूं ,नब्बे प्रतिशत शिक्षक शून्य जवाब देंगे।

स्टाफ रूम किसी भी विद्यालय का सबसे महत्वपूर्ण कक्ष है।सरकार को बेहतरीन सुविधाओं से परिपूर्ण ,कम से कम दिल्ली के सरकारी विद्यालयों के स्टाफ रूम के बराबर ,स्टाफ रूम बनाने हेतु पहल करनी चाहिए।हर प्रधानाचार्य को भी कोशिश करनी चाहिए कि वो अपने शिक्षकों में निजता उत्पन्न करते हुए ऐसे स्टाफ रूम के निर्माण हेतु अपने फंड मैनेज करें।हर अध्यापक के पास कम से एक छोटा चैंबर हो जहां वो अध्ययन कर सके,कॉपीज चेक कर सके,टीचर लर्निंग मटेरियल, पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन बना सके और विद्यालय के अन्य कार्य कर सके।अध्यापक को निजता मिले और वो वाहियात चर्चाओं से बचा रहे।

 विद्यालयों में बच्चे अध्ययन करने भेजे जाते हैं।शिक्षक अगर खुद ज्ञान से भरा होगा,बेहतरीन मानसिक अवस्था में होगा तो निसंदेह बेहतरीन शिक्षा का रस कक्षाओं में बरसाएगा।सरकारी शिक्षण संस्थानों में गुण वत्ता को कई गुना बढ़ाएगा।

अन्यथा ,वो गॉसिप और बहस में बिजी है।गॉसिप और बहस मानसिक अवसाद को जनम देते हैं।मानसिक अवसाद से भरा शिक्षक कक्षा में जा कर पढ़ा ही नहीं सकता।ये अवसाद घर तक पहुंचे तो घर का माहौल भी खराब होता।

हर शिक्षक को याद रखना चाहिए कि किसी को भी आपके चरित्र प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है।आप दूसरों पर उंगली तभी उठाते हैं जब उन तक पहुंचने कि औकात आपकी नहीं होती।इसलिए अपने आप को कमजोर और कुंठित प्रदर्शित मत करो।

एक अच्छे,निजता से भरे स्टाफ रूम का सीधा संबंध शिक्षक को बेहतरीन वातावरण प्रदान करने से है।

कसम अपने अध्यापन की ,अगर शिक्षक को अच्छा वातावरण मिले तो एक निकम्मा अध्यापक अच्छे शिक्षक में परिवर्तित होता,एक अच्छा शिक्षक उत्कृष्ट अध्यापक में।और अच्छा वातावरण न मिले तो उत्कृष्ट अध्यापक अच्छे में और अच्छा शिक्षक निकम्मे शिक्षक में परिवर्तित हो जाता।


दुनिया में तीन ही तरह के दिमाग होते हैं।

पहले  बेहतर दिमाग जो आईडिया डिस्कस करते हैं,जैसे अलबर्ट आइंस्टीन ,स्टीफन हॉकिंग या कार्ल मार्क्स।

दूसरे ,मध्यम दर्जे के दिमाग जो इवेंट डिस्कस करते हैं जैसे सरकार की इकोनोमिक पॉलिसी या फौरन पॉलिसी।

तीसरे तरह के दिमाग को तुच्छ दिमाग कहते हैं।ये वो दिमाग हैं जो लोगों को डिस्कस करते हैं,जैसे उस महिला का चरित्र खराब है या उस पुरुष का टांका वहां भीडा हुआ है।

शिक्षक कम से कम पहले दो दरजों के दिमाग वाला होना चाहिए।

उम्मीद है एक बेहतरीन स्टाफ रूम और उसका उत्कृष्ट वातावरण आपको इन दोनों दरजो तक पहुंचाने में सक्षम होगा।

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,

राजकीय उच्च शिक्षा विभाग,

हिमाचल सरकार


Saturday, 26 October 2024

ऐसे ही

 ऐसे ही:

दिवाली है।रौशनी का त्योहार।

बताते रहते हम कक्षा में बच्चों को कि हरी दिवाली मनाओ।पटाखे न जलाओ।वायु प्रदूषण ,ध्वनि प्रदूषण और रोशनी प्रदूषण होगा।मरीज ,बच्चों के स्वस्थ और जंगली जानवरों के लिए घातक होगा।

पर पटाखे ना फोड़े तो मजा ही नहीं आता।झूठ नहीं बोलूंगा मैं खुद ऐसा हूं।जब तक तीन चार हजार रुपए के पटाखे न फोड़े दिवाली का मजा ही नहीं आता।

अब जब देश में हर चीज पर बहस होने लगी है, नित नए ज्ञान रोज परोसे जा रहे हैं,नया इतिहास व्हाट्सएप और फेसबुक यूनिवर्सिटी पर रचा जा रहा है तो उत्कंठा हुई के पता लगाया जाए की पटाखे दिवाली का हिस्सा कब बने।

इतिहास खंगालने पर पता चला की भारतीय इतिहास में चाणक्य रचित अर्थ शास्त्र वो पहली किताब है जिसमे किसी चूर्ण का विवरण है जो तेजी से जलता था,तेज लपटे पैदा कर सकता था और किसी बंद डब्बे में जलाया जाए तो फट सकता था।अर्थ शास्त्र में बंगाल की भूमि पर बारिश के बाद फैले किसी लवण का वर्णन है जिसमे बुरादा डाल कर इसे जल्दी से जलाया जा सकता है।

किसी भी भारतीय धर्म ग्रंथ में पटाखों का उल्लेख नहीं है। समस्त धर्म ग्रंथ जिनमे दिवाली का उल्लेख है सिर्फ घी के दिए जला खूब सारी रोशनी करने की ही गवाही देते हैं।

शोर करके,पटाखे फोड़ कर दुर्भाग्य की देवी को भगाने का चलन चीन में था ।रिग वेद में तो दुर्भाग्य की देवी निरीति को दिकपाल का दर्जा हासिल है।

हालांकि मिथको की माने तो निसंदेह प्राचीन भारतीय सभ्यता तेज रोशनी के साथ फटने वाले यंत्रों के साथ भिग्य थी।

विज्ञान में बारूद का जिक्र 1270 में सीरिया के रसायनशास्त्री हसन अल राममह ने अपनी किताब में किया।वो पहले विज्ञानिक थे जिन्होंने बारूद को बेहद गर्म पानी से शुद्ध कर के उस से विस्फोटक बनाने में सफलता हासिल की थी।

भारत में विस्फोटक का पहला इस्तेमाल 1526 में हुआ जब मुगल बाबर के नेतृत्व में दिल्ली पर हमला कर रहे थे।दिल्ली सल्तनत अब्राहिम लोधी के नेतृत्व में बेहद ताकतवर थी।परंतु मुगलों द्वारा भारत की धरती पर पहली बार इस्तेमाल हो रहे विस्फोटकों और तोपखाने से लोहा नहीं ले पाई।

इसके बाद भारत में पटाखे और आतिशबाजी का दौर शुरू हुआ।

हालांकि कुछ इतिहासकार भारत में आतिशबाजी को लाने का श्रेय मुगलों को नहीं देते। दारा शिकोह की उनके जिंदा रहते बनाई गई तस्वीर में लोगों को आतिशबाजी करते देखा जा सकता है।अर्थात आतिशबाजी शायद मुगलों से कुछ समय पहले भारत पहुंच चुकी थी क्योंकि मध्य एशिया और भारत का व्यापार मुगलों से बहुत पहले स्थापित हो चुका था।

इतिहास हमे बताता है की आतिशबाजी को भारत में फिरोजशाह ने लोकप्रिय किया जो हर त्योहार चाहे ईद हो या दिवाली या दशहरा जबरदस्त आतिशबाजी करवाया करते थे।

गुनपाउडर बहुत बाद में भारत आया।इसका इस्तेमाल शिकार करने और युद्ध में हाथियों को डराने के लिया जाता था।

1667 में औरंगजेब ने पटाखों पर पूरा प्रतिबंध लगा दिया था ।इसके बाद अंग्रेजों ने एक्सप्लोसिव एक्ट लगा कर पटाखों में प्रयोग किए जाने वाले कच्चे माल पर पाबंदी लगा दी।

आधुनिक भारत में 1940 में जब अंग्रेजों ने एक्सप्लोसिव एक्ट को वापिस लिया तब अय्या नागर और शन्मुगा नागर नाम के दो भाइयों ने पटाखों की पहली फैक्टरी शिवकाशी में लगाई।

यही दोनो भाई दिवाली से पटाखों को जोड़ने में कामयाब रहे और दिवाली का अभिप्राय 80 सालो में पटाखे फोड़ने से हो गया।

शिवकाशी में 1990 तक लगभग 190 पटाका फैक्ट्रियां थी लेकिन धीरे धीरे चीन के पटाखों ने शिवकाशी के उद्योग पर भार कम किया।

ये भी याद रखना चाहिए की भारत में चाइल्ड लेबर का सबसे बुरा उदाहरण यही पटाखा फैक्ट्रियां है।

खैर।

इतिहास यही है। व्हट्सप यूनिवर्सिटी के गोबर से अपना दिमाग मत भरिए।रोशनी के इस त्योहार का आनंद लीजिए।

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता भौतिक शास्त्र 

राजकीय उच्च शिक्षा विभाग,हिमाचल सरकार



Sunday, 20 October 2024

खौफ का अध्यापक

 


खौफ का अध्यापक :

कभी कभार कड़वाहट अच्छी होती है ।आज कुछ कड़वा हो जाए।

मुझे नहीं पता , आप कितनी एकेडमिक चर्चाओं में हिस्सा लेते है , बहसों में सर खपाते है या फिर घटनाओं पर मंथन करते हैं या नहीं।

मेरी लेखनी से आपके मतलब की चीज निकले तो आप वाह वाह करते हैं ,कुछ विरूद्ध निकले तो हाय हाय मच जाती है।

अच्छा है।लेख वहीं सार्थक जो झंझोड़ के रख दे।

आज बात खौफ की।

शिक्षक के खौफ की।

एक पूरा साल अपनी आंखो के आगे ले आओ।।पूरा शैक्षणिक वर्ष ।

आप शिक्षक है या नहीं अपने हिसाब से ,अपनी चेतना अनुसार एक साल गढ़ लीजिए।

जनवरी फरवरी निकल लिया।शिक्षक नए ट्रांसफर एक्ट के खौफ में था।अच्छा होगा या बुरा होगा , भविष्य के गर्भ में है,, पर शिक्षक खौफ में है। कैसी जोन मिलेगी, कैसी छोड़नी पड़ेगी ,खौफ की चर्चाएं गरम हैं।तीस किलोमीटर कैसे नापना ,कौन उठा देगा, दूसरी विधानसभा वाले अपने क्षेत्र में घुसने देंगे या नहीं,ये खौफ पसरा था।

अख़बार शिक्षक को नपाने पे तुले है,खौफ में घी का काम कर रहे हैं।कितना नपायोगे भाई।एक शिक्षक की कमर का मांस निकाल कर वज्र बना लिया था,अब और नपाओगे तो धनुष बनने से तो रहा।

अब मार्च में नया खौफ तैयार होगा।

किस सेन्टर में कैमरे लगे हैं ,रिजल्ट कम होने का खौफ पसरेगा, इंक्रीमेंट जाने का खौफ पासरेगा।किस की सेन्टर सुपरिटेंडेंट की ड्यूटी लगी है, नकल होने देगा या नहीं ,ये खौफ पसरेगा। 

फ्लाईंग वाले कितने घंटे बैठेंगे ,कितने केस बनाएंगे,खौफ पैदा करेगा।

फिर किस सेन्टर में नकलची पकड़े गए, किस किस सेन्टर सुपरिटेंडेंट को बर्खास्त किया गया ,ये खौफ होगा।

अप्रैल माह में किस शिक्षक ने किस पेपर को गलत चेक करा, अपने दिन के कोटे के पूरे पेपर चेक करे के नहीं ये खौफ पसरेगा ।

मई ,जून में कहां रिजल्ट कम आया, किसकी इंक्रीमेंट रुकी, कहां स्थानीय जनता ने रिजल्ट कम आने पर शिक्षकों के विरूद्ध नारे लगाए, स्कूल पे ताला जड़ा ,शिक्षकों से बदतमीजी करी, विभाग ने नोटिस लिया जैसे खौफ पसरेंगे।

जुलाई अगस्त तो अपने आप में ही खौफ नाक हैं।कहां बच्चा पानी के बहाव में बह गया , बच्चे को सांप ने काट लिया, भारी भूस्खलन से शिक्षक स्कूल नहीं पहुंचे, पंचायत प्रधान ने जड़ा स्कूल पर ताला ,जैसे खौफ हर साल खबरों में छाए रहते हैं।

बचे बाकी चार महीने , 

तो उसमे एम डी एम् में नमक का खौफ, पानी की टंकी साफ करने का खौफ, सिलेबस टाइम पर पूरा करने का खौफ, टीचर डायरी बनानें का खौफ ,इंस्पेक्शन कैडर के स्कूल में आ मामूली गलती को मीडिया में उड़ेलने का खौफ, एनुअल डे में इलाके के राजनीतिज्ञ को बुलाने अथवा ना बुलाने का खौफ,ऑनलाइन काम न कर पाने पर स्कॉलरशिप अपनी जेब से देने का खौफ , बोर्ड फॉर्म टाइम पर भरने का खौफ।

 सेनिटेशन कैंपेन,डिजास्टर मैनेजमेंट और सेंकड़ों अन्य दिवस मनाने का खौफ।

आर एम एस ए के फंड में घोटाले का खौफ,वोकेशनल स्ट्डीज के फंड को खर्चने का खौफ।

एन एस एस कैंप में विशुद्ध अनुशासन बनाए रखने का खौफ, टूर्नामेंट्स में महिला अध्यापकों की ड्यूटी का खौफ।बिना टॉयलेट्स,बिना सीक्रेसी,बिना पंखे,बिना बाथरूम वाले स्कूल में दो तीन रात काटने का खौफ और उस से भी भयंकर जुराबों और पसीने की बदबू से भरे, धूल भरी दरी पर बच्चियों के कमरे में साथ सोने का खौफ।

शिक्षक खौफ में है साहब।

हर तरह के खौफ में।

कक्षा में शब्दों के प्रयोग का खौफ,सजा ना देने का खौफ,रिजल्ट किसी भी सूरत में पैदा करने का खौफ। 

बच्चे को प्यार से पुचकारने का खौफ, बच्चे को डांटने का खौफ,एक आधी चपत पर पुलिस केस का खौफ, व्हाट्स ऐप या फेसबुक पर बच्चे से संपर्क साधने का खौफ । 

उससे कहीं भयंकर , नई पीढ़ी के बच्चों के सामने अपने चरित्र को बनाए रखने का खौफ।

आप उस समय शिक्षण में है जिस समय आपके आधे से ज्यादा विद्यार्थी चिट्टे या किसी और मादक पदार्थ की गिरफ्त में हैं और नब्बे फीसदी से ज्यादा मोबाइल की गिरफ्त में।

डांटोगे या सजा दोगे तो 1098 पर शिकायत ।पुलिस वालों का खौफ।

लड़कियों को डांटेंगे तो पोक्सो का खौफ।

मुझे नहीं पता, आप इस खौफ को देख पा रहे हैं कि नहीं पर महसूस जरूर करते होंगे।

मैंने आपकी अप्रस्तुत चेतना के खौफ को शब्द दिए हैं।मेरा यकीन मानिए, शिक्षक जबरदस्त खौफ में हैं।

वैसे कोई मुझे खड़ा हो के समझा दे की ये सैनिटेशन कैंपेन आई पी एच और स्वास्थ्य विभाग वाले क्यूं नहीं चलाते।नाम तो जन स्वास्थ्य विभाग है।विद्यालयों में पानी की टंकियों को साफ करने का काम भी ये विभाग क्यूं नहीं करता।अच्छा ये भी कोई समझाओ मुझको की हर बुधवार को बच्चों को आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां स्वास्थ्य विभाग वाले क्यूं नहीं खिलाते।

 ये एम डी एम् को टूरिज्म विभाग वाले क्यूं नहीं पकवाते।

जिस किसी को ज्ञान देना हो उसको ये सरकारी विद्यालय ही क्यूं दिखते।

एक साल में तीन तीन बार वोटर जगरुक्ता दिवस , डिजास्टर मैनेजमेंट के गुण,पर्यावरण बचाने के नुस्खे, योग के फायदे झाड़ने को सिर्फ सरकारी विद्यालय ही क्यूं?

पर्यावरण दिवस या किसी और दिवस पर दो तीन झाड़ रोप दांत फाड़ू फोटू खिंचवाने को सरकारी स्कूल ही क्यों?

सारा खौफ शिक्षक पर ही क्यूं?

कुछ ज्यादा कड़वा तो नहीं हो गया ?

पेट में ख्यालात की गैस थी,डकार मार ली।

कल का अख़बार कहीं ऐसा ना लिखे .. " फेसबुक पर कड़वे बोल लिखने के लिए नपेगा सचिन ... " ;)

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता : भौतिक शास्त्र,

राजकीय उच्च शिक्षा विभाग,हिमाचल सरकार

Friday, 13 September 2024

हे गणेशा:


 हे गणेशा:

दृश्य कमाल का है।

शाम गहरा रही है।बरसात लगभग धौलाधार को आलिंगन दे रुखसत होने को त्यार है।अब वो काले बादलों को छोड़, सुर्ख सफेद रंग के बादलों पर सवार है, वो भी कुपोषित बादल।ढलते सूरज के असर से लालिमा है तो सही पर मद्धम ।

मैं ऐसे ही घर से निकल आया अकेला ,कानों में माइक्रोफोन घुसेड़ और चित्रा सिंह की गजल ," कांटो की चुभन पाई,फूलों का मजा भी..." बजाते हुए।

आजकल घर से थोड़ी दूर फोर लेन पे चहल कदमी का मजा आता शाम को।फोर लेन के साथ निचली तरफ को सुंदर,नीले पानी वाली शांत सी खड्ड है।आई पी एच वालों का पंप हाउस भी जिसे बैठने ,घूमने के लिए भी विकसित किया गया है।अक्सर सयाह होती शाम को मैं यहां अकेला बैठ गजलें सुनना पसंद करता हूं।

आज भी वही किया।जा के पंप हाउस के खड्ड वाले किनारे पर पसर गया।

आज ,दिन में स्कूल में पढ़ा ही नहीं पाया था।मेरा स्कूल सड़क के बिल्कुल साथ है।मेरी लैब और क्लासरूम बिलकुल सड़क से सटे हुए।

गणेश विसर्जन चल रहा है आजकल। 

डीजे की धमा धम।

"तेरी आंखों का यो काजल,,, करे मेरे दिल को घायल.." तो कभी "ब्राजील...." के गानों पर कानफोडू शोर।उसपे दारू के नशे में धुत्त नृत्य करते युवा।बेहिसाब रंग एक दूसरे पर डाल नाचती महिलाएं और बच्चियां।एक गाड़ी पर विराजे गणेश,दूसरी गाड़ी पर 10,000 वॉट का डीजे,फिर तीसरी ट्रॉली पर डीजे के गानों पर नाचते भक्त और भक्तनियां।सड़क से गुजरते वाहनों को रोक,पूरा रोड जाम लगा, प्रसाद खिलाते लोग ।

पढ़ा लिया मैने और पढ़ लिया मेरे चेलों ने।

आज दृश्य अलग था।रोज खड्ड में पानी की लहरियां कभी नीले से सफेद तो कभी सफेद से नीली हो आसमान के लाल रंग से लड़ाई करती नजर आती हैं।सर्दी के मौसम में सामने धौलाधार की सफेदी उस लड़ाई में एक और रंग भरती हैं।

आज खड्ड में कहीं गणेश का सिर तैर रहा था,कहीं मुकुट।कहीं टूटी हुई बाजू तो कहीं टांगे पानी के बहाव से बचने को पत्थर से ओट मांग अपने वजूद को बचाने की जद्दोजहद में लगी थी।

मैं क्षुब्ध सा पानी की धार और गणेश की टूटी हुई टांग के बीच चल रहे संघर्ष को टकटकी लगाए देख रहा था।

"क्यों, मजा आ रहा है पुत्र,,इंतजार कर रहे हो की कब पानी का बहाव मेरी टांग को जर्जर कर के बहा ले जाए...." मेरे कानो में भारी ,बेहद भारी,दर्द से कराह रही आवाज गूंज उठी। 

मैने माइक्रोफोन कान से निकाला।आजू बाजू,आगे पीछे देखा।कोई नहीं था।

मोबाइल चेक करा।स्पोटिफाई पर चित्रा सिंह की गजल ही बज रही थी।फिर ये आवाज कहां से आई।

" यहां देखो पुत्र,मेरी तरफ,मेरी टूटी हुई गर्दन की तरफ..." भारी,बेहद भारी, कराह की आवाज फिर मेरे कानो से टकराई।

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। आस पास कोई न था।शाम लगभग स्याह थी।पीछे पंप हाउस की लाइट अभी ऑन नहीं हुई थी,मतलब चौकीदार अभी ड्यूटी पर नहीं आया था। मैं भागने को हुआ।पर कमाल के मेरे पैर जैसे जड़ हो गए।दिमाग हुकम दे रहा था पैरों को की भागो।परंतु वो अपना मालिक बदल चुके थे शायद,हुकम की तालीम कतई न करें।

अपने को लाचार पा मैने गणेश की धड़ से अलग हुई गर्दन,आधी बची हुई सूंड आधे कान वाले चेहरे की तरफ नजर दी।गणेश के लथपथ चेहरे से रंग निकल कर पानी में घुले जा रहे थे।

मैने गौर से देखा की वो रंग पानी से नहीं उधड़े थे,वो गणेश की आंखों से बहते आंसुओं से झड़ रहे थे।

" यहां आओ पुत्र,यहां मेरे पास..." गणेश के मुख से शब्द उच्चारित हुए।

अब मैं डरा नहीं।

पूरा नास्तिक हूं..एक दम पक्का।इसलिए कोई ईश्वर मेरे आराध्य है ही नहीं।

पर गणेश के चरित्र से बेहद प्यार है मुझे।मेरे घर आओ कभी।गणेश की भिन्न भिन्न तरह की मूर्तियां भरी पढ़ी हैं पूरे घर में।ड्राइंग रूम से ले बेड रूम तक।

मेरे पैर खुद ब खुद उठे और वीरान खड्ड में पड़े गणेश के टूटे फूटे सिर के पास जम गए।

"सहारा दो पुत्र...सीधा करो मेरे जीर्ण सिर को.." गणेश की दर्द से कराहती आवाज मेरे सीने को बींध गई।

मैने हाथों से गणेश के सिर को सीधा किया।

"साधुवाद ,पुत्र... मुझे लगा आज की रात ऐसे ही जर्जर होने में गुजर जायेगी..." गणेश का सिर फिर कहराया।

मैं बिना पलक झपकाए गणेश के सिर को देख रहा था।

"तुम इंसान ,हो कमाल के पुत्र।।दस दिन पहले मुझे दुकान से खरीदा।फिर सजाया,संवारा,स्थापना की।फिर मेरी पूजा की,मुझे गाड़ियों में घुमाया फिराया।मैने "डीजे वाले बाबा मेरा गाना बजा दे.." जैसे गाने भी सुने।इतने दिन भक्तों की पूजा से मैं प्रसन्न था।मोदक भी खिलाए,केले भी। पर आज ठगा हुआ महसूस कर रहा हूं।ऐसा कोई करता है क्या।दो घंटे पहले मेरा घर था,भोजन था,भक्त थे...और अब न घर बचा ,ना भोजन न भक्त..यहां फेंक गए मुझको,टूटने फूटने को।...देखो वो मेरा हाथ कल तक आशीर्वाद देता था सबको,आज किसी का आशीर्वाद ढूंढ रहा है पानी के बहाव से बचने को।वो देखो मेरी टांगे,मेरा पांव ,कल तक शीश झुकाते थे सब,अब कोई सिर झुका के बचा ले इनको।..." दर्द से कराहते गणेश ने बेचारगी से मेरी नजर से नजर मिलाई।

मैं अवाक सा गणेश के सिर को थामे बैठा था।

" हे गणेश,आपको क्रोध नहीं आता ऐसे लोगों पर जो इतने दिन आपको घर में विराजते,लोगों को घर बुला दान दक्षिणा लेते,सुभा शाम कीर्तन करते  सिर्फ इसलिए के उनके काम काज में आप विघ्नहर्ता बने रहें।जब वो काम हो गया तो फिर आपको यहां फेंक देते..." मेरे मुंह से कर्कश स्वर निकले।

" नहीं पुत्र,अब नहीं।मेरा तो जीवन ही कष्ट में रहा।छोटा था तो पिता ने सिर काट दिया।ईश्वर हैं।चाहते तो वही सिर धड़ पर जोड कर पुनः जीवन दे सकते थे।परंतु नहीं।हाथी का सिर काट कर मेरे धड़ से  जोड़ा और फिर मेरी चेतना को हाथी के सिर में प्रस्थापित कर दिया।कुछ बड़ा हुआ तो परशुराम ने एक दांत तोड़ दिया।कितने वर्षों तक दर्द से कराहता रहा।

फिर अध्ययन किया,हर विषय पर विजय पाई।ब्रह्मांड की सारी बुद्धिमता हासिल की।इसीलिए सर्वत्र पूजा जाता हूं,सबसे पहले पूजा जाता हूं।

" गणेश ने भर्राई आवाज से उत्तर दिया।

"परंतु ये कैसा वर्णन है आपका गणेश,की पचास किलो के बच्चे के सिर पर पांच सौ किलो के हाथी का सिर लगा उसे 50 ग्राम के चूहे पर बिठा दिया।ये तो उस बुद्धिमता का उपहास है जो आपने दुर्लभ अध्ययन करने हासिल की थी..." मैने अपना प्रश्न साधा।

"नहीं पुत्र,ऐसा नहीं है।तुम्हारे पूर्वजों के कहने का अंदाज अलग है।गणेश का अर्थ है बुद्धिमता,और चूहे का अर्थ है विषम परिस्थितियों को काटना।बुद्धिमता से ही विषम परिस्थितियों को काटा जा सकता है.." गणेश के सिर ने दर्द में हल्की मुस्कुराहट बिखेरने की कोशिश की।

" ओह,परंतु हे गणेश,ये गणेश विसर्जन का रिवाज है क्या,आया कहां से।इसके पीछे का उद्देश्य है क्या,तर्क है क्या.."मैने एक और प्रश्न दागा।

"हे पुत्र, हुआ ऐसा था की छोटा भाई कार्तिकेय परिवार से रूठ कैलाश छोड़ दक्षिण भारत में स्थापित हो गया था।उसी से मिलने,और वापिस कैलाश ले चलने के लिए मैने दक्षिण भारत में दस दिन तक डेरा जमाए रखा।परंतु कार्तिकेय नहीं माने और फिर मैं वापिस कैलाश आ गया" गणेश के क्षत विक्षित सिर से एक और आह निकली।

" ओह तो आप दस दिन तक दक्षिण भारत में रहे,दक्षिण भारतीय लोग ,खासकर महाराष्ट्र और उसके साथ लगते राज्य इसीलिए गणपति उत्सव मनाते हैं।इतिहास में पढ़ा है की महान मराठा शासक "शिवाजी" ने पूरे मराठा समाज को जोड़ने के लिए गणपति उत्सव मनाने को अनिवार्य किया।उसके बाद क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगा धर तिलक ने भी गणेश उत्सव के बहाने भारतीयों को एक जुट किया।चलो वो तो सही है परंतु हम तो उत्तर भारत में हैं।कैलाश भी उत्तर भारत में ।फिर उत्तर भारत में गणेश उत्सव मनाने का तुक क्या है?ना ही तो कोई पौराणिक कथा,ना ही कोई वजह।आप तो यहीं विराजमान थे..." मैने अपना ज्ञान और विज्ञान गणेश के सिर के आगे प्रस्तुत किया।

गणेश के टूटते फूटते और रंग उतरते सिर के होंठो पर हल्की मुस्कुराहट खिल आई।

मैं इस मुस्कुराहट का कारण समझ गया।

अंधेरा हो चला था। मैं अभी भी गणेश के जीर्ण होते सिर को थामे बैठा था।

अचानक गणेश का सिर दर्द से कराह उठा।मैने देखा की गणेश की सूंड सिर से टूट कर पानी में गिर गई।मेरे हाथों में मिट्टी अब चिकनी हो चली थी। मैं समझ गया कि गणेश का सिर अब और ज्यादा देर तक मेरे हाथों में रहेगा नहीं।

मैने देखा की गणेश की एक आंख बिलकुल निकल कर पानी में गिर गई।

अब बस कान के साथ वाला हिस्सा और टूटी सूंड के पीछे वाला मुंह बचा था।

" तुम जानते हो पुत्र ,की मेरा ये हाल क्यों हो रहा है??.." गणेश के जीर्ण होते जा रहे चेहरे ने आखिरी बार मुझे करुणा से देखा।

"नहीं गणेश..." मैने रूंधे गले और आंखों से निकल आ रहे आंसुओ को रोकते हुए कहा।।

" मैं गणेश हूं पुत्र,,तुम्हारी सारी विद्वता और बुद्धिमानी का प्रतिबिंब।।...... याद रखना... विद्वता और बुद्धिमानी पूजी निसंदेह सबसे पहली जायेगी परंतु समाज हर विद्वान और बुद्धिमान व्यक्ति को इसी तरह क्षत विक्षित कर जीर्ण होने के लिए छोड़ देगा....."गणेश के मुंह से आखिरी शब्द निकले और फिर मुंह मेरे हाथों से छिटक गया।

मेरे हाथों में अब सिर्फ मिट्टी थी।पानी से भरी हुई।लगभग काली होने वाली रात में मैं बस गणेश के सिर के अलग अलग होते टुकड़ों को पानी में बहते देख रहा था।मैने पानी में हाथ मारा की गणेश के सिर के कुछ हिस्से पकड़ उन्हे फिर से इकट्ठा करूं और कुछ देर और गणेश के साथ गुजर सकू।पर मेरे हाथ में जो हिस्सा आया,वो हाथ में आते ही मिट्टी बन गया।

गणेश के टूटे हुए हाथ और पांव पानी से लड़ने की जंग में हार गए थे।पत्थर की ओट उन्हें ज्यादा देर तक बचा नहीं पाई और वो काली होती रात में पत्थर से छिटक कर नीचे तराई की ओर बह चले।

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,

राजकीय उच्च शिक्षा विभाग,हिमाचल सरकार 

9418201289

Saturday, 6 July 2024

वैदिक मैथमेटिक्स


 वैदिक मैथमेटिक्स:

आजकल न मुझे वैदिक मैथमेटिक्स समझने का दौरा पड़ा हुआ है...मानसून की छुट्टियां है ना।कुछ तो नया करना चाहिए अध्यापक को।

पहला कंक्लूजन जो मैं अब तक निकाल पाया वो ये है की "वैदिक मैथमेटिक्स " का वेदों से कोई लेना देना नहीं है।

दूसरा, बिना आधुनिक गणित की मूलभूत जानकारी ,गणित के फंडामेंटल समझे बगैर "वैदिक मैथमेटिक्स" पर हाथ मत आजमाइए वर्ना गणित समझ में ही नहीं आएगा , वेद तो छोड़ ही दीजिए।

"वैदिक मैथमेटिक्स" नाम से 1965 में एक किताब छपी थी जिसे "पूरी के शंकराचार्य कृष्य स्वामी" ने लिखा था ।हालंकि इस पुस्तक को उनकी मृत्यु के बाद उनके शिष्यों ने छापा था।ये दावा की इस पुस्तक की उत्पत्ति " अथर्व वेद" के एक परिशिष्ट से  हुई पूर्णता भ्रामक है।अथर्व वेद छान मारा, ऐसा कोई परिशिष्ट है ही नहीं।किसी को मिले तो मुझे इनबॉक्स करे।

मुझे लगता है की चूंकि " वैदिक" शब्द  बेहद आकर्षक है इसलिए इसे "वैदिक गणित" का नाम दिया गया होगा।कुछ रिसर्च पेपर तो दावा करते हैं की "वैदिक गणित "में न तो वेद हैं न गणित है।

अब तक मुझे जो समझ आया वो ये है की "वैदिक गणित" छोटा मोटा अंक गणित ही है।छोटे मोटे सूत्र हैं जोड़, गुणा,घटाने के।पुस्तक में करीब 40 अध्याय है।16 सूत्र,16 उप सूत्र,13 नियम और 13 उपनियम हैं।

गणित बहुआयामी भाषा है।वो भाषा जिस से आप प्रकृति से बात करते हैं।गणित विज्ञान के विभिन्न आयामों को बड़े ही सूक्ष्म स्तर पर समझाता है। मैं भौतिक विज्ञान का छात्र और प्राध्यापक हूं।मेरा यकीन मानिए ,भौतिक विज्ञान की वास्तविक परिभाषा ," गणित की सहायता से प्रकृति को समझना" ही है।

टाटा इंस्टीट्यूट ,मुंबई के प्रोफेसर "एस जी दानी" और अन्य गणितज्ञों का खोज पत्र जो उन्होंने भारत सरकार को सौंपा था, इंटरनेट पर उलब्ध है।इस रिसर्च पेपर में उन्होंने लिखा की वैदिक मैथमेटिक्स छात्रों के मूलभूत गणितकिय समझ को बर्बाद कर देगा।जो समय गणित की समझ में छात्रों का लगना चाहिए वो वैदिक मैथमेटिक्स के सूत्रों में बर्बाद हो जाएगा।गणित मात्र जोड़ना घटाना नहीं है।ये बड़ा विस्तृत विज्ञान है।

इसी तरह के हजारों पत्र देश के वर्तमान गणितज्ञों ने भारत सरकार को लिखे जिस के कारण वैदिक गणित स्कूल क्यूरिकल्म का हिस्सा नहीं बन पाया।

संकीर्ण राष्ट्रवाद दरअसल धार्मिक प्रतीकों के बहाने सारे ज्ञान विज्ञान पर अपनी पकड़ ,अपना नियंत्रण रखना चाहता है।इस से धर्मगुरुओं को समाज पर अपना नियंत्रण रखने का अवसर भी स्वतः मिल जाता है ।संकीर्ण राष्ट्रवाद की एक समस्या ये भी है की वो अपनी सारी समस्याओं का हल अपने तथाकथित स्वर्णिम इतिहास में ढूंढता है।ये भी मत भूलिए की"ज्ञान" की अपनी एक राजनीति भी होती है।

ऐसा सिर्फ भारत में नहीं है।पाकिस्तान में जब बिजली संकट पर पाकिस्तान सरकार ने एक कॉन्फ्रेंस आयोजित की तो उसमे एक बड़ा मजेदार रिसर्च पेपर पढ़ा गया।रिसर्च पेपर में दावा किया गया की ," हमारी धार्मिक पुस्तकों में "जिन्न" का बहुत बड़ा उल्लेख है।सरकार को "जिन्न" पर रिसर्च करवानी चाहिए ताकि पाकिस्तान में बिजली का हल" जिन्न " निकाल पाएं।

भारत ने निसंदेह गणित के क्षेत्र में महान योगदान दिया है।वैदिक समय में भी  गणित का जबरदस्त विकास हुआ।सिर्फ आर्यभट की " शून्य " ही नहीं उस से पहले भी एस्ट्रोनॉमिकल गणित,भास्कर और उनके सहयोगियों ने गणित विकास में जो योगदान दिया है उसका असर माडर्न विज्ञान में देखा जा सकता है। इंडो अरेबिक न्यूमेरल सिस्टम में अरेबिक बहुत बाद में जुड़ा ,वास्तव में ये भारतीय खोज है जिसे अरबियों ने अपनाया और दुनिया भर में लोकप्रिय और मान्यताप्राप्त करवाया।

याद रखिए,गणित केवल नौ गुना चार बराबर छत्तीस नहीं है।

भारत में गणित की  उच्च शिक्षा की जो सबसे बड़ी संस्था है वो एटॉमिक एनर्जी कमीशन के अंतर्गत आती है।यहीं से समझिए ,गणित की विज्ञान के हर आयाम जैसे न्यूक्लियर फिजिक्स, एस्ट्रोनॉटिकल फिजिक्स,सिविल इंजीनियरिंग और अन्य में विभिन्न प्रकार की अद्वितीय दखल है।

गणित का आधार सीखिए।कक्षा दसवीं तक जितना भी गणित  एनसीईआरटी की किताबों में सिखाया जाता उसमे पारंगत हो जाइए। रटत विद्या का कोई विशेष लाभ होता नहीं है।

सचिन ठाकुर,

पर्वक्ता :भौतिक शास्त्र

राजकीय उच्च शिक्षा विभाग,

हिमाचल सरकार।

9418201289

Thursday, 18 January 2024

कपड़े

 कपड़े।।।

वट्स एप्प पर मैने शिक्षक नामक ग्रुप बनाया है ।इस ग्रुप में मेरे बेहतरीन प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय के शिक्षक और जानकार प्रिंट ,वेब और टी वी पत्रकार मित्र शामिल हैं ।ग्रुप में आम तौर पर किसी न किसी ज्वलन्त विषय को लेकर सटीक विश्लेषण ,उम्दा बहस और कभी कभार भयंकर युद्ध जैसे हालात उतपन्न हो जाते हैं।

आज किसी शिक्षक मित्र ने शिक्षा विभाग द्वारा जारी शिक्षकों को साधारण कपड़ो में स्कूल आने की सलाह वाला पत्र इस ग्रुप में पोस्ट करा।मजेदार बात ये थी की जब मैंने इस पत्र को पढा उसी समय मैं अमेजॉन किंडल पर चम्पारण सत्याग्रह को पढ़ रहा था ।

चम्पारण सत्याग्रह निसन्देह मोहन दास कर्म चंद गांधी को राष्ट्र पिता महात्मा गांधी में परिवर्तित करने वाला पहला कदम था ।इस आंदोलन की खास बात बापू के कपड़े थे।इससे पहले वो अंग्रेजी पेंट और कमीज पहनते थे।इसी आंदोलन में उन्होंने अंग्रेजी कपड़े छोड़े और धोती ,कुर्ता और सर पर गमछा धारण कर गांव गांव जा जनता को जगाना शुरू करा।साधारण जन समूह में गांधी की छवि घर कर गई।अंग्रेजी सरकार की नीवं में दरार उतपन्न हुई।उनकी समस्या बमुश्किल 45 किलो,ठिगने और पतले शरीर वाले गांधी नहीं बल्कि उनकी महामानव बनने वाली छवि बन गई।मशहूर अखबार " पायनियर " के साथ मिल कर अंग्रेजी हुकूमत ने गांधी की छवि को बिगाड़ने का काम शुरू किया।हर दिन पायोनियर अखबार गांधी के विरुद्ध कोई न कोई लेख लिखता और हर लेख में गांधी के कपड़ो को निशाना बनाया जाता।बहुत वक्त तक गांधी ने इन लेखों पर चुप्पी साधे रखी परन्तु पानी सिर से ऊपर बह जाने के बाद गांधी ने पायोनियर अखबार को अपनी वेशभुसा के बारे में एक पत्र लिखा ।उसके आखिरी वाक्य ये थे "...... कपड़े आपकी सहूलियत के अनुसार होने चाहिए।धोती कुर्ता मुझे बेहद सहूलियत और आराम देते हैं, गमछा इसलिए सिर पर धारण करता हूँ क्योंकि ये भीषण गर्मी से बचाता है।कपड़ों को किसी धर्म ,सम्प्रदाय ,जाती या पूर्वी अथवा पश्चिमी सभ्यता में बांधना सबसे बड़ी मूर्खता होगी...... "

ये पत्र जब पायोनियर अखबार के मालिक और प्रधान संपादक के पास पहुंचा तो वो खुद गांधी से मिलने आये।उनसे माफी मांगी और ये पूरा पत्र अगले दिन के अखबार में माफी सहित छापा।

मुझे बिल्कुल नहीं पता कि मेरे विभाग के अधिकारियों का साधारण कपड़ो से अभिप्राय क्या है।कपड़ों का शिक्षा की गुणवत्ता से क्या लेना देना है, ये भी मुझे नहीं पता।अगर ये पत्र महिला अध्यापको के लिए है तो फिर पत्र जारी करने वाले अधिकारियों को तुरंत प्रभाव से अपना पद तय्याग देना चाहिए क्योंकि सामन्त वादी सोच के लोगों के लिए शिक्षण व्यवस्था में कोई जगह है ही नहीं।इस पत्र का क्या संदेश है ,इसके लिए तुरन्त एक वर्कशॉप विभाग को आयोजित करनी चाहिए जिसमें शिक्षक, न्याय विद ,फैशन डिज़ाइनर ,जनता के चुने हुए प्रतिनिधि और सबसे जरूरी " स्वतन्त्र और गणतांत्रिक देश " की असली परिभाषा समझने वाले बुद्धिमान व्यक्ति भी बुलाये जाने चाहिए।

याद रखिये " गन्दगी कपड़ो में नहीं होती , देखने वाले कि नजरों में होती है .... "

मैं फिर बापू के ऐतिहासिक पत्र की पंक्ति दोहरा दूं.... " कपड़े आपकी सहूलियत के अनुसार होने चाहिएं....... "

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता : भौतिक शास्त्र

राजकीय आदर्श विद्यालय सरकाघाट की फेसबुक वाल

Saturday, 13 January 2024

"जी"

 "जी":

भाषा विज्ञान कमाल है।

शब्दों के उच्चारण ,उनका इस्तेमाल और उनके अर्थ काल और स्थान के हिसाब से एक दम अलग और कई बार विरोधाभासी होते हैं।

आजकल " जी" शब्द का उच्चारण मौलिक हो गया है।बचपन और जवानी के दिनों में हम भी इस शब्द का प्रयोग सम्मान हेतु किया करते थे।" पिताजी","माताजी" , "गुरु जी"  यहां तक की अंग्रेजी के शब्दों के साथ भी हम इस विचित्र शब्द को जोड़ लिया करते थे, " अंकल जी" ,"आंटी जी" और कई बार तो अपने अध्यापकों के लिए " सर जी" ।

आजकल नाम के साथ ये शब्द जुड़ना शुरू हो गया है।" मोदी जी" " राहुल जी" " प्रियंका जी" " नड्डा जी" ।

मेरे दक्षिण पंथी मित्र तो बिना जी शब्द के जुड़ाव के नाम नहीं पुकारते , " सचिन जी" "राजेंद्र जी"।

मैने कई घोर दक्षिण पंथी लगाव वाले घनिष्ठ मित्रों के मोबाइल में अपने नाम को " सचिन जी फिजिक्स" " सचिन जी धर्मशाला" " सचिन जी सरकाघाट " स्टोर किए हुए पाया है।

हालांकि मैं वैचारिक आक्रमण को बेहतरीन तरीके से समझता हूं।

मेरे बहुत से घनिष्ठ मित्र ,जिनमे कई बेहतरीन शिक्षक तक शामिल हैं आम तौर पर व्हट्सएप्प यूनिवर्सिटी के उन संदेशों को सच मान लेते हैं जिनमे इतिहास को विकृत कर किसी जाति,धर्म अथवा लोगों के समूह विशेष  के प्रति नफरत और हिंसा पैदा करने के लिए प्रेषित किया गया होता है।

उसका कारण है।इतिहास सामान्य विद्यार्थी सिर्फ दसवीं तक ही पढ़ते हैं।विज्ञान के छात्र,कॉमर्स के छात्र तो दसवीं के बाद इतिहास पढ़ते ही नहीं है कला विषय वाले छात्र भी इतिहास तभी पढ़ते हैं जब उन्होंने वो विषय लिया हो।वर्ना थोड़ा बहुत इतिहास आम छात्र तब पढ़ता है जब या तो वो कमीशन की तैयारी कर रहा हो या एडमिनिस्ट्रेटिव जॉब की तयारी कर रहा हो।

दसवीं के बाद चूंकि इतिहास से 90% लोगों का कोई लेना देना नहीं रहता इसीलिए जब एक व्हट्सअप मैसेज आपको बताता है की एन सी ई आर टी की इतिहास की किताब में  अकबर पर तो पूरा चैप्टर है परंतु महाराणा प्रताप पर एक शब्द नहीं तो आप उसे सच मान लेते हो।आप किताब को खोल ये जानने की कतई कोशिश नहीं करते की उसी किताब में महाराणा प्रताप के संघर्षों ,ऐतिहासिक जीतो,उनके लागू किए सुधारों पर 8 पृष्ठ दर्ज हैं।

इसे बौद्धिक आक्रमण कहते हैं जो वर्तमान में हिंसक स्तर का स्वरूप ले चुका है ।कुछ दार्शनिक लोग इसे दिमाग में गोबर भरना भी कहते हैं।

तो "जी" शब्द की उत्पत्ति समझने के लिए मैने भी इंटरनेट को खंगालना शुरू किया।

अगर हम अपने पुरातन धर्मग्रंथों को खंगाले तो वहां कहीं भी " जी" शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है।हालांकि टीवी धारावाहिक " जी" शब्द के प्रयोग का बेहिसाब इस्तेमाल करते हैं ।" ब्रह्मा जी,विष्णु जी,शिव जी,गंगा जी,सरस्वती जी ,लक्ष्मी जी"।

परंतु मूल पुराणों में और अन्य पुरातन अभिलेखों में किसी भी देवता या अन्य सम्मानित भगवानों के साथ " जी"  का प्रयोग नहीं हुआ है।

संस्कृत जनन ये शब्द " जीव" से खींचा गया प्रतीत होता है जिसका हिंदी में जीवन अर्थ होता है।

इस शब्द को संज्ञा , क्रिया और विशेषण तीनों की तरह इस्तेमाल होते अब आप देख सकते हो।

संज्ञा की तरह " जी " शब्द का इस्तेमाल आत्मा,प्राण ,समूह,रूह,व्यक्ति,दिल ,छाती,तमन्ना ,मर्जी,कामना,मनोरथ के पर्यायवाची शब्द की तरह किया जाता है।

विशेषण में " जी" शब्द का इस्तेमाल माननीय,स्माननीय,आदरणीय,महान ,कुलीन,सज्जन,भद्र जैसे शब्दों के पर्यायवाची शब्द के रूप में किया जाने लगा है।

क्रिया में इस शब्द को " जी भरना, जी उठना,जी भरकर " जैसे मुहावरों और लकोक्तियों में इस्तेमाल किया जाता है।

कुछ स्कॉलर इस शब्द को चीन से आया हुआ मानते हैं।उनके हिसाब से " जी " शब्द का पहला प्रयोग चीन के महान शासक हुआंग दी के पोते " बो शू" ने अपनी सल्तनत की सुंदर स्त्रियों के लिए किया ।दुर्भाग्य से बाद में ये शब्द " वैश्याओ " के लिए प्रयोग किया जाने लगा जो आज तक इस्तेमाल होता है।

राजस्थान के कुछ स्कॉलर " जी " शब्द का पुरुषों के लिए प्रयोग को हास्यास्पद मानते हैं।उनके अनुसार " जी " शब्द राजपूत अपनी बीवियों के लिए करते थे।राजपूतो के पूरे साहित्य में महारानियो के नाम के साथ " जी " शब्द का प्रयोग किया गया है।जैसे महारान प्रताप की ग्यारह महारानियों के नाम उनके इतिहास के दस्तावेजों में "रानी सोलंकीबाई जी,रानी चंपा बाई जी,रानी जासो बाई जी, रानी फूल बाई जी,रानी सहमति बाई जी,रानी किशार आशाबाई जी,रानी अलमब्दे बाई जी,रानी रत्नावती बाई जी,रानी लखा बाई जी, रानी अमरबाई जी दर्ज है।इन दस्तावेजों या अन्य किसी भी राजपूताना दस्तावेज में किसी पुरुष के साथ "जी" शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

तो जितना इतिहास मैं खंगाल पाया सोचा आपके साथ भी सांझा कर लूं।आपके पास भी कोई जानकारी हो तो सांझा अवश्य करें ताकि श्रोता उसका भी आनंद और जानकारी ले पाए।

बर्हलाल इस बात से मैं पूर्णतः सहमत हूं की राजपूताना टोली में "जी" शब्द सिर्फ महिलाएं के सम्मान में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।पुरुष के साथ " श्री" का उच्चारण उचित होगा।

और लेख पढ़ के ये कतई मत सोचिएगा की मैं कोई भाषा विज्ञानी हूं।भौतिक शास्त्री ही हूं।पर दो घंटे की ऑनलाइन क्लास के बाद काम कोई है नहीं।

दिन काटने के लिए इतिहास,भूगोंल और साहित्य पढ़ने से बेहतर कुछ भी नहीं। कम से कम कुछ नया सीख जाओगे और व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के वाहियात मैसेज से दिमाग में गोबर भरने से बच जाओगे।

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,

राजकीय बाल विद्यालय धर्मशाला की फेसबुक वाल