खौफ का अध्यापक :
कभी कभार कड़वाहट अच्छी होती है ।आज कुछ कड़वा हो जाए।
मुझे नहीं पता , आप कितनी एकेडमिक चर्चाओं में हिस्सा लेते है , बहसों में सर खपाते है या फिर घटनाओं पर मंथन करते हैं या नहीं।
मेरी लेखनी से आपके मतलब की चीज निकले तो आप वाह वाह करते हैं ,कुछ विरूद्ध निकले तो हाय हाय मच जाती है।
अच्छा है।लेख वहीं सार्थक जो झंझोड़ के रख दे।
आज बात खौफ की।
शिक्षक के खौफ की।
एक पूरा साल अपनी आंखो के आगे ले आओ।।पूरा शैक्षणिक वर्ष ।
आप शिक्षक है या नहीं अपने हिसाब से ,अपनी चेतना अनुसार एक साल गढ़ लीजिए।
जनवरी फरवरी निकल लिया।शिक्षक नए ट्रांसफर एक्ट के खौफ में था।अच्छा होगा या बुरा होगा , भविष्य के गर्भ में है,, पर शिक्षक खौफ में है। कैसी जोन मिलेगी, कैसी छोड़नी पड़ेगी ,खौफ की चर्चाएं गरम हैं।तीस किलोमीटर कैसे नापना ,कौन उठा देगा, दूसरी विधानसभा वाले अपने क्षेत्र में घुसने देंगे या नहीं,ये खौफ पसरा था।
अख़बार शिक्षक को नपाने पे तुले है,खौफ में घी का काम कर रहे हैं।कितना नपायोगे भाई।एक शिक्षक की कमर का मांस निकाल कर वज्र बना लिया था,अब और नपाओगे तो धनुष बनने से तो रहा।
अब मार्च में नया खौफ तैयार होगा।
किस सेन्टर में कैमरे लगे हैं ,रिजल्ट कम होने का खौफ पसरेगा, इंक्रीमेंट जाने का खौफ पासरेगा।किस की सेन्टर सुपरिटेंडेंट की ड्यूटी लगी है, नकल होने देगा या नहीं ,ये खौफ पसरेगा।
फ्लाईंग वाले कितने घंटे बैठेंगे ,कितने केस बनाएंगे,खौफ पैदा करेगा।
फिर किस सेन्टर में नकलची पकड़े गए, किस किस सेन्टर सुपरिटेंडेंट को बर्खास्त किया गया ,ये खौफ होगा।
अप्रैल माह में किस शिक्षक ने किस पेपर को गलत चेक करा, अपने दिन के कोटे के पूरे पेपर चेक करे के नहीं ये खौफ पसरेगा ।
मई ,जून में कहां रिजल्ट कम आया, किसकी इंक्रीमेंट रुकी, कहां स्थानीय जनता ने रिजल्ट कम आने पर शिक्षकों के विरूद्ध नारे लगाए, स्कूल पे ताला जड़ा ,शिक्षकों से बदतमीजी करी, विभाग ने नोटिस लिया जैसे खौफ पसरेंगे।
जुलाई अगस्त तो अपने आप में ही खौफ नाक हैं।कहां बच्चा पानी के बहाव में बह गया , बच्चे को सांप ने काट लिया, भारी भूस्खलन से शिक्षक स्कूल नहीं पहुंचे, पंचायत प्रधान ने जड़ा स्कूल पर ताला ,जैसे खौफ हर साल खबरों में छाए रहते हैं।
बचे बाकी चार महीने ,
तो उसमे एम डी एम् में नमक का खौफ, पानी की टंकी साफ करने का खौफ, सिलेबस टाइम पर पूरा करने का खौफ, टीचर डायरी बनानें का खौफ ,इंस्पेक्शन कैडर के स्कूल में आ मामूली गलती को मीडिया में उड़ेलने का खौफ, एनुअल डे में इलाके के राजनीतिज्ञ को बुलाने अथवा ना बुलाने का खौफ,ऑनलाइन काम न कर पाने पर स्कॉलरशिप अपनी जेब से देने का खौफ , बोर्ड फॉर्म टाइम पर भरने का खौफ।
सेनिटेशन कैंपेन,डिजास्टर मैनेजमेंट और सेंकड़ों अन्य दिवस मनाने का खौफ।
आर एम एस ए के फंड में घोटाले का खौफ,वोकेशनल स्ट्डीज के फंड को खर्चने का खौफ।
एन एस एस कैंप में विशुद्ध अनुशासन बनाए रखने का खौफ, टूर्नामेंट्स में महिला अध्यापकों की ड्यूटी का खौफ।बिना टॉयलेट्स,बिना सीक्रेसी,बिना पंखे,बिना बाथरूम वाले स्कूल में दो तीन रात काटने का खौफ और उस से भी भयंकर जुराबों और पसीने की बदबू से भरे, धूल भरी दरी पर बच्चियों के कमरे में साथ सोने का खौफ।
शिक्षक खौफ में है साहब।
हर तरह के खौफ में।
कक्षा में शब्दों के प्रयोग का खौफ,सजा ना देने का खौफ,रिजल्ट किसी भी सूरत में पैदा करने का खौफ।
बच्चे को प्यार से पुचकारने का खौफ, बच्चे को डांटने का खौफ,एक आधी चपत पर पुलिस केस का खौफ, व्हाट्स ऐप या फेसबुक पर बच्चे से संपर्क साधने का खौफ ।
उससे कहीं भयंकर , नई पीढ़ी के बच्चों के सामने अपने चरित्र को बनाए रखने का खौफ।
आप उस समय शिक्षण में है जिस समय आपके आधे से ज्यादा विद्यार्थी चिट्टे या किसी और मादक पदार्थ की गिरफ्त में हैं और नब्बे फीसदी से ज्यादा मोबाइल की गिरफ्त में।
डांटोगे या सजा दोगे तो 1098 पर शिकायत ।पुलिस वालों का खौफ।
लड़कियों को डांटेंगे तो पोक्सो का खौफ।
मुझे नहीं पता, आप इस खौफ को देख पा रहे हैं कि नहीं पर महसूस जरूर करते होंगे।
मैंने आपकी अप्रस्तुत चेतना के खौफ को शब्द दिए हैं।मेरा यकीन मानिए, शिक्षक जबरदस्त खौफ में हैं।
वैसे कोई मुझे खड़ा हो के समझा दे की ये सैनिटेशन कैंपेन आई पी एच और स्वास्थ्य विभाग वाले क्यूं नहीं चलाते।नाम तो जन स्वास्थ्य विभाग है।विद्यालयों में पानी की टंकियों को साफ करने का काम भी ये विभाग क्यूं नहीं करता।अच्छा ये भी कोई समझाओ मुझको की हर बुधवार को बच्चों को आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां स्वास्थ्य विभाग वाले क्यूं नहीं खिलाते।
ये एम डी एम् को टूरिज्म विभाग वाले क्यूं नहीं पकवाते।
जिस किसी को ज्ञान देना हो उसको ये सरकारी विद्यालय ही क्यूं दिखते।
एक साल में तीन तीन बार वोटर जगरुक्ता दिवस , डिजास्टर मैनेजमेंट के गुण,पर्यावरण बचाने के नुस्खे, योग के फायदे झाड़ने को सिर्फ सरकारी विद्यालय ही क्यूं?
पर्यावरण दिवस या किसी और दिवस पर दो तीन झाड़ रोप दांत फाड़ू फोटू खिंचवाने को सरकारी स्कूल ही क्यों?
सारा खौफ शिक्षक पर ही क्यूं?
कुछ ज्यादा कड़वा तो नहीं हो गया ?
पेट में ख्यालात की गैस थी,डकार मार ली।
कल का अख़बार कहीं ऐसा ना लिखे .. " फेसबुक पर कड़वे बोल लिखने के लिए नपेगा सचिन ... " ;)
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता : भौतिक शास्त्र,
राजकीय उच्च शिक्षा विभाग,हिमाचल सरकार

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