ऐसे ही:
दिवाली है।रौशनी का त्योहार।
बताते रहते हम कक्षा में बच्चों को कि हरी दिवाली मनाओ।पटाखे न जलाओ।वायु प्रदूषण ,ध्वनि प्रदूषण और रोशनी प्रदूषण होगा।मरीज ,बच्चों के स्वस्थ और जंगली जानवरों के लिए घातक होगा।
पर पटाखे ना फोड़े तो मजा ही नहीं आता।झूठ नहीं बोलूंगा मैं खुद ऐसा हूं।जब तक तीन चार हजार रुपए के पटाखे न फोड़े दिवाली का मजा ही नहीं आता।
अब जब देश में हर चीज पर बहस होने लगी है, नित नए ज्ञान रोज परोसे जा रहे हैं,नया इतिहास व्हाट्सएप और फेसबुक यूनिवर्सिटी पर रचा जा रहा है तो उत्कंठा हुई के पता लगाया जाए की पटाखे दिवाली का हिस्सा कब बने।
इतिहास खंगालने पर पता चला की भारतीय इतिहास में चाणक्य रचित अर्थ शास्त्र वो पहली किताब है जिसमे किसी चूर्ण का विवरण है जो तेजी से जलता था,तेज लपटे पैदा कर सकता था और किसी बंद डब्बे में जलाया जाए तो फट सकता था।अर्थ शास्त्र में बंगाल की भूमि पर बारिश के बाद फैले किसी लवण का वर्णन है जिसमे बुरादा डाल कर इसे जल्दी से जलाया जा सकता है।
किसी भी भारतीय धर्म ग्रंथ में पटाखों का उल्लेख नहीं है। समस्त धर्म ग्रंथ जिनमे दिवाली का उल्लेख है सिर्फ घी के दिए जला खूब सारी रोशनी करने की ही गवाही देते हैं।
शोर करके,पटाखे फोड़ कर दुर्भाग्य की देवी को भगाने का चलन चीन में था ।रिग वेद में तो दुर्भाग्य की देवी निरीति को दिकपाल का दर्जा हासिल है।
हालांकि मिथको की माने तो निसंदेह प्राचीन भारतीय सभ्यता तेज रोशनी के साथ फटने वाले यंत्रों के साथ भिग्य थी।
विज्ञान में बारूद का जिक्र 1270 में सीरिया के रसायनशास्त्री हसन अल राममह ने अपनी किताब में किया।वो पहले विज्ञानिक थे जिन्होंने बारूद को बेहद गर्म पानी से शुद्ध कर के उस से विस्फोटक बनाने में सफलता हासिल की थी।
भारत में विस्फोटक का पहला इस्तेमाल 1526 में हुआ जब मुगल बाबर के नेतृत्व में दिल्ली पर हमला कर रहे थे।दिल्ली सल्तनत अब्राहिम लोधी के नेतृत्व में बेहद ताकतवर थी।परंतु मुगलों द्वारा भारत की धरती पर पहली बार इस्तेमाल हो रहे विस्फोटकों और तोपखाने से लोहा नहीं ले पाई।
इसके बाद भारत में पटाखे और आतिशबाजी का दौर शुरू हुआ।
हालांकि कुछ इतिहासकार भारत में आतिशबाजी को लाने का श्रेय मुगलों को नहीं देते। दारा शिकोह की उनके जिंदा रहते बनाई गई तस्वीर में लोगों को आतिशबाजी करते देखा जा सकता है।अर्थात आतिशबाजी शायद मुगलों से कुछ समय पहले भारत पहुंच चुकी थी क्योंकि मध्य एशिया और भारत का व्यापार मुगलों से बहुत पहले स्थापित हो चुका था।
इतिहास हमे बताता है की आतिशबाजी को भारत में फिरोजशाह ने लोकप्रिय किया जो हर त्योहार चाहे ईद हो या दिवाली या दशहरा जबरदस्त आतिशबाजी करवाया करते थे।
गुनपाउडर बहुत बाद में भारत आया।इसका इस्तेमाल शिकार करने और युद्ध में हाथियों को डराने के लिया जाता था।
1667 में औरंगजेब ने पटाखों पर पूरा प्रतिबंध लगा दिया था ।इसके बाद अंग्रेजों ने एक्सप्लोसिव एक्ट लगा कर पटाखों में प्रयोग किए जाने वाले कच्चे माल पर पाबंदी लगा दी।
आधुनिक भारत में 1940 में जब अंग्रेजों ने एक्सप्लोसिव एक्ट को वापिस लिया तब अय्या नागर और शन्मुगा नागर नाम के दो भाइयों ने पटाखों की पहली फैक्टरी शिवकाशी में लगाई।
यही दोनो भाई दिवाली से पटाखों को जोड़ने में कामयाब रहे और दिवाली का अभिप्राय 80 सालो में पटाखे फोड़ने से हो गया।
शिवकाशी में 1990 तक लगभग 190 पटाका फैक्ट्रियां थी लेकिन धीरे धीरे चीन के पटाखों ने शिवकाशी के उद्योग पर भार कम किया।
ये भी याद रखना चाहिए की भारत में चाइल्ड लेबर का सबसे बुरा उदाहरण यही पटाखा फैक्ट्रियां है।
खैर।
इतिहास यही है। व्हट्सप यूनिवर्सिटी के गोबर से अपना दिमाग मत भरिए।रोशनी के इस त्योहार का आनंद लीजिए।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र
राजकीय उच्च शिक्षा विभाग,हिमाचल सरकार

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