Saturday, 29 May 2021

क्या हुतियापा चल रहा।

 क्या हुतियापा चल रहा।

बच्चे की ऑनलाइन डांस क्लास।। बच्चा कमरा बन्द कर के डांस कर रहा।वहां मैडम जी अकेले म्यूजिक लगा के , कमरे में ठुमके लाइव कर के क्लास लगा रही।
मम्मा का मोबाइल तो आजकल बच्चे का मोबाइल बना हुए।स्कूल से ज्ञान लाइव हो रहा।लाइव ज्ञान में मम्मा बच्चे के साथ बैठी हुई।पानी,खाना,बिस्किट,मैगी,अंगूर हर पांच मिनट में बच्चे के मुंह में ठूंस रही।अब मोबाइल बच्चे के पास है तो वॉट्सएप और फेसबुक तो सौतेलेपन से रो रहे।
बाप बेचारा टी वी लगाए तो बच्चा चीख पड़ता ," पापा साउंड म्यूट करो,क्लास चल री,,,समझ नी आता आपको।"
बाप बेचारा करे तो क्या करे,मोदी जी भी मन की बात लिख कर नहीं करते की पढ़ ही लेते।
अध्यापक परेशान।हर तरफ से।कुछ इसलिए की ऑनलाइन मटेरियल बनाएं क्या तो कुछ इसलिए की जो बनाया उसे पहुंचाएं कैसे।।इतना डाटा तो है ही नहीं अपलोड करने को।कुछ ज़ूम और गूगल की सहायता से वर्चुअल क्लास रूम की कोशिश में थे पर घर पर किसके पास बोर्ड और हाईलाइटर।कुछ वीडियो बना के यू ट्यूब पर अपलोड कर रहे और परेशान हो रहे की उनके व्यू की संख्या 100 से ऊपर नहीं जा रही।विभाग ने विडियोज तैयार करवाए वो इतने बोरिंग की दो मिनट में उबासी ,पांच मिनट में आंख बन्द और दस मिनट में खर्राटे।
आई डी धीमान जी शिक्षा मंत्री थे।मेरे पिछले एक स्कूल में एनुअल डे पर मुख्य अतिथि थे।अपने शिक्षण के दिनों में इसी स्कूल में उन्होंने कोई दस साल सेवाएं दी थी।अपने अभिभाषण में बच्चों के मोबाइल इस्तेमाल पर बेहद सख्त दिखे।मैंने पूछ लिया,इतनी सखती काहे को, लाने दो बच्चों को मोबाइल स्कूल ।बोले तुमको नहीं पता ,ये स्कूल मोबाइल ला के पूरा दिन उस पर गाने सुनते रहते।मैंने भी चुटकी ली ,"तो साहब गाने गाए ही सुनने के लिए जाते।" वो मुस्कुरा के टाल गए पर अगले दिन बड़े कठोर आदेश मोबाइल के इस्तेमाल पर शिक्षा विभाग ने निकाले।अब वो ही मोबाइल सुभा से शाम बच्चों के गले की घंटी बने हुए हैं।
आंखे फुट जाएंगी।ब्लू लाइट आंखो के विट्रियस ह्यूमर को ना ठीक होने वाली हानि पहुंचा रही। सूजी,लाल और खारीश करती आंखो को बोरिक एसिड से धुलवाना मम्मा के काम में एक नया जुड़ाव है।
मम्मियां दुखी।सुभा ऑनलाइन क्लास ,शाम को ऑनलाइन टेस्ट।ना जिम,ना वॉक।दो महीने में ही शरीर सुराही हो लिया।बीच के टायर नए इंसानी शरीर का प्रारूप बता रहे। दरजी परेशान ऐसा लिबास कैसे बनाएं जो ऊपर नीचे से टाईट और बीच से झोला हो।
बाप थक गया सब्जियां ढो ढों के।शाम को ऑफिस में शहनाइयां बजा के ,सब्जी,चावल , आटा दाल का बोरा घसीट के घर पहुंचे तो बच्चे की ऑनलाइन क्लास के चक्कर में मम्मा बीजी हैं।कोई पानी का गिलास पूछ के राजी नहीं। चूसे हुए आम की तरह का थोब् डा उठा खुद ही फ्रिज से पानी पीता तब कहीं खरबूज में थोड़ा बहुत पानी पड़ता।
क्या है यार।क्या हुटियापा है।
फीस के चक्कर में बेचारी बसंती अकेले कमरे में नाच कर बच्चों को ऑनलाइन नचवा रही।वीरू की बाहें बंधी हुई जंजीरों के साथ।
गब्बर एयर कंडीशन कमरे में बैठ सांबा और कालिया से फीडबैक ले रहा और डायलॉग झाड़ रहा," कितने आदमी थे....ऑनलाइन"
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वॉल

सामाजिक दूरी ,कब तक :

 सामाजिक दूरी ,कब तक :

अब तो अरबों दिमागों में ये सवाल प्रति तीस सेकंड की दर से कोंध रहा होगा।आखिर ये समाजिक दूरी कितने समय और चलेगी।।क्या लॉक डॉउन शिघ्र ख़तम हो जाएगा।हमें कब तक घरो में रहने के लिए कहा जाएगा।
जवाब है।
अभी बहुत लंबी चलेगी ये सामाजिक दूरी।शोध लगातार जारी है।खूब सारे शोध और उनके परिणामों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि ये क्रम बहुत लंबा चलने वाला है।
सामाजिक दूरी बनाए रखने के लिए बहुत सारे बिंदु ध्यान में रखने पड़ेंगे।
इन बिंदुओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है झुंड प्रतिरक्षा(herd immunity) ।झुंड प्रतिरक्षा आम जन का प्रतिशत है कि पूरी जनसंख्या का कितना हिस्सा वायरस के लिए अपने शरीर में प्रतिरक्षा उत्पन्न के चुका है।अगर जनसंख्या का एक बहुत बड़ा हिस्सा वायरस से प्रतिरक्षा उत्पन्न कर चुका है तो फिर बीमार लोगों द्वारा स्वस्थ लोगों को इनफैक्ट करने का बहुत कम मौका है।वायरस के पास ट्रांसमिट होने का कोई मौका नहीं होगा।इससे महामारी रुक जाएगी और मृत्यु दर पर काबू पाया जा सकेगा।
झुंड प्रतिरक्षा हासिल करने के दो तरीके हैं।पहला की कम से कम तीन चौथाई जनसंख्या को वायरस से संक्रमित किया जाए।सामाजिक दूरी निसंदेह इंफेक्शन कम करने और मृत्यु दर पर काबू पाने का सबसे सरल तरीका है।परंतु सामाजिक दूरी झुंड प्रतिरक्षा उत्पन्न करने में सबसे बड़ी बाधा भी है।
दूसरा तरीका सार्स कोव-2 के लिए वैक्सीन त्यार करने और उसे लगने का है।परंतु सच्चाई ये है कि इस वायरस का टीका त्यार करने में हमें अभी कम से कम 18 महीने लगेंगे।
तीसरा तरीका जिससे समाजिक दूरी को शीघ्र समाप्त किया जा सकता है वो है कम्युनिटी टेस्टिंग।हमें बड़े स्तर पर वायरस टेस्ट करने होंगे।ये टेस्ट नए मरीजों कि जल्द पहचान करेंगे और स्वस्थ्य सेवाओं में लगे पेशेवरों को उनको आइसोलेट करने में देरी नहीं लगेगी।अधिकांश लोग जो वायरस लिए घूम रहे हैं उनमें इंफेक्शन के कोई लक्षण नहीं दिखते।70% लोग जो इंफेक्शन ग्रस्त होते हैं वो बिल्कुल भी बीमार नहीं पड़ते परंतु वायरस लगातार ट्रांसमिट करते रहते हैं।इसलिए टेस्ट की संख्या को बढ़ाना बेहद आवश्यक है।ताकि हर वायरस कैरियर को आइसोलेट किया जा सके और सोशल डिस्टैंस को घटाया जा सके,लॉक डॉउन को समाप्त किया का सके।
विज्ञानिको के पास ऐसे कोई सबूत नहीं है कि तापमान में वृध्दि के साथ वायरस के फैलाव में कमी आएगी।हालांकि अगर ऐसा हुआ तो लॉक डॉउन में आंशिक कमी की जाए।
कोई नहीं जानता के ये महामारी एक साल लेगी या इस से अधिक समय।इसलिए सरकारों को सामाजिक दूरी और सीमित लॉक डॉउन की नीतियां बनानी पड़ेंगी।इंफेक्शन का स्तर तय करेगा कि कितने वर्षों तक सामाजिक दूरी और घूमने पर पाबन्दी रहेगी।सामाजिक दूरी महामारी से युद्ध में मददगार है परन्तु शोधकर्ताओं को डर है कि लॉक डॉउन और सामाजिक दूरी कि शर्ते हटाने के बाद महामारी के और भी घातक स्वरूप में फैलने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।
सामाजिक दूरी का सरल सा अर्थ है कि अपने आप को दूसरे मनुष्य से कम से कम सात फीट की दूरी पर रखिए।महीनों तक घर से काम कीजिए और स्कूल ,कॉलेज को कई महीनों तक भूल जाइए।परिवार या मित्रों के साथ किसी के घर अथवा किसी अन्य जगह कतई मत जाइए।दुकान, मॉल या सब्जी लेते समय भी दूसरे व्यक्ति से कम से कम सात फुट की दूरी रखिए।चूंकि वायरस के फैलने का मुख्य कारण हवा में उपलब्ध वायरस युक्त तरल बूंदे हैं जो संक्रमित व्यक्ति के छींकने और खांसने से निकलती हैं।सात फुट की दूरी इस बात को सुनिश्चित करेगी कि ये बूंदे आपके नाक ,मुंह और आंखो से आपके शरीर में नहीं घुसी।
ताजा शोधों से ये भी पूर्णतः साबित हो गया है कि ये वायरस लेबोरेटरी में नहीं बना है बल्कि प्रकृति जनित है।विश्व भर के शोधों से एक ही परिणाम सामने आया है कि चीन के बूहान की गैर कानूनी मांस बाजार में ये वायरस मनुष्यों के शरीर पर आक्रमण कर गया।चूंकि वुहान और इटली का जबरदस्त व्यपारिक जुड़ाव है,लगभग एक लाख लोग प्रति सप्ताह वुहान और इटली के बीच सफर करते हैं ,इस कारण ये इटली में बुरी तरह फैला।फिर संक्रमण वैश्विक होता गया।
इटली की समस्या उसकी 30% जनसंख्या है जिसकी उम्र 60 साल से ऊपर है और वो दुनिया कि दूसरी सबसे बुढ़ी जनसंख्या का घर है।शायद इसीलिए वहां मृत्यु दर अधिक है।हालांकि इस शोध को जापान पर लागू नहीं किया ज सकता जहां की 35% जनसंख्या 60 के पार है परंतु अभी तक वायरस इंफेक्शन से एक भी मृत्यु नहीं है।
तो कुल मिला कर अभी सामाजिक दूरी और लॉक डॉउन का सिलसिला बहुत लंबा चलने वाला है।सरकारें बहुत प्रयत्न कर रही हैं। सारा प्रशासनिक ,पुलिस और स्वास्थ्य अमला अपने आपको झोंका हुआ है सिर्फ आपकी जान को बचाने के लिए।
एक आप हो की कभी तबलीगी जमात के वाहियात , अविज्ञानीक और गैर जिम्मेदाराना भाषणों को सुन ने मुंह उठा के चल देते।कभी अयोध्या चल देते,गीता पाठ सुनने चल पड़ते तो कभी गुरद्वारों में इकठ्ठे हो जाते।
अब तो सुना आपने अपनी जान जोखिम में डाल कर आपको बचाने निकले डॉक्टर्स को पत्थर मारना शुरू कर दिया,उनके मुंह पर थूकने शुरू कर दिया।
आइने के सामने खड़े हो के अपने आप को देखिएगा।आइने में आपको एक बेहद घटिया,धर्मांध,गैर जिम्मेदार,नीच नजर आएगा।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता: भौतिक विज्ञान,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल से
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Thursday, 20 May 2021

 कपड़े।।।

वट्स एप्प पर मैने शिक्षक नामक ग्रुप बनाया है ।इस ग्रुप में मेरे बेहतरीन प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय के शिक्षक और जानकार प्रिंट ,वेब और टी वी पत्रकार मित्र शामिल हैं ।ग्रुप में आम तौर पर किसी न किसी ज्वलन्त विषय को लेकर सटीक विश्लेषण ,उम्दा बहस और कभी कभार भयंकर युद्ध जैसे हालात उतपन्न हो जाते हैं।
आज किसी शिक्षक मित्र ने शिक्षा विभाग द्वारा जारी शिक्षकों को साधारण कपड़ो में स्कूल आने की सलाह वाला पत्र इस ग्रुप में पोस्ट करा।मजेदार बात ये थी की जब मैंने इस पत्र को पढा उसी समय मैं अमेजॉन किंडल पर चम्पारण सत्याग्रह को पढ़ रहा था ।
चम्पारण सत्याग्रह निसन्देह मोहन दास कर्म चंद गांधी को राष्ट्र पिता महात्मा गांधी में परिवर्तित करने वाला पहला कदम था ।इस आंदोलन की खास बात बापू के कपड़े थे।इससे पहले वो अंग्रेजी पेंट और कमीज पहनते थे।इसी आंदोलन में उन्होंने अंग्रेजी कपड़े छोड़े और धोती ,कुर्ता और सर पर गमछा धारण कर गांव गांव जा जनता को जगाना शुरू करा।साधारण जन समूह में गांधी की छवि घर कर गई।अंग्रेजी सरकार की नीवं में दरार उतपन्न हुई।उनकी समस्या बमुश्किल 45 किलो,ठिगने और पतले शरीर वाले गांधी नहीं बल्कि उनकी महामानव बनने वाली छवि बन गई।मशहूर अखबार " पायनियर " के साथ मिल कर अंग्रेजी हुकूमत ने गांधी की छवि को बिगाड़ने का काम शुरू किया।हर दिन पायोनियर अखबार गांधी के विरुद्ध कोई न कोई लेख लिखता और हर लेख में गांधी के कपड़ो को निशाना बनाया जाता।बहुत वक्त तक गांधी ने इन लेखों पर चुप्पी साधे रखी परन्तु पानी सिर से ऊपर बह जाने के बाद गांधी ने पायोनियर अखबार को अपनी वेशभुसा के बारे में एक पत्र लिखा ।उसके आखिरी वाक्य ये थे "...... कपड़े आपकी सहूलियत के अनुसार होने चाहिए।धोती कुर्ता मुझे बेहद सहूलियत और आराम देते हैं, गमछा इसलिए सिर पर धारण करता हूँ क्योंकि ये भीषण गर्मी से बचाता है।कपड़ों को किसी धर्म ,सम्प्रदाय ,जाती या पूर्वी अथवा पश्चिमी सभ्यता में बांधना सबसे बड़ी मूर्खता होगी...... "
ये पत्र जब पायोनियर अखबार के मालिक और प्रधान संपादक के पास पहुंचा तो वो खुद गांधी से मिलने आये।उनसे माफी मांगी और ये पूरा पत्र अगले दिन के अखबार में माफी सहित छापा।
मुझे बिल्कुल नहीं पता कि मेरे विभाग के अधिकारियों का साधारण कपड़ो से अभिप्राय क्या है।कपड़ों का शिक्षा की गुणवत्ता से क्या लेना देना है, ये भी मुझे नहीं पता।अगर ये पत्र महिला अध्यापको के लिए है तो फिर पत्र जारी करने वाले अधिकारियों को तुरंत प्रभाव से अपना पद तय्याग देना चाहिए क्योंकि सामन्त वादी सोच के लोगों के लिए शिक्षण व्यवस्था में कोई जगह है ही नहीं।इस पत्र का क्या संदेश है ,इसके लिए तुरन्त एक वर्कशॉप विभाग को आयोजित करनी चाहिए जिसमें शिक्षक, न्याय विद ,फैशन डिज़ाइनर ,जनता के चुने हुए प्रतिनिधि और सबसे जरूरी " स्वतन्त्र और गणतांत्रिक देश " की असली परिभाषा समझने वाले बुद्धिमान व्यक्ति भी बुलाये जाने चाहिए।
याद रखिये " गन्दगी कपड़ो में नहीं होती , देखने वाले कि नजरों में होती है .... "
मैं फिर बापू के ऐतिहासिक पत्र की पंक्ति दोहरा दूं.... " कपड़े आपकी सहूलियत के अनुसार होने चाहिएं....... "
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र ,
राजकीय आदर्श विद्यालय सरकाघाट की फेसबुक वाल

खौफ का अध्यापक :

खौफ का अध्यापक :

कभी कभार कड़वाहट अच्छी होती है ।आज कुछ कड़वा हो जाए।
मुझे नहीं पता , आप कितनी एकेडमिक चर्चाओं में हिस्सा लेते है , बेहसो में सर खपाते है या फिर घटनाओं पर मंथन करते हैं।लेखनी से आपके मतलब की चीज निकले आप वाह वाह करते हैं ,कुछ विरूद्ध निकले हाय हाय मच जाती है।
अच्छा है।लेख वहीं सार्थक जो झनजोड के रख दे।
आज बात खौफ की।शिक्षक के खौफ की।
एक पूरा साल अपनी आंखो के आगे ले आओ।।पूरा शैक्षणिक वर्ष ।आप शिक्षक है या नहीं अपने हिसाब से ,अपनी चेतना अनुसार एक साल गढ़ लीजिए।
जनवरी फरवरी निकल लिया।शिक्षक नए ट्रांसफर एक्ट के खौफ में   था।अच्छा होगा या बुरा होगा , भविष्य के गर्भ में है,, पर शिक्षक खौफ में है। कैसी जोन मिलेगी, कैसी छोड़नी पड़ेगी ,खौफ की चर्चाएं गरम हैं।अख़बार शिक्षक को नपाने पे तुले है।खौफ में घी का काम कर रहे हैं।
अब मार्च में नया खौफ तैयार होगा।किस सेन्टर में कैमरे लगे हैं ,रिजल्ट कम होने का खौफ पसरेगा, इंक्रीमेंट जाने का खौफ पासरेगा।किस की सेन्टर सुपरिटेंडेंट की ड्यूटी लगी है, नकल होने देगा या नहीं ,ये खौफ प्सरेगा। फ्लाईंग वाले कितने घंटे बैठेंगे ,खौफ   पैदा करेगा।फिर किस सेन्टर में नकलची पकड़े गए, किस किस सेन्टर सुपरिटेंडेंट को बर्खास्त किया गया ,ये खौफ होगा।
अप्रैल माह में किस शिक्षक ने किस पेपर को गलत चेक करा, अपने दिन के कोटे के पूरे पेपर चेक करे के नहीं ये खौफ पसरेगा ।
मई ,जून में कहां रिजल्ट कम आया, किसकी इंक्रीमेंट रुकी, कहां स्थानीय जनता ने रिजल्ट कम आने पर शिक्षकों के विरूद्ध नारे लगाए, स्कूल पे ताला जड़ा ,शिक्षकों से बदतमीजी करी, विभाग ने नोटिस लिया जैसे खौफ पसरेंगे।
जुलाई अगस्त तो अपने आप में ही खौफ नाक हैं।कहीं कोई बच्चा बेह तो नहीं गया, बच्चे को सांप ने काट लिया, भारी भूस्खलन से शिक्षक स्कूल नहीं पहुंचे, पंचायत प्रधान ने जड़ा स्कूल पर ताला ,जैसे खौफ हर साल खबरों में छाए रहते हैं।
बचे बाकी चार महीने , तो उसमे एम डी एम् में नमक का खौफ, पानी की टंकी साफ करने का खौफ, सिलेबस टाइम पर पूरा करने का खौफ, टीचर डायरी बनानें का खौफ ,इंस्पेक्शन कैडर के स्कूल में आ मामूली गलती को मीडिया में उड़ेलने का खौफ, एनुअल डे में  इलाके के राजनीतिज्ञ को बुलाने अथवा ना बुलाने का खौफ,ऑनलाइन स्कॉलरशिप , बोर्ड फॉर्म  टाइम  पर भरने का खौफ, सेनिटेशन कैंपेन,डिजास्टर मैनेजमेंट और सेंकड़ों अन्य दिवस मनाने का खौफ।
शिक्षक खौफ में है साहब।
हर तरह के खौफ में।कक्षा में शब्दों के प्रयोग का खौफ,सजा ना देने का खौफ,रिजल्ट किसी भी सूरत में पैदा करने का खौफ। बच्चे को प्यार से पुचकारने का खौफ, बच्चे को डांटने का खौफ,एक आधी चपत पर पुलिस केस का खौफ, व्हाट्स ऐप या फेसबुक पर बच्चे से संपर्क साधने का खौफ । उससे कहीं भयंकर , नई पीढ़ी के बच्चों के सामने अपने चरित्र को बनाए रखने का खौफ।
मुझे नहीं पता, आप इस खौफ को देख पा रहे हैं कि नहीं पर महसूस जरूर करते होंगे।
मैंने आपके अप्रस्तुट चेतना के खौफ को शब्द दिए हैं।मेरा यकीन मानिए, शिक्षक जबरदस्त खौफ में हैं।
वैसे कोई मुझे खड़ा हो के समझा दे की ये सैनिटेशन कैंपेन आई पी एच और स्वास्थ्य विभाग वाले क्यूं नहीं चलाते।नाम तो जन स्वास्थ्य    विभाग है।विद्यालयों में पानी की टंकियों को साफ करने का काम भी ये विभाग क्यूं नहीं करता।अच्छा ये भी कोई समझाओ मुझको की हर बुधवार को बच्चों को आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां हस्पताल वाले क्यूं नहीं खिलाते। ये एम डी एम् को टूरिज्म विभाग वाले क्यूं नहीं पकवाते।
जिस किसी को ज्ञान देना हो उसको ये सरकारी विद्यालय ही क्यूं दिखते।एक साल में तीन तीन बार वोटर जगरुक्ता दिवस , डिजास्टर मैनेजमेंट के गुण,पर्यावरण बचाने के नुस्खे, योग के फायदे झाड़ने को सिर्फ सरकारी विद्यालय ही क्यूं।सारा खौफ शिक्षक पर ही क्यूं?
कुछ ज्यादा कड़वा तो नहीं हो गया ?पेट में ख्यालात की गैस थी,डकार मार ली।
कल का अख़बार कहीं ऐसा ना लिखे .. " फेसबुक पर कड़वे बोल लिखने के लिए नपेगा सचिन ... " ;)
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता :भौतिक शास्त्र 
राजकीय आदर्श विद्यालय सरकाघाट की फेसबुक वाल

Saturday, 8 May 2021

मास्क और 5 G :

 विज्ञान लेख 11:

मास्क और 5 G :
बचपन में हम सभी ने किसी ना किसी कक्षा में एक सुपरहिट निबन्ध पढ़ा अथवा लिखा जरूर है," विज्ञान अभिशाप अथवा वरदान "।
मजेदार बात ये है कि इस निबन्ध का आजतक कोई फलसफा निकल ही नहीं पाया।अपनी " विज्ञान लेख" की श्रृंखला के ग्यारहवें लेख में कोशिश करता हूं कि इस द्वंद का पटाक्षेप कर ही दूं।हालांकि आप बहस को लंबा खिंचने के लिए स्वतंत्र हैं।
तो वर्तमान में पूरी दुनिया कोविद महामारी से जूझ रही है।जब में ये लेख लिख रहा हूं उस समय लगभग 10 लाख लोग इस महामारी से मारे जा चुके हैं ।आंकड़ा दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।
हालांकि मृत्यु का आंकड़ा खौफ पैदा करता है परन्तु आजू बाजू करोना संक्रमित लोगों को साधारण ज्वर या खांसी के लक्षणों के अलावा किसी अन्य तकलीफ में ना देख और बिना किसी इलाज के खुद ही ठीक होते देख हैरानी भी होती है और संशय भी होता है कि कोई अदृश्य ताकत नेपथ्य में बैठ इस बीमारी कि स्क्रिप्ट तो नहीं लिख रही है।
मुझे ओबामा का भाषण याद है जब अमेरिकी राष्ट्रीय टेलीविजन पर उन्होंने एच वन एन वन वायरस से 20 लाख लोगों की मृत्यु होने का दावा किया था और सभी अमेरिका वासियों को इसका टीका लेने को कहा था।अमेरिका के लोगों ने टीका लेने को मना कर दिया और मजेदार बात ये कि 20 लाख तो दूर बीस हज़ार लोग भी इस वायरस के संक्रमण से नहीं मरे।फार्मा कम्पनियों को अरबों रुपए का मुनाफा कमाने का मौका हाथ से फिसल गया।
अब करोना संक्रमण के समय भी वैक्सीन युद्ध छिड़ चुका है।कुदरती रूप से स्वस्थ होते लोगों को देख एक नया प्रचार जन मानस के दिमाग पर छोड़ा जा रहा है कि संक्रमण की पहली वेव से बच भी गए तो दूसरी वेव में नहीं बच पाओगे इसलिए वैक्सीन लेना अति आवश्यक है।
अब देखिए,प्रचार एक तरफा हैं।
मास्क को कितना प्रचारित किया गया।
निसंदेह आपका मास्क पहन कर भीड़ भाड़ वाले इलाके में जाना आवश्यक है।परंतु आपको ये कोई नहीं बताता कि घर पर,अपनी गाड़ी में,अपने ऑफिस में जहां आप अकेले हो वहां मास्क हरगिज मत लगाइए अन्यथा ये मास्क आपको करोना से भी कहीं ज्यादा बीमार कर देगा।
समझिए,आपका मास्क आपको कम मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध करवाता है।आपके द्वारा सांस में बाहर निकाली गई कार्बन डाइऑक्साइड गैस आपके मास्क से टकराकर फिर वापिस आपकी सांस से होती हुई आपके फेफड़ों में पहुंच रही है।इसके साथ आप का मास्क जिन तंतुओं से निर्मित हुआ है उसके माइक्रो पार्टिकल भी सांस के साथ आपके फेफड़ों तक पहुंच रहे हैं।उदाहरण तः हलकी मात्रा में उपयोग हुए पलास्टिक के माइक्रो प्लास्टिक कण आपके फेफड़ों में जा रहे जो अनेकों प्रकार के कैंसर आपके शरीर में पैदा करते हैं।ऑक्सीजन की अप्रचुर मात्रा आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को वैसे ही कम कर रही है।
डर ,अवसाद,क्षीण होती आपकी आर्थिक स्थिति,नौकरी जाने का खौफ,सामाजिक अस्त व्यस्तता वैसे ही आपको दिमागी तौर पर कमजोर बना रही जो आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी निश्चित तौर पर असर डालेगी।
अब ऐसी स्थिति में करोना कि दूसरी वेव निसंदेह काफी घातक होगी।
दूसरी विकराल समस्या जो इसी समय उपलब्ध है वो है मोबाइल टकनोलजी में पांचवीं पीढ़ी( 5 जी) की।ये तकनॉलाजी 30 गीगा हरट्स से के कर 300 गीगा हर्ट्स की फ्रीक्वेंसी की रेडिएशन का इस्तेमाल करेंगी।लंबे समय के शोध हमे बताते हैं कि मात्र 1.8 गीगा हर्ट्स की रेडिएशन ही दिल का कैंसर,दिमाग का कैंसर जैसे खौफनाक रोगों को जन्म देती है जिसे अब तक मेडिकल साइंस में गिना ही नहीं जाता। 5 जी का रेडिएशन स्पेक्ट्रम आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को और भी नुकसान पहुंचाएगा।हमारे वर्तमान में इस्तेमाल किए जाने वाले फोन बमुश्किल 500 से 1500 मेगा हर्ट्स की फ्रीक्वेंसी की रेडिएशन इस्तेमाल करते हैं ।
अब जब भारी संख्या में लोग मृत्यु को प्राप्त होंगे तो वेक्सिन लेना आवश्यक हो ही जायेगा और फार्मा कम्पनियां खरबों डॉलर कमाएंगी।
अब ध्यान से सोचिए।
विज्ञान ने मोबाइल का आविष्कार लंबी दूरी तक वार्तालाप करने के लिए बिना तारों का प्रयोग करने को किया था।इंटरनेट पर एडवरटाइजमेंट करने, आभासी दुनिया की आदत लगा,डाटा को द्रुत गामी रफ्तार से पहुंचाने और उससे पैसा कमाने कि मंशा तो विज्ञान कि कतई नहीं थी।ठीक इसी तरह विज्ञान ने भयंकर वायरस से लडने के कई उपाय मानव जाति को सुलभ करवाए है,उसकी आड़ में अरबों खरबों का व्यपार विज्ञान ने बिल्कुल नहीं सिखाया।
ये कुछ बड़े पूंजीपतियों की बेपनाह दौलत समेटने की हवस है जिसने विज्ञान को थोड़ी ही देर के लिए ही सही,परंतु जीवन का ही विरोधी बना दिया है।बन्दर के हाथ में उस्तरा पकड़ा दिया है।
तो फिर बताइए ," विज्ञान वरदान या अभिशाप "?
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल