Saturday, 26 October 2024

ऐसे ही

 ऐसे ही:

दिवाली है।रौशनी का त्योहार।

बताते रहते हम कक्षा में बच्चों को कि हरी दिवाली मनाओ।पटाखे न जलाओ।वायु प्रदूषण ,ध्वनि प्रदूषण और रोशनी प्रदूषण होगा।मरीज ,बच्चों के स्वस्थ और जंगली जानवरों के लिए घातक होगा।

पर पटाखे ना फोड़े तो मजा ही नहीं आता।झूठ नहीं बोलूंगा मैं खुद ऐसा हूं।जब तक तीन चार हजार रुपए के पटाखे न फोड़े दिवाली का मजा ही नहीं आता।

अब जब देश में हर चीज पर बहस होने लगी है, नित नए ज्ञान रोज परोसे जा रहे हैं,नया इतिहास व्हाट्सएप और फेसबुक यूनिवर्सिटी पर रचा जा रहा है तो उत्कंठा हुई के पता लगाया जाए की पटाखे दिवाली का हिस्सा कब बने।

इतिहास खंगालने पर पता चला की भारतीय इतिहास में चाणक्य रचित अर्थ शास्त्र वो पहली किताब है जिसमे किसी चूर्ण का विवरण है जो तेजी से जलता था,तेज लपटे पैदा कर सकता था और किसी बंद डब्बे में जलाया जाए तो फट सकता था।अर्थ शास्त्र में बंगाल की भूमि पर बारिश के बाद फैले किसी लवण का वर्णन है जिसमे बुरादा डाल कर इसे जल्दी से जलाया जा सकता है।

किसी भी भारतीय धर्म ग्रंथ में पटाखों का उल्लेख नहीं है। समस्त धर्म ग्रंथ जिनमे दिवाली का उल्लेख है सिर्फ घी के दिए जला खूब सारी रोशनी करने की ही गवाही देते हैं।

शोर करके,पटाखे फोड़ कर दुर्भाग्य की देवी को भगाने का चलन चीन में था ।रिग वेद में तो दुर्भाग्य की देवी निरीति को दिकपाल का दर्जा हासिल है।

हालांकि मिथको की माने तो निसंदेह प्राचीन भारतीय सभ्यता तेज रोशनी के साथ फटने वाले यंत्रों के साथ भिग्य थी।

विज्ञान में बारूद का जिक्र 1270 में सीरिया के रसायनशास्त्री हसन अल राममह ने अपनी किताब में किया।वो पहले विज्ञानिक थे जिन्होंने बारूद को बेहद गर्म पानी से शुद्ध कर के उस से विस्फोटक बनाने में सफलता हासिल की थी।

भारत में विस्फोटक का पहला इस्तेमाल 1526 में हुआ जब मुगल बाबर के नेतृत्व में दिल्ली पर हमला कर रहे थे।दिल्ली सल्तनत अब्राहिम लोधी के नेतृत्व में बेहद ताकतवर थी।परंतु मुगलों द्वारा भारत की धरती पर पहली बार इस्तेमाल हो रहे विस्फोटकों और तोपखाने से लोहा नहीं ले पाई।

इसके बाद भारत में पटाखे और आतिशबाजी का दौर शुरू हुआ।

हालांकि कुछ इतिहासकार भारत में आतिशबाजी को लाने का श्रेय मुगलों को नहीं देते। दारा शिकोह की उनके जिंदा रहते बनाई गई तस्वीर में लोगों को आतिशबाजी करते देखा जा सकता है।अर्थात आतिशबाजी शायद मुगलों से कुछ समय पहले भारत पहुंच चुकी थी क्योंकि मध्य एशिया और भारत का व्यापार मुगलों से बहुत पहले स्थापित हो चुका था।

इतिहास हमे बताता है की आतिशबाजी को भारत में फिरोजशाह ने लोकप्रिय किया जो हर त्योहार चाहे ईद हो या दिवाली या दशहरा जबरदस्त आतिशबाजी करवाया करते थे।

गुनपाउडर बहुत बाद में भारत आया।इसका इस्तेमाल शिकार करने और युद्ध में हाथियों को डराने के लिया जाता था।

1667 में औरंगजेब ने पटाखों पर पूरा प्रतिबंध लगा दिया था ।इसके बाद अंग्रेजों ने एक्सप्लोसिव एक्ट लगा कर पटाखों में प्रयोग किए जाने वाले कच्चे माल पर पाबंदी लगा दी।

आधुनिक भारत में 1940 में जब अंग्रेजों ने एक्सप्लोसिव एक्ट को वापिस लिया तब अय्या नागर और शन्मुगा नागर नाम के दो भाइयों ने पटाखों की पहली फैक्टरी शिवकाशी में लगाई।

यही दोनो भाई दिवाली से पटाखों को जोड़ने में कामयाब रहे और दिवाली का अभिप्राय 80 सालो में पटाखे फोड़ने से हो गया।

शिवकाशी में 1990 तक लगभग 190 पटाका फैक्ट्रियां थी लेकिन धीरे धीरे चीन के पटाखों ने शिवकाशी के उद्योग पर भार कम किया।

ये भी याद रखना चाहिए की भारत में चाइल्ड लेबर का सबसे बुरा उदाहरण यही पटाखा फैक्ट्रियां है।

खैर।

इतिहास यही है। व्हट्सप यूनिवर्सिटी के गोबर से अपना दिमाग मत भरिए।रोशनी के इस त्योहार का आनंद लीजिए।

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता भौतिक शास्त्र 

राजकीय उच्च शिक्षा विभाग,हिमाचल सरकार



Sunday, 20 October 2024

खौफ का अध्यापक

 


खौफ का अध्यापक :

कभी कभार कड़वाहट अच्छी होती है ।आज कुछ कड़वा हो जाए।

मुझे नहीं पता , आप कितनी एकेडमिक चर्चाओं में हिस्सा लेते है , बहसों में सर खपाते है या फिर घटनाओं पर मंथन करते हैं या नहीं।

मेरी लेखनी से आपके मतलब की चीज निकले तो आप वाह वाह करते हैं ,कुछ विरूद्ध निकले तो हाय हाय मच जाती है।

अच्छा है।लेख वहीं सार्थक जो झंझोड़ के रख दे।

आज बात खौफ की।

शिक्षक के खौफ की।

एक पूरा साल अपनी आंखो के आगे ले आओ।।पूरा शैक्षणिक वर्ष ।

आप शिक्षक है या नहीं अपने हिसाब से ,अपनी चेतना अनुसार एक साल गढ़ लीजिए।

जनवरी फरवरी निकल लिया।शिक्षक नए ट्रांसफर एक्ट के खौफ में था।अच्छा होगा या बुरा होगा , भविष्य के गर्भ में है,, पर शिक्षक खौफ में है। कैसी जोन मिलेगी, कैसी छोड़नी पड़ेगी ,खौफ की चर्चाएं गरम हैं।तीस किलोमीटर कैसे नापना ,कौन उठा देगा, दूसरी विधानसभा वाले अपने क्षेत्र में घुसने देंगे या नहीं,ये खौफ पसरा था।

अख़बार शिक्षक को नपाने पे तुले है,खौफ में घी का काम कर रहे हैं।कितना नपायोगे भाई।एक शिक्षक की कमर का मांस निकाल कर वज्र बना लिया था,अब और नपाओगे तो धनुष बनने से तो रहा।

अब मार्च में नया खौफ तैयार होगा।

किस सेन्टर में कैमरे लगे हैं ,रिजल्ट कम होने का खौफ पसरेगा, इंक्रीमेंट जाने का खौफ पासरेगा।किस की सेन्टर सुपरिटेंडेंट की ड्यूटी लगी है, नकल होने देगा या नहीं ,ये खौफ पसरेगा। 

फ्लाईंग वाले कितने घंटे बैठेंगे ,कितने केस बनाएंगे,खौफ पैदा करेगा।

फिर किस सेन्टर में नकलची पकड़े गए, किस किस सेन्टर सुपरिटेंडेंट को बर्खास्त किया गया ,ये खौफ होगा।

अप्रैल माह में किस शिक्षक ने किस पेपर को गलत चेक करा, अपने दिन के कोटे के पूरे पेपर चेक करे के नहीं ये खौफ पसरेगा ।

मई ,जून में कहां रिजल्ट कम आया, किसकी इंक्रीमेंट रुकी, कहां स्थानीय जनता ने रिजल्ट कम आने पर शिक्षकों के विरूद्ध नारे लगाए, स्कूल पे ताला जड़ा ,शिक्षकों से बदतमीजी करी, विभाग ने नोटिस लिया जैसे खौफ पसरेंगे।

जुलाई अगस्त तो अपने आप में ही खौफ नाक हैं।कहां बच्चा पानी के बहाव में बह गया , बच्चे को सांप ने काट लिया, भारी भूस्खलन से शिक्षक स्कूल नहीं पहुंचे, पंचायत प्रधान ने जड़ा स्कूल पर ताला ,जैसे खौफ हर साल खबरों में छाए रहते हैं।

बचे बाकी चार महीने , 

तो उसमे एम डी एम् में नमक का खौफ, पानी की टंकी साफ करने का खौफ, सिलेबस टाइम पर पूरा करने का खौफ, टीचर डायरी बनानें का खौफ ,इंस्पेक्शन कैडर के स्कूल में आ मामूली गलती को मीडिया में उड़ेलने का खौफ, एनुअल डे में इलाके के राजनीतिज्ञ को बुलाने अथवा ना बुलाने का खौफ,ऑनलाइन काम न कर पाने पर स्कॉलरशिप अपनी जेब से देने का खौफ , बोर्ड फॉर्म टाइम पर भरने का खौफ।

 सेनिटेशन कैंपेन,डिजास्टर मैनेजमेंट और सेंकड़ों अन्य दिवस मनाने का खौफ।

आर एम एस ए के फंड में घोटाले का खौफ,वोकेशनल स्ट्डीज के फंड को खर्चने का खौफ।

एन एस एस कैंप में विशुद्ध अनुशासन बनाए रखने का खौफ, टूर्नामेंट्स में महिला अध्यापकों की ड्यूटी का खौफ।बिना टॉयलेट्स,बिना सीक्रेसी,बिना पंखे,बिना बाथरूम वाले स्कूल में दो तीन रात काटने का खौफ और उस से भी भयंकर जुराबों और पसीने की बदबू से भरे, धूल भरी दरी पर बच्चियों के कमरे में साथ सोने का खौफ।

शिक्षक खौफ में है साहब।

हर तरह के खौफ में।

कक्षा में शब्दों के प्रयोग का खौफ,सजा ना देने का खौफ,रिजल्ट किसी भी सूरत में पैदा करने का खौफ। 

बच्चे को प्यार से पुचकारने का खौफ, बच्चे को डांटने का खौफ,एक आधी चपत पर पुलिस केस का खौफ, व्हाट्स ऐप या फेसबुक पर बच्चे से संपर्क साधने का खौफ । 

उससे कहीं भयंकर , नई पीढ़ी के बच्चों के सामने अपने चरित्र को बनाए रखने का खौफ।

आप उस समय शिक्षण में है जिस समय आपके आधे से ज्यादा विद्यार्थी चिट्टे या किसी और मादक पदार्थ की गिरफ्त में हैं और नब्बे फीसदी से ज्यादा मोबाइल की गिरफ्त में।

डांटोगे या सजा दोगे तो 1098 पर शिकायत ।पुलिस वालों का खौफ।

लड़कियों को डांटेंगे तो पोक्सो का खौफ।

मुझे नहीं पता, आप इस खौफ को देख पा रहे हैं कि नहीं पर महसूस जरूर करते होंगे।

मैंने आपकी अप्रस्तुत चेतना के खौफ को शब्द दिए हैं।मेरा यकीन मानिए, शिक्षक जबरदस्त खौफ में हैं।

वैसे कोई मुझे खड़ा हो के समझा दे की ये सैनिटेशन कैंपेन आई पी एच और स्वास्थ्य विभाग वाले क्यूं नहीं चलाते।नाम तो जन स्वास्थ्य विभाग है।विद्यालयों में पानी की टंकियों को साफ करने का काम भी ये विभाग क्यूं नहीं करता।अच्छा ये भी कोई समझाओ मुझको की हर बुधवार को बच्चों को आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां स्वास्थ्य विभाग वाले क्यूं नहीं खिलाते।

 ये एम डी एम् को टूरिज्म विभाग वाले क्यूं नहीं पकवाते।

जिस किसी को ज्ञान देना हो उसको ये सरकारी विद्यालय ही क्यूं दिखते।

एक साल में तीन तीन बार वोटर जगरुक्ता दिवस , डिजास्टर मैनेजमेंट के गुण,पर्यावरण बचाने के नुस्खे, योग के फायदे झाड़ने को सिर्फ सरकारी विद्यालय ही क्यूं?

पर्यावरण दिवस या किसी और दिवस पर दो तीन झाड़ रोप दांत फाड़ू फोटू खिंचवाने को सरकारी स्कूल ही क्यों?

सारा खौफ शिक्षक पर ही क्यूं?

कुछ ज्यादा कड़वा तो नहीं हो गया ?

पेट में ख्यालात की गैस थी,डकार मार ली।

कल का अख़बार कहीं ऐसा ना लिखे .. " फेसबुक पर कड़वे बोल लिखने के लिए नपेगा सचिन ... " ;)

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता : भौतिक शास्त्र,

राजकीय उच्च शिक्षा विभाग,हिमाचल सरकार