Friday, 29 December 2023

फीस

फीस:
कलांतर में जो भी हुआ वो अलग कहानी है,परंतु सत्य ये है कि राम तीनों माताओं में केकई के सबसे नजदीक थे।केकई निसंदेह भरत से कहीं ज्यादा राम को दुलार देती थी।
शिक्षा हेतु जब चारों राजकुमारों को वशिष्ठ आश्रम भेजा जाने लगा तो केकई ने इस बात का विरोध किया।दशरथ के मनाने पर मान गई।चारों राजकुमारों का विद्यार्थी संस्कार हुआ।राजसी वस्त्र छोड़ तपस्वी वस्त्र धारण करवा उनको पहली भिक्षा राज महल से ही लेनी थी।केकई राम को भिक्षु वस्त्रों में देख परेशान हुई।वो राम को महल के सारे सुख और कीमती वस्तुओं के साथ आश्रम भेजने पर अड गई।
दशरथ ने केकई को धरम समझाया ," रानी ,शिक्षा संपूर्ण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।इसलिए राजकुमार हो या कोई साधारण युवक ,आश्रम में सभी भिक्षा ग्रहण करेंगे और अपना अध्ययन करेंगे।राज महल राजकुमारों की शिक्षा के मामले में कोई सहायता नहीं करेगा।"
इस कहानी को ,इस कथन को आप वाल्मीकि कृत रामायण,तुलसीदास कृत राम चरित मानस,कंब रामायण अथवा दुनिया के किसी भी अन्य रामायण ,यहां तक कि रामानन्द सागर कृत रामायण में भी देख सकते हैं।
उत्तर रामायण शिक्षा को एक कदम आगे ले के जाता है।राम जब भी परेशानी में आए,वो हमेशा विशिष्ठ के आश्रम में खुद चल के विमर्श लेने के लिए गए।राजा थे,चाहते तो विशिष्ठ को महल बुला लेते।यही शिक्षक और विद्यालय के सम्मान का उत्कर्ष है।
हज़ारों वर्षों से भारतीय परम्परा में शिक्षा का यही सुदृढ ढांचा काम करता आया है।आप बौद्ध परम्परा की भिक्षा परम्परा को देख लीजिए या जैन शिक्षा परम्परा को।
बेशक बौद्ध और जैन संप्रदाय ब्राह्मणवाद के विरूद्ध सबसे तीव्र प्रतिक्रियाएं थी परन्तु शिक्षा को ले कोई भी प्रतिक्रिया कोई नए मापदंड घड़ नहीं पाई। हर धर्म में शिक्षा को समाज की सामूहिक जिम्मेदारी माना गया है।आश्रम हों या मदरसे।
शिक्षा  के ढांचे में महाभारत काल से बदलाव आने शुरू हुए।एक लव्य का उल्लेख उस ढांचे में बदलाव का वर्णन है।महाभारत घटी या काल्पनिक है इस पर आप बहस कर सकते हैं।
परंतु वो जब भी लिखी गई ,शिक्षण ढांचे में राजकुमारों ,विशिष्ठ दरबारियों और गुरु पुत्रों तक ही शिक्षा को सीमित करने की कहानी खुद ही बयां करती है।
एक लवय की कहानी आम लोगों के बच्चों को शिक्षा से दूर करने का सुदृढ पक्ष है।उस से भी कहीं ज्यादा वो " गुरु दक्षिणा" का जीता जागता सबूत है।इतिहास हमें बताता है कि इसी गुरु दक्षिणा के चक्कर में शिक्षा आम जन से दूर होती गई।ये ब्राह्मण कुमारों और राज परिवारों तक सीमित हो गई।जाहिर है ,नए अन्वेषण तो होने से रहे ,भारतीय महान सभ्यता ने जो कुछ भी हासिल किया था वो भी सिमटना आरम्भ हो गया।लोगों को लगता है कि भारत सोने की चिड़िया इसलिए था कि यहां राजाओं महाराजाओं के पास सोना बहुत था।परंतु सत्य ये है कि ," सोने की चिड़िया" की उपाधि सातवीं शताब्दी   में  राजा  विक्रमादित्य द्वारा शिक्षा के ढांचे को पुनः स्थापित करने के प्रयासों के बाद दी गई  थी।
आज इसी " गुरु दक्षिणा" को हम " फीस" कहते हैं।आज़ाद राष्ट्र में शिक्षा की व्यवस्था को पुनः स्थापित किया गया परन्तु "शिक्षा समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है" के सिद्धांत को बरकरार रखा गया।शिक्षा को संविधान में समवर्ती सूची में डाला गया ताकि राज्य और केंद्र एक दूसरे के अनुपूरक बन सकें और कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित ना रह जाए।देश में प्रगतिशील विचारों के जन संगठनों के भयंकर दवाब में शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार में बदला गया।
परंतु गुरु दक्षिण को समाप्त करना प्रगतिशील विचारों के जन संगठनों की घटती संख्या से संभव नहीं हो पाया।
अब स्थिति विपरीत होती दिख रही है।समाज की सामूहिक जिम्मेदारी से चलने वाले सरकारी स्कूल कमजोर होना शुरू हो गए हैं।सरकारों के उदासीन रवैए,निजी शिक्षा कि दुकानों कि चकाचौंध,सरकारी विद्यालयों के विरूद्ध भयंकर कु प्रचार से कम से कम आरम्भिक शिक्षा तो घुटनों पर आ गई है। जल्द ही ये उच्च शिक्षा में परिलक्षित होना शुरू हो जाएगी।
इसी बीच निजी शिक्षा जन मानस  के दिमाग में अपनी चका चोंध स्थापित कर रही है।ये संस्थान किसी फाइव स्टार होटल से कम नहीं है।। एन सी ई आर टी की एक कार्यशाला में दिल्ली के एक प्रतिष्ठित निजी विद्यालय में जाने का निमंत्रण मिला।
स्कूल की बिल्डिंग किसी पांच सितारा होटल से कम नहीं। विद्यालय के प्रधानाचार्य के साथ आगे बढ़े तो देखा कि शिक्षक नृत्य करते हुए छोटे बच्चों को एक दूनी दो का पहाड़ा सीखा रहे थे ।मैंने पूछ लिया ये क्या हो रहा।बोले इसे " प्ले वे मेथड "कहते हैं।बचपन में मेरे प्राइमरी स्कूल में हमे भी एक गोला बनाकर पहाड़े इसी तरह रटाए जाते थे।आजकल इसे प्ले वे मेथड कहते हैं।
आगे बढ़े।कुछ बच्चे घोड़ों पर सवार थे।शिक्षक उन्हें घोड़ों पर बैठना सीखा रहा था।प्रधानाचार्य ने मुझे देख हलकी कुटिल मुस्कुराहट के साथ बताया," हम बच्चों को घुड़सवारी सिखाते हैं,"! मुझे अपना बचपन याद आया।घर से प्राइमरी स्कूल तक कई बार गांव के खच्चर वाले अपनी खचर पर बिठा हमे स्कूल पहुंचा दिया करते थे।अब इसे घुड़सवारी कहते हैं।
आगे बढ़े,कुछ बच्चे तरणताल में स्विमिंग सीख रहे थे।ये तो हम भी करते थे।गांव का बड़े वाला कुआं, खड़ की बड़ी बड़ी लंबी चौड़ी गहरी पानी से भरी बोगियां हमारी तैराकी की अब तक गवाही देती हैं।नवोदय विद्यालय पण्डोह के साथ बहने वाली ब्यास नदी कितनी बार हमारी तैराकी और डी पी साहब की पिछ्वाड़ा सुजाने वाली मार कुटाई की गवाह बनी है।इसे आजकल स्विमिंग कहते हैं।
आगे बढ़े तो देखा बच्चे स्केटिंग करना ,साइकिलिंग करना सीख रहे।बचपन में हम भी खेत की ढलानों पर गिरी मिट्टी पर फिसलते का मजा लेते थे।साइकिल तो नसीब नहीं हुई पर तार का एक गोला बना,उसके पीछे एक और तो फनसा कई किलोमीटर तक उसे दौड़ाते रहते थे। बैलेंस करने की कला वहीं सीख ली थी।
विद्यालय में क्रिकेट का मैदान,कई खेलों के परिसर थे।हम भी अपने बचपन में किसी बड़े खेत में क्रिकेट खेल लेते थे। हां,ये बात और है कि बैटिंग वहीं करता ता जिसका बल्ला है और गेंदबाजी वो जिसका गेंद है।फिर भी फील्डिंग करना और विकेट कीपिंग करना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार था।
अब कक्षा में आए।क्या रंग बिरंगे डेस्क।स्मार्ट बोर्ड।प्रजेक्टर।सुंदर पोस्टर।चतख रंगो की दीवारें ,भव्य प्रकाश व्यवस्था।
मुझे अपना प्राइमरी स्कूल याद आया।बस चुने से लीपा हुआ जिसकी दीवारों के गड्ढे उसके सफेद रंग में नया रंग भर देते थे।कोई लट्टू नहीं।लकड़ी का एक ब्लैक बोर्ड।
परंतु सीखा तो हमने भी वो सब कुछ जो यहां इन आलीशान कमरों में सिखाया जाता।
प्रधानाचार्य साहब ने लायब्रेरी दिखाई,स्टाफ रूम भी।सब कुछ आलीशान।फिर अपने ऑफिस ले आए चाए,बिस्किट, स्नेक्स वातानुकूलित कमरे में परोसे गए।
मैंने प्रधानाचार्य महोदय की तारीफ की।स्कूल के रखरखाव की भी।फिर एकेडमिक उपलब्धियों का ब्योरा मांगा।
प्रधानाचार्य थोड़े सिमटे।बोले," पहले तो बहुत अच्छा था।कई बार हमारे बच्चों ने दिल्ली बोर्ड में टॉप किया।अब सरकारी स्कूल थोड़े अच्छा कर रहे हैं। सिसोदिया साहब हैं महाराज।फिर भी हर साल औसतन दो तीन बच्चे डॉक्टर बन जाते ,चार पांच जे ई ईई निकल जाते।पर्सेटाइल अच्छा बन जाए तो दिल्ली यूनिवर्सिटी के किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन हो जाता।"
मुझे हैरानी हुई। इतना तो हम आदर्श विद्यालय सरकाघाट में भी कर रहे।इससे भी ज्यादा।
खैर उठते उठते मैंने फीस के बारे में पूछ लिया।प्रधानाचार्य ने बताया," अलग अलग हैं।प्राइमरी तक समझ लो कि एडमिशन फीस कोई पचास हजार... उसी में किताबें,ड्रेस,आईकार्ड वगेरे हो जाता और कोई दस हजार रूपए महीने कि फीस.बाकी एनुअल डे,स्कूल ट्रिप और अलग खर्चे वो हम मौका देख के के लेते.. अरे कुछ स्कूल तो आठ से दस लाख रुपए लेते।।हमारा कोई तीन चार लाख में हो जाता।। बड़ी क्लास में ये फीस बढ़ जाती"
मेरे चेहरे पर भय मिश्रित मुस्कुराहट खिल आई।विद्यालय से बाहर आया तो सोच रहा था कि गांव के रामू चाचा जो खच्चर पाल अपने परिवार का गुजारा चलाते वो कैसे अपने बच्चों को ऐसे स्कूल में पढ़ा पाएंगे।सच कहूं तो उस स्कूल में जाने के बाद मुझे खुद का वजूद रामू चाचा से बड़ा नहीं लगा।
एक ही देश में बच्चों के सीखने के परिवेश में इतना महासागरीय अंतर।और लड़ना सभी को एक ही डिग्री का युद्ध है।
कम से कम सीखने का मैदान तो सभी के लिए एक समान सपाट हो।ये तो अमानवीय है।शिक्षा जोड़ने के लिए थी,ये तो अलग अलग वर्ग के बच्चे एक ही समाज में पैदा कर रही।
शिक्षा सरकारी विद्यालय से लो तो लगभग मुफ्त ,निजी शिक्षा कि दुकान से लो तो लाखों की फीस।एम् बी बी एस  आई जी एम् सी से करो तो बमुश्किल पांच सालों का दो लाख रुपए का खर्चा।मारकंडेश्वर यूनिवर्सिटी से करो तो एक करोड़। स्नाकोत्तर हिमाचल विश्वविद्यालय से करो तो बमुश्किल दो सालो का खर्चा पचास हज़ार रुपए,एमिटी यूनिवर्सिटी से करो तो बीस पच्चीस लाख।।
सरकार को सभी निजी विद्यालय तुरन्त प्रभाव से बन्द कर देने चाहिए।अगर नहीं तो सरकारी विद्यालय इतने ताकतवर बनाने चाहिए की अभिभावकों को निजी विद्यालयों की तरफ देखने की आवश्यकता ही ना पड़े।
ऐसा करना ही होगा।
नहीं किया तो ," एक ल्व्य" महाभारत  के पन्नों से बाहर निकल आयेगा।परंतु इस बार वो अंगूठा देगा नहीं।अपने भयंकर बाणों से समाज के सीने को छलनी करेगा।
सामने  देखो ,इस बार एकलव्य के बाणों से सारा समाज भीष्म की तरह शर सैया पर लहूलुहान पड़ा है।इच्छा मृत्यु के श्राप से ना तो मर ही सकता है ना अपने शरीर के घावों पर मरहम लगा सकता है।
सचिन ठाकुर,
प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,
राजकीय बाल विद्यालय धरमशाला की फेसबुक वाल

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