Friday, 7 January 2022

तंद्रा

 तंद्रा:

शाम हो चुकी थी।पानी की टंकी में पानी भरा के नहीं देखने छत पर चढ़ आया था।टंकी भरने के इंतजार में पास रखे झूले पर सवार हो लिया।

सफेद गुरबाबियों के झुंड मेरी छत पर अठखेलियां कर रहे थे।हर शाम ये ऐसा ही करते हैं।फिर गायब हो जाते हैं।प्रवासी पक्षी हैं, दूर देश से आते हैं।कुछ हमेशा के लिए यहीं रह जाते हैं।झूले के ऊपर फाइबर की शीट है तो उनकी अटखेलियों को देखने झूले से उठ खड़ा हुआ ।आसमान की ओर देखते हुए आगे बढ़ा ।पानी की टंकी के नीचे रखे लोहे के स्टैंड में पांव फंसा  और सिर टंकी से जा टकराया। मैं फर्श पर गिर पड़ा ।

हल्की आंखे खुली तो पुतलियां चौड़ी हो गई।कुछ आसमान से उतर रहा था।सफेद प्रकाश लिए जैसे हजार वॉट के एलईडी बल्ब एक साथ जल रहे हों।नजर उधर गई तो पुतलियां सिकुड़ गई। भारी प्रकाश ।काले घोड़े।चोपड़ा साहब के महाभारत का कोई दृश्य टीवी से बाहर आ गया हो जैसे।धुन भी वही बज रही थी ।याद है न वो धुन जो ऐसे दृश्यों को दिव्य बनाने में चोपड़ा साहब के महाभारत सीरियल में बैकग्राउंड में बजाई जाती थी।

रथ बिलकुल चेहरे के सामने था।मैने देखा एक दिव्य पुरुष सोने का मुकुट धारे ,भगवा कपड़े पहने और स्वर्ण आभूषणों से लदा मेरी तरफ बड़ी ही रहस्यमई मुस्कान बिखेरे कुटिल नजरों से देख रहा है।

इस से पहले की चोपड़ा साहब के महाभारत वाली नमस्कार करने की मुद्रा में मेरे  हाथ आपस में जुड़ते दिव्य पुरुष व्यंग्यात्मक टोन में बोल पड़े," और भई, कुटिल दुष्ट अध्यापक.... पहचाना।"

मेरा सिर ना में दाएं बाएं हुआ।

" मैं ज्ञान हूं। तू उन्ही दुष्ट अध्यापकों में से एक है ना जो मेरी बहन का घर तोड़ने की हर कोशिश में लगे रहते हैं।क्या तकलीफ है तुझे और तेरे जैसों को मेरी बहन और जीजा से।"  दिव्य पुरुष ने रौद्र डायलॉग मारा।

मेरी घिग्गी बंध गई थी।बड़ी मुश्किल से शब्द मुंह से निकले ," आपकी बहन कौन,जीजा कौन... मैं क्यों तोडूंगा उनका घर..."

" दुष्ट अध्यापक ,सरकारी अध्यापक ,फालतू की मेहनत करने वाले अध्यापक.... मेरी बहन का नाम है " विद्या" और उसकी शादी मैने बड़ी धूम धाम से करवाई है " धन" से।। और तू और तेरे जैसे जब देखो उनका घर तोड़ने की जुगत में लगे रहते।।दुर्वासा नहीं हूं वर्ना श्राप देता।"

"ओह" मुझे थोड़ी हिम्मत आई," ज्ञान महाराज ,मेरी छत पर स्वागत है आपका।आओ मेरे झूले का आनंद लो। कोक और भुनी मूंगफलियां ले के आता हूं।उनका आनंद लो।स्याह होते दिन का, गुरबाबियो की अटखेलियों आनंद लो।"

ज्ञान मुस्कुराया,बोला," ना तेरे जैसे अध्यापकों के घर नहीं बैठूंगा। तुम दुष्ट लोग हो।"

मैं भी फॉर्म में आ गया।" अच्छा ज्ञान महाराज ये क्या रूप धरा है आपने। रथ,काले घोड़े,स्वर्ण मुकुट,स्वर्ण आभूषण ... लेटेस्ट फैशन लेते।।जींस और शर्ट पहन लेते ।सिर पे यो यो हनी सिंह वाली कैप लगा लेते। ऑडी में बैठ कर आते।नई पीढ़ी भी आपसे इंप्रेस होती।और ये भगवा रंग के कपड़े तो बिलकुल समझ नहीं आए।"

ज्ञान मुस्कुरा के बोला," आजकल तेरे जैसों को इसी रंग के कपड़ों में मिलता हूं।बाकी जगह हरे ,सफेद कपड़े भी पहन लेता।।भूल गया तू।जब तू विश्वविद्यालय में था तुझे लाल रंग के कपड़ों में भी मिला था मैं .. "

मैने दोनो हाथ जोड़े," प्रभु ,इस कदर क्रोध न कीजिए।आपकी बहन और जीजा से कोई द्वेष नहीं।बहन तक पहुंच हर बच्चे की होनी चाहिए थी पर आपके जीजा आपकी बहन को ले बैंक में जा कर छुप गए हैं।अब बताओ बच्चे कैसे पहुंचे उन तक।। "

" तो तुझे क्या?बाकियों की तरह तू भी खेल देख।बैंक के अकाउंट होल्डर खरीद रहे तेरे स्कूलों को धीरे धीरे।देखा नहीं कुछ प्रदेशों में।अरे , वहां नहीं गया तो मंडी के गर्ल्स और बॉयज स्कूल को देख लेता।खुदवा दिए ना जीजा जी के मित्रों ने ।औरों की तरह तू भी चुप हो जा।नहीं तो जीजा जी के मित्र तुझे चुप करवाना जानते ही हैं।लगा आया ना फेरा पुलिस स्टेशन का धर्मशाला में। " ज्ञान ने विजई मुस्कान के साथ वर्तमान गीता सार मेरे कानो में धरा।

" कोई बात नहीं।फांसी तो नहीं हुई न अभी।।जब तक जिंदा हैं तब तक समाज के आखिरी बच्चे की विद्या तक पहुंच के लिए संघर्ष करते रहेंगे।" मैने भी पूरा जोर लगा कर अपना पक्ष रखा।

" हाहा,, मूर्ख और कायर है तू कुटिल अध्यापक।अपने स्कूल की बिल्डिंग तक को तो बचा नहीं पाया तू।भाषण झाड़ता है संघर्ष की।सुनता है तेरी कोई।तू फेसबुकिया लेखक।पढ़ता है कोई तुझे। मर गया तू टर्म एग्जाम के घाटे गिनाते गिनाते।तेरी एसोसिएशन बोर्ड गई और सर सहमति में झुका के आ गई।पूरा साल स्कूल नी लगे और प्रैक्टिकल एग्जाम भी हो गए।क्यों नी करवाए तूने ऑनलाइन प्रैक्टिकल।। " ज्ञान ने मेरा तिरस्कार किया।

मैंने भी बहस में अपने आहुति डाली, " स्कूल की बिल्डिंग सरकार ने दी।जिसको दी वो पार्किंग नहीं ,विश्वविद्यालय चलाते हैं।शिक्षा ही देंगे।रही बात प्रैक्टिकल की तो ऑनलाइन कैसे करवाने प्रैक्टिकल... "

ज्ञान अब तिरस्कार की मात्रा को बढ़ा रहा था," तेरे स्कूल की बिल्डिंग में कोई शिक्षा नी दी जाएगी।।बाबू बैठ कर हिसाब किताब करेंगे।तू तो बड़ी डींगे मारता था की अटल टिंकरिंग लैब बनेगी,रोबोटिक्स की लैब बनेगी। बनना तो दूर आई टी ,आई सी टी ,ऑटोमोबाइल लैब,कंप्यूटर साइंस लैब और कक्षा के कमरे भी गए।।अब लगाना क्लास ग्राउंड में।और ये बता।।बाकियों ने नी लिए प्रैक्टिकल ।उन्होंने ने भी तो ऑनलाइन करवाए होने प्रैक्टिकल।तू नी आया स्कूल ,बच्चे नी आए तो वो भी नी आए होने।और समझ।।हिमाचल शिक्षा बोर्ड दुनिया का पहला ऐसा धांसू बोर्ड बन गया जो साल में दो बार प्रैक्टिकल एग्जाम लेगा।सी बी एस सी से नी हुआ ,आई सी एस सी से नी हुआ।कॉलेज वालो से नी हुआ न हिमाचल विश्व विद्यालय से।बोर्ड ने कर दिखाया।तू बजा बैठ के बाजा।करता रह बड़ी बड़ी फिलोसॉफिकल बातें।जीजा जी के मित्र धीरे धीरे एक एक स्कूल,स्कूल की एक एक इंच जमीन को कबजाते जायेंगे।"

मैने संकोच से जवाब दिया," कोई बात नहीं।हर समाज में ऐसे दौर आते रहते।शोषण के विरुद्ध संघर्ष शास्वत है।जब इस व्यवस्था से समाज घृणा करने लगेगा तो इसे जड़ समेत उखाड़ फेंकेगा। "

" हाह ... तू और तेरे हसीन सपने।मूर्ख मत बन।बंद कर ये स्कूल में मुफ्त में पढ़ाना।शाम को ट्यूशन पढ़ाया कर।कितने लोग तुझे एक बार सिलेबस करवाने के लिए 20 हजार रुपए देने का ऑफर देते।50 बच्चे भी पढ़ाए तो दस लाख हुए।।मजे कर।" ज्ञान ने अपना ज्ञान दिया।

" नहीं ,ये मुझसे न होगा।शिक्षक सरस्वती का हंस दिखना चाहिए।।ये लक्ष्मी का उल्लू मुझसे न बना जायेगा।" मैने भी दृढ़ता से जवाब दिया।

तभी एक और चमत्कार घटा। आकाश से एक और रथ हमारी तरफ आता दिखाई दिया।सफेद घोड़े।दिव्य प्रकाश। रथ में बैठा दिव्य पुरुष ।मैने देखा कपड़ों पर उतने ही रंग थे जितने मेरे मोबाइल की स्क्रीन पर बन सकते हैं।कोई 65 हजार।

जैसे जैसे वो रथ पास आता गया ज्ञान का चेहरा मुरझाता गया।अब वो रथ बिलकुल पास आ गया था।मैने देखा ज्ञान का रथ भागने को तत्पर था।ज्ञान मेरी तरफ देखा,फिर दूसरे रथ की तरफ और फिर वहां से डर मिश्रित घबराहट के साथ लुप्त हो गया।

मैने देखा , उस दिव्य पुरुष को रथ से नीचे उतरते।हजारों बदलते रंगों के उसके परिधान पूरी प्रकृति को चित्रित कर रहे थे।

वो मेरे छत पर मेरे पास आए। मैं अभी भी फर्श पर गिरा हुआ था।अपने हाथों के स्पर्श से मेरा चेहरा ऊपर उठाया और अपनी जांघ का सहारा दे मेरा सिर सहलाया।जादुई आवाज में बोले," उठो पुत्र, मैं विज्ञान हूं..... मैं ही साहित्य हूं, मैं ही गद्य हूं मैं ही पद्य। घबराओ नहीं।बेशक काम मुश्किल है पर पूरी मानवता की बेहतरी के लिए करना तो पड़ेगा।विज्ञान का प्रकाश ही अचेतन को चेतन में बदलेगा।ठूंठ जड़ मानसिक ढांचों को तोड़ फेंकेगा। डरो नहीं।मेरे पुत्र न्यूटन को तो छे गुना छे के कमरे में कैद कर मार डाला था इन्होंने ।और भी कितनो को ।पर हम नहीं रुके।ना ही रुकेंगे।। अपना बेहतरीन काम जारी रखो।। उठो........ "

महसूस हुआ की आंखों की गरमी पर ठंडी बूंदे गिराई हो किसी ने।तपती पलकों पर पानी की बूंदे बरसाई हो किसी ने।

हड़बड़ा के आंखे खोली।।देखा पानी की टंकी भर गई थी।ओवर फ्लो हो रहा पानी मेरे चेहरे पर गिर रहा था। मैं फुर्ती से उठा।आसमान स्याह हो चुका था।तारे निकल आए थे।छत पर लगी सोलर चार्ज्ड लाइट्स अलग अलग रंगों की रोशनी बिखेर कमाल का दृश्य उत्पन्न कर रही थी।

रथ और ज्ञान, विज्ञान अभी दिमाग में ताजा थे। रथो की खोज में आंखे आसमान की और की। एलन मस्क के लो ऑर्बिट स्टेल्लाइट की ट्रेन छत के ऊपर से गुजर रही थी।अब इंटरनेट हर जगह उपलब्ध होगा।हर जानकारी हर जगह विद्यमान होगी।झूठ कैसे बोलोगे।बोला तो सामने वाला इंटरनेट से सच खंगाल लेगा।यही तो सतयुग है।तो अब कलयुग समाप्ति की ओर और स्तयुग का आरंभ ।।

पर सतयुग को बनाए रखने के लिए विद्या हर बच्चे तक पहुंचानी ही होगी।।

हर पीढ़ी के हर बच्चे तक।

मैं पानी की टंकी के व्हील बंद कर के थोड़ी देर आसमान को ताकता रहा,तब तक जब तक सैटेलाइट ट्रेन सामने धौलाधार पर्वत के पीछे जा कर छुप नहीं गई।

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता : भौतिक शास्त्र,

राजकीय बाल विद्यालय धर्मशाला की फेसबुक वाल

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