Saturday, 23 November 2024

स्टाफ रूम


 स्टाफ रूम :

पिछले साल मैं दिल्ली गया था। डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के तत्वाधान स्टेट रिसोर्स सेंटर और ज्ञान विज्ञान समिति द्वारा  ट्राइबल क्षेत्रों के छात्रों में विज्ञान विषय के प्रति रुचि उत्पन्न करने हेतु  विज्ञान मेलों का आयोजन करने हेतु राष्ट्रीय स्तर की वर्कशॉप थी।

दिल्ली के कुछ सरकारी विद्यालयों में जाने का मौका मिला।

शिक्षक होने के नाते मैं इस बात को पूरी जिम्मेदारी से कह सकता हूं कि ये विद्यालय उत्कृष्ट हैं।शानदार क्लासरूम,बेहतरीन मैदान,जबरदस्त इंफ्रास्ट्रक्चर।।काबिल अध्यापक और बेहतरीन प्रधानाचार्य जिन्हें विशेष प्रशिक्षण हेतु सिंगापुर और अन्य देशों में भेजा गया था। विद्यालय में इन बिल्ट जिम और यहां तक कि कई विद्यालयों में स्विमिंग पूल तक उपलब्ध हैं।

प्रधानाचार्य कक्ष शायद मंत्रालयों में मंत्रियों के कक्षों से भी ज्यादा सुंदर हैं।टॉयलेट्स चकाचक और सफाई व्यवस्था लाजवाब।

एक दो विद्यालयों के स्टाफ रूम भी देखे।सारे एक ही पैटर्न पर बनाए गए हैं।हर शिक्षक को एक छोटा चेंबर दिया गया है जिन्हे एक बड़े लंबे टेबल का पार्टीशन कर के बनाया गया है। चैंबर में चार्जिंग प्वाइंट दिया गया है जिसमें आप मोबाइल ,लैपटॉप चार्ज कर सकते हैं और अपने इलेक्ट्रिक टिफिन में खाना गर्म कर सकते हैं।चैंबर में एक रिवॉल्विंग चेयर है, कॉपियां किताबे रखने की जगह है और नीचे को ड्रॉअर हैं जिनमें आप अपना पर्स या अन्य सामान रख सकते हैं। चार गुना चार के ये चैंबर आपको लेक्चर तैयार करने,बच्चों की कॉपियां चेक करने, लैपटॉप पर पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन तैयार करने में सहायता करते हैं साथ ही आपको निजता भी उपलब्ध करवाते हैं। सारा स्टाफ पुरुष हो या स्त्री एक ही कमरे में अपने अपने चैंबर में बैठते हैं।स्टाफ रूम में पानी के लिए आर ओ फिल्टर और कॉफ़ी बनाने की मशीन तक उपलब्ध करवाई गई है।एक पियोन भी स्टाफ रूम के पास तैनात किया गया है।

हमारे भ्रमण के दौरान जितने भी शिक्षक और शिक्षिकाएं स्टाफ रूम में थे सब अपने अपने चैंबर में अपने काम में व्यस्त थे।कोई पीपीटी बना रहा था,कोई कॉपी चेक कर रहा था,कोई असाइनमेंट चेक कर रहा था तो कोई पढ़ाई कर रहा था।छात्रों का स्टाफ रूम में जाना लगभग निषेध है।मजेदार बात ये है कि कई घंटे वहां गुजरने के बाद स्टाफ रूम में कोई शिक्षक या शिक्षिका आपस में गप्पे मारते नजर नहीं आए।स्टाफ रूम कैमरे कि सख्त निगरानी में हैं।स्टाफ रूम के साथ जुड़े हुए पुरुष और महिला शिक्षकों के लिए अलग अलग टॉयलेट्स बने हुए हैं।

जिन शिक्षकों से हमने बात की वो स्टाफ रूम से बाहर आ के ही बात कर पाए।इतनी खामोशी तो हमारे यहां लाइब्रेरी में नहीं होती।

शायद इसीलिए दिल्ली के सरकारी स्कूल इतना बेहतरीन कार्य कर पा रहे हैं।चार पांच साल पहले न्यूज चैनल ऑन करने पर एक घंटे के न्यूज बुलेटिन में दस मिनट दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की बेतहाशा बढ़ती फीस के विरूद्ध पैरंट्स की हड़ताल की खबरे होती थी।अब वो नामी गिरामी प्राइवेट स्कूल बन्द होने के कगार पर पहुंच गए हैं।दिल्ली सरकार ,विशेष कर तत्कालीन शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया को साधुवाद।

अब आते हैं अपने सरकारी स्कूलों के स्टाफ रूम पर।  एस एस ए के आंकड़े बताते हैं कि 40% विद्यालयों में स्टाफ रूम बनाने लायक कमरे ही नहीं है।जिन 60 % स्कूलों में स्टाफ रूम उपलब्ध हैं उनमें से 47 % स्कूलों में एक छोटे कमरे को स्टाफ रूम बनाया गया है जिसमें बमुश्किल 10 से 15 कुर्सियां और एक दो टेबल रखे गए हैं।कमरों के हालात पशुशाला से ज्यादा अच्छे नहीं हैं।कहीं सीलन है ,जलिया दरवाजे नहीं है ,पेंट का तो छोड़ दो।शिक्षक जिसकी कक्षा नहीं है वो आके थोड़ी देर कुर्सी पर बैठ कर आराम करता है।पंखे अथवा हीटर की कोई सुविधा नहीं है।पीने के पानी हेतु प्रधानाचार्य के कमरे के बाहर दो बाल्टियां है जिसे पीने के लिए सेवादार की दया आवश्यक है।

बाकी बचे 13 ‰ बड़े स्कूल तो यहां स्टाफ रूम बनाने लायक बड़े कमरे हैं।कमरों में शिक्षकों हेतु लॉकर उपलब्ध हैं जिनमें शिक्षक अपनी किताबें या कोई छोटा मोटा सामान रख सकता है।कमरे में एक बड़ा टेबल लगाया गया है जिसके दोनों तरफ कुर्सियां लगाई गई हैं ताकि शिक्षक अपना काम कर सके।

परंतु निजता की कोई व्यवस्था नहीं है।इसी कारण ये कमरे काम करने,अध्ययन करने लायक कतई नहीं रहते।पढ़ने,लेक्चर त्यार करने ,पीपीटी बनाने या कॉपी चेक करने लायक माहौल इन कमरों में बनता ही नहीं है।फिर भी यदि पुरुष शिक्षक और महिला शिक्षक एक ही कमरे में हैं तो हलकी गप शप के साथ माहौल हलका रहता है जिसमें शिक्षक सरकारों की आलोचना के साथ अपने बच्चों अथवा परिवारों के बारे में गप्पे मार लेते हैं।प्रधानाचार्य की आलोचना ,डिपार्टमेंट को गालियां देना और बच्चों के व्यवहार पर टिप्पणियां इन्हीं स्टाफ रूम की खासियत होती है।

कुछ बड़े विद्यालयों में पुरुष और महिला शिक्षकों हेतु अलग अलग कमरों का भी जुगाड हो जाता।कमरे की व्यवस्था आम तौर पर वहीं होती,एक बड़ा टेबल और उसके दोनों तरफ कुर्सियां।

पुरुषों का स्टाफ रूम आम तौर पर राजनेतिक बहसबाजी का मुख्य अड्डा होता है।गलती से अगर कुछ शिक्षक दक्षिण पंथी हुए और कुछ वामपंथी हुए तब तो हालात भारतीय संसद से ज्यादा घातक होते हैं।अपने अपने नेता के गुणगान और दूसरे के नेता का चीरहरण प्रमुख वार्तालाप होता है।लेकिन अमूनन राजनेतिक कटाक्ष के बावजूद सभी पुरुष शिक्षक एक साथ खाना खाना पसंद करते हैं। पुराने समय में बीड़ी पीना,सिगरेट फूंकना इन स्टाफ रूम की गुप्त योजना होती थी और कई बार छुट्टी के बाद दारू की बोतलें और चिकन भी यहां पर मिल जाता था।शिक्षक चेस भी खेल लेते हैं।

हालांकि अब समय तेजी से बदल रहा परन्तु जब स्मार्ट फोन नए नए आए थे तब एक दूसरे के फोन से हर तरह की वीडियो   क्लिप्स लेना ,  इलाके की महिलाओं के बारे में रिपोर्ट कार्ड तैयार करना,शादी में कितनी दारू की बोतल गटकी और उसके बाद के कारनामों की शेखिया इन कमरों की शान होती थी।पुरुष शिक्षक आम तौर पर गॉसिप एन्जॉय नहीं करते।

महिला स्टाफ रूम दुनिया की सबसे ख़तरनाक जगह होते हैं।महिलाओं का गॉसिप एन्जॉय करना उनकी बेसिक नेचर है।महिला स्टाफ रूम में आम तौर पर प्रिंसिपल और पुरुष शिक्षकों को लेकर कमाल कि परिचर्चा होती है।पुरुष शिक्षक कम बात करे तो अकडू और ऐटिट्यूड वाला, ज्यादा  बात करे तो  चिपकू या फुकरा।अच्छे कपडे पहने तो ठरकी,  बुरे कपड़े पहने तो बेकार बीवी वाला।कुछ महा फ्रस्टेटेड महिला शिक्षक जो अपने पतिं की ओछी हरकतों से घर में परेशान होती हैं वो अपने सहयोगी शिक्षकों को चरित्र प्रमाण पत्र बांटती रहती हैं ।वो उनको अपने पति के सम कक्ष खड़ा करने के प्रयास में भौंडी कहानियां घड़ेंगी और फिर अपनी फ्रस्ट्रेशन को शांत करने को सभी पुरूषों के एक जैसा होने का सर्टिफिकेट जारी करेंगी।कुछ महिला शिक्षक अपनी ही साथी महिला शिक्षक के चरित्र पर भी सर्टिफिकेट इश्यू करती मिल जाएंगी।मजेदार बात ये है कि एक महिला शिक्षक जिसने अभी किसी को चरित्र प्रमाण पत्र जारी किया था,उसके कमरे से जाने के बाद बाकी बची हुई महिला शिक्षक उसके चरित्र पर पानी भर भर कर चर्चा करती है।हालांकि कुछ बुद्धिमान शीक्षिकाएं गॉसिप से कोसो दूर रहती हैं और बाकी शिक्षकियाओ को भी समझती रहती की ऐसे टेबल पर चर्चा में हिस्सा मत लिया करो जहां से उठने के बाद आप पर ही चर्चा आरम्भ हो जाए।महिला स्टाफ रूम में खाने पीने का पूरा जुगाड होता।चाय,बिस्किट,समोसे,मूंगफली, रेवड़ी ,गच्चकऔर कई बार गलगल खट्टे जैसे विशुद्ध उत्पाद इभी यहां प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते हैं।

अपनी सास की बुराई, अपने बच्चों की तारीफ और दूसरे के बच्चों कि बुराई,कपड़ों की ओलाइन शॉपिंग,गहनों की चर्चा,गुपचुप तरीके से मेंहदी लगवाना अन्य पसंदीदा मुद्दे हैं।

मेरे पिछले एक स्कूल में महिला अध्यापकों की आपस में खटपट थी।

खटपट का नतीजा ये हुआ कि कुछ महिला अध्यापकों ने एक कमरे पर कब्जा कर लिया ,दूसरे ग्रुप ने वोकेशनल लैब में डेरा बना लिया तो कुछ ने लाइब्रेरी में।

कुछ महिला अध्यापक जो किसी भी ग्रुप में फिट नहीं हुई उन्होंने मुझ से आई सी टी लैब की चाबी ले ली ये कह कर की एडमिशन विथड्रावल रजिस्टर,रिजल्ट बनाने का काम करना है।धीरे धीरे उन्होंने आई सी टी लैब को खाने पीने ,अपना सामान रखने और आराम करने का कमरा बना लिया।अब ये तो गनीमत है कि स्कूल के पास आई सी टी लैब के अलावा मॉडर्न कंप्यूटर लैब थी जहां आई टी शिक्षक अपने प्रैक्टिकल्स करवा रहे थे ,वरना हो ली थी आई टी एजुकेशन की पढ़ाई।

बेचारे पुराने कंप्यूटर पहले धूल फांक रहे थे ,अब दाल , भात, सब्जी और फलों के बीज/छिलके खा रहे हैं।

ईमानदारी से बता रहा हूं ,मैने महिला शिक्षकों को कुर्सी के पीछे लड़ते हुए भी देखा है कि ये कुर्सी मेरी है ,तुम इस पर कैसे बैठ गई।


समस्या ये है कि हमारे सरकारी स्कूल स्टाफ रूम की वास्तविक अवधारणा से कोसो दूर हैं।शिक्षा विभाग में अधिकारी स्तर से ले कर प्रधानाचार्य स्तर तक इन मूलभूत आवश्यकताओं के बारे में सोचने की न किसी को फुर्सत है न आवश्यकता।

 इन स्टाफ रूमज में ना तो चिंतन है,ना अध्य्ययन है,ना बच्चों की ग्रोथ को लेकर कोई परिचर्चा है।ना तो टीचिंग लरनिंग मटेरियल को बनाने की कोई अभिलाष है,ना ही कक्षा में अपने लेक्चर को उत्साह वर्धक बनाने का कोई टोटका।सबसे बड़ी समस्या निजता की है जिसके कारण शिक्षक अपने विषय पर ध्यान ही नहीं दे पाता।

यही कारण है कि अधिकांश शिक्षक अध्ययन से कोसों दूर हैं।हिंदी अखबार पर सरसरी नजर मारने के आलावा वो और कुछ नहीं पड़ते।

किसी भी शिक्षक से पूछिएगा कि  आपने अपने पिछले  एक साल कि तनख्वाह से  कितना पैसा किताबें खरीदने के लिए खर्च किया। मैं शर्त लगाता हूं ,नब्बे प्रतिशत शिक्षक शून्य जवाब देंगे।

स्टाफ रूम किसी भी विद्यालय का सबसे महत्वपूर्ण कक्ष है।सरकार को बेहतरीन सुविधाओं से परिपूर्ण ,कम से कम दिल्ली के सरकारी विद्यालयों के स्टाफ रूम के बराबर ,स्टाफ रूम बनाने हेतु पहल करनी चाहिए।हर प्रधानाचार्य को भी कोशिश करनी चाहिए कि वो अपने शिक्षकों में निजता उत्पन्न करते हुए ऐसे स्टाफ रूम के निर्माण हेतु अपने फंड मैनेज करें।हर अध्यापक के पास कम से एक छोटा चैंबर हो जहां वो अध्ययन कर सके,कॉपीज चेक कर सके,टीचर लर्निंग मटेरियल, पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन बना सके और विद्यालय के अन्य कार्य कर सके।अध्यापक को निजता मिले और वो वाहियात चर्चाओं से बचा रहे।

 विद्यालयों में बच्चे अध्ययन करने भेजे जाते हैं।शिक्षक अगर खुद ज्ञान से भरा होगा,बेहतरीन मानसिक अवस्था में होगा तो निसंदेह बेहतरीन शिक्षा का रस कक्षाओं में बरसाएगा।सरकारी शिक्षण संस्थानों में गुण वत्ता को कई गुना बढ़ाएगा।

अन्यथा ,वो गॉसिप और बहस में बिजी है।गॉसिप और बहस मानसिक अवसाद को जनम देते हैं।मानसिक अवसाद से भरा शिक्षक कक्षा में जा कर पढ़ा ही नहीं सकता।ये अवसाद घर तक पहुंचे तो घर का माहौल भी खराब होता।

हर शिक्षक को याद रखना चाहिए कि किसी को भी आपके चरित्र प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है।आप दूसरों पर उंगली तभी उठाते हैं जब उन तक पहुंचने कि औकात आपकी नहीं होती।इसलिए अपने आप को कमजोर और कुंठित प्रदर्शित मत करो।

एक अच्छे,निजता से भरे स्टाफ रूम का सीधा संबंध शिक्षक को बेहतरीन वातावरण प्रदान करने से है।

कसम अपने अध्यापन की ,अगर शिक्षक को अच्छा वातावरण मिले तो एक निकम्मा अध्यापक अच्छे शिक्षक में परिवर्तित होता,एक अच्छा शिक्षक उत्कृष्ट अध्यापक में।और अच्छा वातावरण न मिले तो उत्कृष्ट अध्यापक अच्छे में और अच्छा शिक्षक निकम्मे शिक्षक में परिवर्तित हो जाता।


दुनिया में तीन ही तरह के दिमाग होते हैं।

पहले  बेहतर दिमाग जो आईडिया डिस्कस करते हैं,जैसे अलबर्ट आइंस्टीन ,स्टीफन हॉकिंग या कार्ल मार्क्स।

दूसरे ,मध्यम दर्जे के दिमाग जो इवेंट डिस्कस करते हैं जैसे सरकार की इकोनोमिक पॉलिसी या फौरन पॉलिसी।

तीसरे तरह के दिमाग को तुच्छ दिमाग कहते हैं।ये वो दिमाग हैं जो लोगों को डिस्कस करते हैं,जैसे उस महिला का चरित्र खराब है या उस पुरुष का टांका वहां भीडा हुआ है।

शिक्षक कम से कम पहले दो दरजों के दिमाग वाला होना चाहिए।

उम्मीद है एक बेहतरीन स्टाफ रूम और उसका उत्कृष्ट वातावरण आपको इन दोनों दरजो तक पहुंचाने में सक्षम होगा।

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,

राजकीय उच्च शिक्षा विभाग,

हिमाचल सरकार