Friday, 13 September 2024

हे गणेशा:


 हे गणेशा:

दृश्य कमाल का है।

शाम गहरा रही है।बरसात लगभग धौलाधार को आलिंगन दे रुखसत होने को त्यार है।अब वो काले बादलों को छोड़, सुर्ख सफेद रंग के बादलों पर सवार है, वो भी कुपोषित बादल।ढलते सूरज के असर से लालिमा है तो सही पर मद्धम ।

मैं ऐसे ही घर से निकल आया अकेला ,कानों में माइक्रोफोन घुसेड़ और चित्रा सिंह की गजल ," कांटो की चुभन पाई,फूलों का मजा भी..." बजाते हुए।

आजकल घर से थोड़ी दूर फोर लेन पे चहल कदमी का मजा आता शाम को।फोर लेन के साथ निचली तरफ को सुंदर,नीले पानी वाली शांत सी खड्ड है।आई पी एच वालों का पंप हाउस भी जिसे बैठने ,घूमने के लिए भी विकसित किया गया है।अक्सर सयाह होती शाम को मैं यहां अकेला बैठ गजलें सुनना पसंद करता हूं।

आज भी वही किया।जा के पंप हाउस के खड्ड वाले किनारे पर पसर गया।

आज ,दिन में स्कूल में पढ़ा ही नहीं पाया था।मेरा स्कूल सड़क के बिल्कुल साथ है।मेरी लैब और क्लासरूम बिलकुल सड़क से सटे हुए।

गणेश विसर्जन चल रहा है आजकल। 

डीजे की धमा धम।

"तेरी आंखों का यो काजल,,, करे मेरे दिल को घायल.." तो कभी "ब्राजील...." के गानों पर कानफोडू शोर।उसपे दारू के नशे में धुत्त नृत्य करते युवा।बेहिसाब रंग एक दूसरे पर डाल नाचती महिलाएं और बच्चियां।एक गाड़ी पर विराजे गणेश,दूसरी गाड़ी पर 10,000 वॉट का डीजे,फिर तीसरी ट्रॉली पर डीजे के गानों पर नाचते भक्त और भक्तनियां।सड़क से गुजरते वाहनों को रोक,पूरा रोड जाम लगा, प्रसाद खिलाते लोग ।

पढ़ा लिया मैने और पढ़ लिया मेरे चेलों ने।

आज दृश्य अलग था।रोज खड्ड में पानी की लहरियां कभी नीले से सफेद तो कभी सफेद से नीली हो आसमान के लाल रंग से लड़ाई करती नजर आती हैं।सर्दी के मौसम में सामने धौलाधार की सफेदी उस लड़ाई में एक और रंग भरती हैं।

आज खड्ड में कहीं गणेश का सिर तैर रहा था,कहीं मुकुट।कहीं टूटी हुई बाजू तो कहीं टांगे पानी के बहाव से बचने को पत्थर से ओट मांग अपने वजूद को बचाने की जद्दोजहद में लगी थी।

मैं क्षुब्ध सा पानी की धार और गणेश की टूटी हुई टांग के बीच चल रहे संघर्ष को टकटकी लगाए देख रहा था।

"क्यों, मजा आ रहा है पुत्र,,इंतजार कर रहे हो की कब पानी का बहाव मेरी टांग को जर्जर कर के बहा ले जाए...." मेरे कानो में भारी ,बेहद भारी,दर्द से कराह रही आवाज गूंज उठी। 

मैने माइक्रोफोन कान से निकाला।आजू बाजू,आगे पीछे देखा।कोई नहीं था।

मोबाइल चेक करा।स्पोटिफाई पर चित्रा सिंह की गजल ही बज रही थी।फिर ये आवाज कहां से आई।

" यहां देखो पुत्र,मेरी तरफ,मेरी टूटी हुई गर्दन की तरफ..." भारी,बेहद भारी, कराह की आवाज फिर मेरे कानो से टकराई।

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। आस पास कोई न था।शाम लगभग स्याह थी।पीछे पंप हाउस की लाइट अभी ऑन नहीं हुई थी,मतलब चौकीदार अभी ड्यूटी पर नहीं आया था। मैं भागने को हुआ।पर कमाल के मेरे पैर जैसे जड़ हो गए।दिमाग हुकम दे रहा था पैरों को की भागो।परंतु वो अपना मालिक बदल चुके थे शायद,हुकम की तालीम कतई न करें।

अपने को लाचार पा मैने गणेश की धड़ से अलग हुई गर्दन,आधी बची हुई सूंड आधे कान वाले चेहरे की तरफ नजर दी।गणेश के लथपथ चेहरे से रंग निकल कर पानी में घुले जा रहे थे।

मैने गौर से देखा की वो रंग पानी से नहीं उधड़े थे,वो गणेश की आंखों से बहते आंसुओं से झड़ रहे थे।

" यहां आओ पुत्र,यहां मेरे पास..." गणेश के मुख से शब्द उच्चारित हुए।

अब मैं डरा नहीं।

पूरा नास्तिक हूं..एक दम पक्का।इसलिए कोई ईश्वर मेरे आराध्य है ही नहीं।

पर गणेश के चरित्र से बेहद प्यार है मुझे।मेरे घर आओ कभी।गणेश की भिन्न भिन्न तरह की मूर्तियां भरी पढ़ी हैं पूरे घर में।ड्राइंग रूम से ले बेड रूम तक।

मेरे पैर खुद ब खुद उठे और वीरान खड्ड में पड़े गणेश के टूटे फूटे सिर के पास जम गए।

"सहारा दो पुत्र...सीधा करो मेरे जीर्ण सिर को.." गणेश की दर्द से कराहती आवाज मेरे सीने को बींध गई।

मैने हाथों से गणेश के सिर को सीधा किया।

"साधुवाद ,पुत्र... मुझे लगा आज की रात ऐसे ही जर्जर होने में गुजर जायेगी..." गणेश का सिर फिर कहराया।

मैं बिना पलक झपकाए गणेश के सिर को देख रहा था।

"तुम इंसान ,हो कमाल के पुत्र।।दस दिन पहले मुझे दुकान से खरीदा।फिर सजाया,संवारा,स्थापना की।फिर मेरी पूजा की,मुझे गाड़ियों में घुमाया फिराया।मैने "डीजे वाले बाबा मेरा गाना बजा दे.." जैसे गाने भी सुने।इतने दिन भक्तों की पूजा से मैं प्रसन्न था।मोदक भी खिलाए,केले भी। पर आज ठगा हुआ महसूस कर रहा हूं।ऐसा कोई करता है क्या।दो घंटे पहले मेरा घर था,भोजन था,भक्त थे...और अब न घर बचा ,ना भोजन न भक्त..यहां फेंक गए मुझको,टूटने फूटने को।...देखो वो मेरा हाथ कल तक आशीर्वाद देता था सबको,आज किसी का आशीर्वाद ढूंढ रहा है पानी के बहाव से बचने को।वो देखो मेरी टांगे,मेरा पांव ,कल तक शीश झुकाते थे सब,अब कोई सिर झुका के बचा ले इनको।..." दर्द से कराहते गणेश ने बेचारगी से मेरी नजर से नजर मिलाई।

मैं अवाक सा गणेश के सिर को थामे बैठा था।

" हे गणेश,आपको क्रोध नहीं आता ऐसे लोगों पर जो इतने दिन आपको घर में विराजते,लोगों को घर बुला दान दक्षिणा लेते,सुभा शाम कीर्तन करते  सिर्फ इसलिए के उनके काम काज में आप विघ्नहर्ता बने रहें।जब वो काम हो गया तो फिर आपको यहां फेंक देते..." मेरे मुंह से कर्कश स्वर निकले।

" नहीं पुत्र,अब नहीं।मेरा तो जीवन ही कष्ट में रहा।छोटा था तो पिता ने सिर काट दिया।ईश्वर हैं।चाहते तो वही सिर धड़ पर जोड कर पुनः जीवन दे सकते थे।परंतु नहीं।हाथी का सिर काट कर मेरे धड़ से  जोड़ा और फिर मेरी चेतना को हाथी के सिर में प्रस्थापित कर दिया।कुछ बड़ा हुआ तो परशुराम ने एक दांत तोड़ दिया।कितने वर्षों तक दर्द से कराहता रहा।

फिर अध्ययन किया,हर विषय पर विजय पाई।ब्रह्मांड की सारी बुद्धिमता हासिल की।इसीलिए सर्वत्र पूजा जाता हूं,सबसे पहले पूजा जाता हूं।

" गणेश ने भर्राई आवाज से उत्तर दिया।

"परंतु ये कैसा वर्णन है आपका गणेश,की पचास किलो के बच्चे के सिर पर पांच सौ किलो के हाथी का सिर लगा उसे 50 ग्राम के चूहे पर बिठा दिया।ये तो उस बुद्धिमता का उपहास है जो आपने दुर्लभ अध्ययन करने हासिल की थी..." मैने अपना प्रश्न साधा।

"नहीं पुत्र,ऐसा नहीं है।तुम्हारे पूर्वजों के कहने का अंदाज अलग है।गणेश का अर्थ है बुद्धिमता,और चूहे का अर्थ है विषम परिस्थितियों को काटना।बुद्धिमता से ही विषम परिस्थितियों को काटा जा सकता है.." गणेश के सिर ने दर्द में हल्की मुस्कुराहट बिखेरने की कोशिश की।

" ओह,परंतु हे गणेश,ये गणेश विसर्जन का रिवाज है क्या,आया कहां से।इसके पीछे का उद्देश्य है क्या,तर्क है क्या.."मैने एक और प्रश्न दागा।

"हे पुत्र, हुआ ऐसा था की छोटा भाई कार्तिकेय परिवार से रूठ कैलाश छोड़ दक्षिण भारत में स्थापित हो गया था।उसी से मिलने,और वापिस कैलाश ले चलने के लिए मैने दक्षिण भारत में दस दिन तक डेरा जमाए रखा।परंतु कार्तिकेय नहीं माने और फिर मैं वापिस कैलाश आ गया" गणेश के क्षत विक्षित सिर से एक और आह निकली।

" ओह तो आप दस दिन तक दक्षिण भारत में रहे,दक्षिण भारतीय लोग ,खासकर महाराष्ट्र और उसके साथ लगते राज्य इसीलिए गणपति उत्सव मनाते हैं।इतिहास में पढ़ा है की महान मराठा शासक "शिवाजी" ने पूरे मराठा समाज को जोड़ने के लिए गणपति उत्सव मनाने को अनिवार्य किया।उसके बाद क्रांतिकारी स्वतंत्रता सेनानी बाल गंगा धर तिलक ने भी गणेश उत्सव के बहाने भारतीयों को एक जुट किया।चलो वो तो सही है परंतु हम तो उत्तर भारत में हैं।कैलाश भी उत्तर भारत में ।फिर उत्तर भारत में गणेश उत्सव मनाने का तुक क्या है?ना ही तो कोई पौराणिक कथा,ना ही कोई वजह।आप तो यहीं विराजमान थे..." मैने अपना ज्ञान और विज्ञान गणेश के सिर के आगे प्रस्तुत किया।

गणेश के टूटते फूटते और रंग उतरते सिर के होंठो पर हल्की मुस्कुराहट खिल आई।

मैं इस मुस्कुराहट का कारण समझ गया।

अंधेरा हो चला था। मैं अभी भी गणेश के जीर्ण होते सिर को थामे बैठा था।

अचानक गणेश का सिर दर्द से कराह उठा।मैने देखा की गणेश की सूंड सिर से टूट कर पानी में गिर गई।मेरे हाथों में मिट्टी अब चिकनी हो चली थी। मैं समझ गया कि गणेश का सिर अब और ज्यादा देर तक मेरे हाथों में रहेगा नहीं।

मैने देखा की गणेश की एक आंख बिलकुल निकल कर पानी में गिर गई।

अब बस कान के साथ वाला हिस्सा और टूटी सूंड के पीछे वाला मुंह बचा था।

" तुम जानते हो पुत्र ,की मेरा ये हाल क्यों हो रहा है??.." गणेश के जीर्ण होते जा रहे चेहरे ने आखिरी बार मुझे करुणा से देखा।

"नहीं गणेश..." मैने रूंधे गले और आंखों से निकल आ रहे आंसुओ को रोकते हुए कहा।।

" मैं गणेश हूं पुत्र,,तुम्हारी सारी विद्वता और बुद्धिमानी का प्रतिबिंब।।...... याद रखना... विद्वता और बुद्धिमानी पूजी निसंदेह सबसे पहली जायेगी परंतु समाज हर विद्वान और बुद्धिमान व्यक्ति को इसी तरह क्षत विक्षित कर जीर्ण होने के लिए छोड़ देगा....."गणेश के मुंह से आखिरी शब्द निकले और फिर मुंह मेरे हाथों से छिटक गया।

मेरे हाथों में अब सिर्फ मिट्टी थी।पानी से भरी हुई।लगभग काली होने वाली रात में मैं बस गणेश के सिर के अलग अलग होते टुकड़ों को पानी में बहते देख रहा था।मैने पानी में हाथ मारा की गणेश के सिर के कुछ हिस्से पकड़ उन्हे फिर से इकट्ठा करूं और कुछ देर और गणेश के साथ गुजर सकू।पर मेरे हाथ में जो हिस्सा आया,वो हाथ में आते ही मिट्टी बन गया।

गणेश के टूटे हुए हाथ और पांव पानी से लड़ने की जंग में हार गए थे।पत्थर की ओट उन्हें ज्यादा देर तक बचा नहीं पाई और वो काली होती रात में पत्थर से छिटक कर नीचे तराई की ओर बह चले।

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,

राजकीय उच्च शिक्षा विभाग,हिमाचल सरकार 

9418201289