Thursday, 18 January 2024

कपड़े

 कपड़े।।।

वट्स एप्प पर मैने शिक्षक नामक ग्रुप बनाया है ।इस ग्रुप में मेरे बेहतरीन प्राइमरी से लेकर विश्वविद्यालय के शिक्षक और जानकार प्रिंट ,वेब और टी वी पत्रकार मित्र शामिल हैं ।ग्रुप में आम तौर पर किसी न किसी ज्वलन्त विषय को लेकर सटीक विश्लेषण ,उम्दा बहस और कभी कभार भयंकर युद्ध जैसे हालात उतपन्न हो जाते हैं।

आज किसी शिक्षक मित्र ने शिक्षा विभाग द्वारा जारी शिक्षकों को साधारण कपड़ो में स्कूल आने की सलाह वाला पत्र इस ग्रुप में पोस्ट करा।मजेदार बात ये थी की जब मैंने इस पत्र को पढा उसी समय मैं अमेजॉन किंडल पर चम्पारण सत्याग्रह को पढ़ रहा था ।

चम्पारण सत्याग्रह निसन्देह मोहन दास कर्म चंद गांधी को राष्ट्र पिता महात्मा गांधी में परिवर्तित करने वाला पहला कदम था ।इस आंदोलन की खास बात बापू के कपड़े थे।इससे पहले वो अंग्रेजी पेंट और कमीज पहनते थे।इसी आंदोलन में उन्होंने अंग्रेजी कपड़े छोड़े और धोती ,कुर्ता और सर पर गमछा धारण कर गांव गांव जा जनता को जगाना शुरू करा।साधारण जन समूह में गांधी की छवि घर कर गई।अंग्रेजी सरकार की नीवं में दरार उतपन्न हुई।उनकी समस्या बमुश्किल 45 किलो,ठिगने और पतले शरीर वाले गांधी नहीं बल्कि उनकी महामानव बनने वाली छवि बन गई।मशहूर अखबार " पायनियर " के साथ मिल कर अंग्रेजी हुकूमत ने गांधी की छवि को बिगाड़ने का काम शुरू किया।हर दिन पायोनियर अखबार गांधी के विरुद्ध कोई न कोई लेख लिखता और हर लेख में गांधी के कपड़ो को निशाना बनाया जाता।बहुत वक्त तक गांधी ने इन लेखों पर चुप्पी साधे रखी परन्तु पानी सिर से ऊपर बह जाने के बाद गांधी ने पायोनियर अखबार को अपनी वेशभुसा के बारे में एक पत्र लिखा ।उसके आखिरी वाक्य ये थे "...... कपड़े आपकी सहूलियत के अनुसार होने चाहिए।धोती कुर्ता मुझे बेहद सहूलियत और आराम देते हैं, गमछा इसलिए सिर पर धारण करता हूँ क्योंकि ये भीषण गर्मी से बचाता है।कपड़ों को किसी धर्म ,सम्प्रदाय ,जाती या पूर्वी अथवा पश्चिमी सभ्यता में बांधना सबसे बड़ी मूर्खता होगी...... "

ये पत्र जब पायोनियर अखबार के मालिक और प्रधान संपादक के पास पहुंचा तो वो खुद गांधी से मिलने आये।उनसे माफी मांगी और ये पूरा पत्र अगले दिन के अखबार में माफी सहित छापा।

मुझे बिल्कुल नहीं पता कि मेरे विभाग के अधिकारियों का साधारण कपड़ो से अभिप्राय क्या है।कपड़ों का शिक्षा की गुणवत्ता से क्या लेना देना है, ये भी मुझे नहीं पता।अगर ये पत्र महिला अध्यापको के लिए है तो फिर पत्र जारी करने वाले अधिकारियों को तुरंत प्रभाव से अपना पद तय्याग देना चाहिए क्योंकि सामन्त वादी सोच के लोगों के लिए शिक्षण व्यवस्था में कोई जगह है ही नहीं।इस पत्र का क्या संदेश है ,इसके लिए तुरन्त एक वर्कशॉप विभाग को आयोजित करनी चाहिए जिसमें शिक्षक, न्याय विद ,फैशन डिज़ाइनर ,जनता के चुने हुए प्रतिनिधि और सबसे जरूरी " स्वतन्त्र और गणतांत्रिक देश " की असली परिभाषा समझने वाले बुद्धिमान व्यक्ति भी बुलाये जाने चाहिए।

याद रखिये " गन्दगी कपड़ो में नहीं होती , देखने वाले कि नजरों में होती है .... "

मैं फिर बापू के ऐतिहासिक पत्र की पंक्ति दोहरा दूं.... " कपड़े आपकी सहूलियत के अनुसार होने चाहिएं....... "

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता : भौतिक शास्त्र

राजकीय आदर्श विद्यालय सरकाघाट की फेसबुक वाल

Saturday, 13 January 2024

"जी"

 "जी":

भाषा विज्ञान कमाल है।

शब्दों के उच्चारण ,उनका इस्तेमाल और उनके अर्थ काल और स्थान के हिसाब से एक दम अलग और कई बार विरोधाभासी होते हैं।

आजकल " जी" शब्द का उच्चारण मौलिक हो गया है।बचपन और जवानी के दिनों में हम भी इस शब्द का प्रयोग सम्मान हेतु किया करते थे।" पिताजी","माताजी" , "गुरु जी"  यहां तक की अंग्रेजी के शब्दों के साथ भी हम इस विचित्र शब्द को जोड़ लिया करते थे, " अंकल जी" ,"आंटी जी" और कई बार तो अपने अध्यापकों के लिए " सर जी" ।

आजकल नाम के साथ ये शब्द जुड़ना शुरू हो गया है।" मोदी जी" " राहुल जी" " प्रियंका जी" " नड्डा जी" ।

मेरे दक्षिण पंथी मित्र तो बिना जी शब्द के जुड़ाव के नाम नहीं पुकारते , " सचिन जी" "राजेंद्र जी"।

मैने कई घोर दक्षिण पंथी लगाव वाले घनिष्ठ मित्रों के मोबाइल में अपने नाम को " सचिन जी फिजिक्स" " सचिन जी धर्मशाला" " सचिन जी सरकाघाट " स्टोर किए हुए पाया है।

हालांकि मैं वैचारिक आक्रमण को बेहतरीन तरीके से समझता हूं।

मेरे बहुत से घनिष्ठ मित्र ,जिनमे कई बेहतरीन शिक्षक तक शामिल हैं आम तौर पर व्हट्सएप्प यूनिवर्सिटी के उन संदेशों को सच मान लेते हैं जिनमे इतिहास को विकृत कर किसी जाति,धर्म अथवा लोगों के समूह विशेष  के प्रति नफरत और हिंसा पैदा करने के लिए प्रेषित किया गया होता है।

उसका कारण है।इतिहास सामान्य विद्यार्थी सिर्फ दसवीं तक ही पढ़ते हैं।विज्ञान के छात्र,कॉमर्स के छात्र तो दसवीं के बाद इतिहास पढ़ते ही नहीं है कला विषय वाले छात्र भी इतिहास तभी पढ़ते हैं जब उन्होंने वो विषय लिया हो।वर्ना थोड़ा बहुत इतिहास आम छात्र तब पढ़ता है जब या तो वो कमीशन की तैयारी कर रहा हो या एडमिनिस्ट्रेटिव जॉब की तयारी कर रहा हो।

दसवीं के बाद चूंकि इतिहास से 90% लोगों का कोई लेना देना नहीं रहता इसीलिए जब एक व्हट्सअप मैसेज आपको बताता है की एन सी ई आर टी की इतिहास की किताब में  अकबर पर तो पूरा चैप्टर है परंतु महाराणा प्रताप पर एक शब्द नहीं तो आप उसे सच मान लेते हो।आप किताब को खोल ये जानने की कतई कोशिश नहीं करते की उसी किताब में महाराणा प्रताप के संघर्षों ,ऐतिहासिक जीतो,उनके लागू किए सुधारों पर 8 पृष्ठ दर्ज हैं।

इसे बौद्धिक आक्रमण कहते हैं जो वर्तमान में हिंसक स्तर का स्वरूप ले चुका है ।कुछ दार्शनिक लोग इसे दिमाग में गोबर भरना भी कहते हैं।

तो "जी" शब्द की उत्पत्ति समझने के लिए मैने भी इंटरनेट को खंगालना शुरू किया।

अगर हम अपने पुरातन धर्मग्रंथों को खंगाले तो वहां कहीं भी " जी" शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है।हालांकि टीवी धारावाहिक " जी" शब्द के प्रयोग का बेहिसाब इस्तेमाल करते हैं ।" ब्रह्मा जी,विष्णु जी,शिव जी,गंगा जी,सरस्वती जी ,लक्ष्मी जी"।

परंतु मूल पुराणों में और अन्य पुरातन अभिलेखों में किसी भी देवता या अन्य सम्मानित भगवानों के साथ " जी"  का प्रयोग नहीं हुआ है।

संस्कृत जनन ये शब्द " जीव" से खींचा गया प्रतीत होता है जिसका हिंदी में जीवन अर्थ होता है।

इस शब्द को संज्ञा , क्रिया और विशेषण तीनों की तरह इस्तेमाल होते अब आप देख सकते हो।

संज्ञा की तरह " जी " शब्द का इस्तेमाल आत्मा,प्राण ,समूह,रूह,व्यक्ति,दिल ,छाती,तमन्ना ,मर्जी,कामना,मनोरथ के पर्यायवाची शब्द की तरह किया जाता है।

विशेषण में " जी" शब्द का इस्तेमाल माननीय,स्माननीय,आदरणीय,महान ,कुलीन,सज्जन,भद्र जैसे शब्दों के पर्यायवाची शब्द के रूप में किया जाने लगा है।

क्रिया में इस शब्द को " जी भरना, जी उठना,जी भरकर " जैसे मुहावरों और लकोक्तियों में इस्तेमाल किया जाता है।

कुछ स्कॉलर इस शब्द को चीन से आया हुआ मानते हैं।उनके हिसाब से " जी " शब्द का पहला प्रयोग चीन के महान शासक हुआंग दी के पोते " बो शू" ने अपनी सल्तनत की सुंदर स्त्रियों के लिए किया ।दुर्भाग्य से बाद में ये शब्द " वैश्याओ " के लिए प्रयोग किया जाने लगा जो आज तक इस्तेमाल होता है।

राजस्थान के कुछ स्कॉलर " जी " शब्द का पुरुषों के लिए प्रयोग को हास्यास्पद मानते हैं।उनके अनुसार " जी " शब्द राजपूत अपनी बीवियों के लिए करते थे।राजपूतो के पूरे साहित्य में महारानियो के नाम के साथ " जी " शब्द का प्रयोग किया गया है।जैसे महारान प्रताप की ग्यारह महारानियों के नाम उनके इतिहास के दस्तावेजों में "रानी सोलंकीबाई जी,रानी चंपा बाई जी,रानी जासो बाई जी, रानी फूल बाई जी,रानी सहमति बाई जी,रानी किशार आशाबाई जी,रानी अलमब्दे बाई जी,रानी रत्नावती बाई जी,रानी लखा बाई जी, रानी अमरबाई जी दर्ज है।इन दस्तावेजों या अन्य किसी भी राजपूताना दस्तावेज में किसी पुरुष के साथ "जी" शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

तो जितना इतिहास मैं खंगाल पाया सोचा आपके साथ भी सांझा कर लूं।आपके पास भी कोई जानकारी हो तो सांझा अवश्य करें ताकि श्रोता उसका भी आनंद और जानकारी ले पाए।

बर्हलाल इस बात से मैं पूर्णतः सहमत हूं की राजपूताना टोली में "जी" शब्द सिर्फ महिलाएं के सम्मान में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।पुरुष के साथ " श्री" का उच्चारण उचित होगा।

और लेख पढ़ के ये कतई मत सोचिएगा की मैं कोई भाषा विज्ञानी हूं।भौतिक शास्त्री ही हूं।पर दो घंटे की ऑनलाइन क्लास के बाद काम कोई है नहीं।

दिन काटने के लिए इतिहास,भूगोंल और साहित्य पढ़ने से बेहतर कुछ भी नहीं। कम से कम कुछ नया सीख जाओगे और व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के वाहियात मैसेज से दिमाग में गोबर भरने से बच जाओगे।

सचिन ठाकुर,

प्रवक्ता भौतिक शास्त्र,

राजकीय बाल विद्यालय धर्मशाला की फेसबुक वाल